लड़कियाँ

यूएन न्यूज़ हिन्दी बुलेटिन, 27 नवम्बर 2020

इस साप्ताहिक बुलेटिन की सुर्ख़ियाँ...
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लड़की: समानता का जन्म-सिद्ध अधिकार

संयुक्त राष्ट्र के अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) की भारत में 'तेजस्विनी' परियोजना के तहत आयोजित कन्या नामकरण समारोह, कन्या भ्रूण हत्या को कम करने और भारत में महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने में मदद कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा लिंग आधारित हिंसा के ख़िलाफ़ 16 दिनों की सक्रियता मुहिम के मौक़े पर भारत के महाराष्ट्र प्रदेश में, IFAD द्वारा वित्त पोषित ये परियोजना, एक बच्ची को जन्म देने और उसके इर्द-गिर्द नकारात्मक धारणाओं को उलटने की कोशिश कर रही है... देखें ये वीडियो...

एचआईवी से वैश्विक नुक़सान, कोविड-19 के कारण, बहुत ज़्यादा होगा

संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि देशों को एचआईवी/एड्स का मुक़ाबला करने के लिये नए महत्वाकाँक्षी लक्ष्य निर्धारित करने चाहिये ताकि लाखों अतिरिक्त लोगों को कोविड-19 महामारी से सम्बन्धित संक्रमण और मौतों से बचाया जा सके. 

'लिंग आधारित हिंसा को ख़त्म कर दें, हमेशा-हमेशा के लिये'

संयुक्त राष्ट्र ने तमाम देशों की सरकारों ने लिंग आधारित हिंसा को हमेशा के लिये ख़त्म करने के लिये प्रयास दो गुने करने का आहवान किया है. बुधवार को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का उन्मूलन करने के अन्तरराष्ट्रीय दिवस के मौक़े पर ये आहवान किया गया है.

कोविड-19: आपसी सम्बन्धों पर प्रभाव

स्वास्थ्य संकट की स्थिति में, स्कूल, सामाजिक संस्थाओं और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच खो देने के कारण, ख़ासतौर पर लड़कियों को बाल-विवाह और कम उम्र में गर्भवती होने के जोखिम का सामना करना पड़ता है.

बांग्लादेश की 15 साल की त्रिशा कहती हैं, "मैं एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था चाहती हूँ, जहाँ महिलाएँ और बच्चे पूरी तरह से सुरक्षित हों. बाल विवाह हमारे समाज के लिये एक अभिशाप है. जब कोई लड़की बाल विवाह का शिकार होती है, तो वह शारीरिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित होती है.”

यह वीडियो, लड़कियों ने ख़ुद बनाकर, अपने विचार, अपने शब्दों में, व्यक्त किये हैं. (वीडियो देखें)...

विश्व शौचालय दिवस: स्वच्छता की अहमियत

शौचालयों की अहमियत और स्वच्छता पर जागरूकता बढ़ाने के लिये दुनिया भर में 19 नवम्बर को विश्व शौचालय दिवस मनाया जाता है. दुनिया की कुल आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा, यानि लगभग 25 प्रतिशत आबादी को बुनियादी सुविधाएँ हासिल नहीं हैं.

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कोविड-19: एक लड़की की नज़र में भविष्य

दुनिया भर की लड़कियाँ एक ऐसे भविष्य की कल्पना करती हैं जो समावेशी और निष्पक्ष हो. माली में 15 साल की मकदीदिया कहती हैं, "मैं सभी बच्चों के अभिभावकों से कहना चाहता हूँ कि वो यह समझें कि हम कुछ कहना चाहते हैं, और हमारे विचार मायने रखते हैं, क्योंकि हम दुनिया का भविष्य हैं." 

यह वीडियो, लड़कियों ने ख़ुद बनाकर, अपने विचार, अपने शब्दों में, कैमरे में समेटे हैं... (वीडियो सौजन्य: यूनीसेफ़)
 

स्वच्छता के संकट का सामना करने के लिये बना एक कोष

संयुक्त राष्ट्र ने मंगलवार को एक ऐसा कोष शुरू किया है जिसके ज़रिये स्वच्छता, साफ़-सफ़ाई और लड़कियों व महिलाओं के मासिक धर्म के इर्द-गिर्द सदियों पुरानी हानिकारक अवधारणाएँ बदलने पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा जिनसे इस समय दुनिया भर में 4 अरब से भी ज़्यादा लोग प्रभावित होते हैं.

कोविड-19 दौरान शिक्षा - एक लड़की की नज़र से

कोविड-19 महामारी का मुक़ाबला करने के प्रयासों के तहत 194 देशों में राष्ट्रव्यापी तालाबन्दी में लगभग एक अरब 60 करोड़ बच्चों का जीवन भी प्रभावित हुआ है. दुनिया भर के लगभग 90 प्रतिशत छात्र अप्रैल के शुरू से ही स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. आशंका है कि बहुत सी लड़कियाँ शायद कभी भी स्कूली कक्षाओं में वापस नहीं जा पाएँगी, क्योंकि परिवार अपने आर्थिक बोझ कम करने के लिये उन्हें बाल विवाह या बाल श्रम के गर्त में धकेल सकते हैं. 

 

इस वीडियो में मेडागास्कर की 16 वर्षीया अंतासा कहती हैं, "लड़कियों को स्कूल नहीं भेजने का विचार, इन इलाक़ों में वास्तव में संस्कृति का हिस्सा बन गया है".
 

(यह वीडियो, लड़कियों ने ख़ुद बनाकर, अपने विचार, अपने शब्दों में व्यक्ति किये हैं). 

महामारी - एक लड़की की नज़र से

कोविड-19 महामारी से दुनिया भर में करोड़ों बच्चों पर असर पड़ा है. स्कूल बन्द होने और वायरस के प्रसार को रोकने के लिये अपनाए गए तालाबन्दी और अन्य उपायों ने लाखों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,महत्वपूर्ण टीकों और पौष्टिक आहार से दूर कर दिया है. ख़ासतौर पर, लड़कियों के लिये स्थिति और भी ज़्यादा ख़राब हो गई है. इस तरह की संकट स्थितियों के दौरान लिंग आधारित हिंसा और हानिकारक प्रथाओं का ख़तरा बढ़ जाता है – विशेषकर ग़रीब और कमज़ोर वर्ग की लड़कियों के लिये. अनुमानों के मुताबिक, स्कूल फिर से खुलने पर भी शायद बहुत सी लड़कियाँ फिर कभी भी वापस विद्यालय ना जा सकें या फिर हालात से मजबूर होकर बाल विवाह का शिकार हो जाएँ.