लैंगिक समानता

लैंगिक समानता, 'इस सदी का अधूरा मानवाधिकार संघर्ष' - यूएन प्रमुख

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने सोमवार को, पीढ़ी समानता फ़ोरम (Generation Equality Forum) में कहा कि महिलाओं के लिये समान अधिकार प्राप्ति का कार्य – “सदी का ऐसा मानवाधिकार संघर्ष है जो अभी अधूरा है”. ये फ़ोरम, मैक्सिको सिटी में सोमवार को शुरू हुआ.

शान्तिरक्षा अभियानों में महिला सशक्तिकरण 'शीर्ष प्राथमिकता'

शान्तिरक्षा अभियानों के लिये संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारी ने शान्तिरक्षा और शान्तिनिर्माण प्रयासों में महिलाओं के बुनियादी योगदानों की सराहना की है. यूएन अवर महासचिव ज्याँ-पिएर लाक्रोआ ने गुरुवार को दोहराया कि सैन्य बलों में महिलाओं का सशक्तिकरण, एक अहम प्राथमिकता है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये, हर किसी द्वारा यथासम्भव प्रयास किये जाने की ज़रूरत है.   

सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी - 'हर किसी के लिये लाभप्रद'

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) मिशेल बाशेलेट ने ‘महिलाओं की स्थिति पर आयोग’ को सम्बोधित करते हुए कहा है कि महिलाओं व लड़कियों को सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के लिये पूर्ण रूप से सशक्त बनाना, सही और बुद्धिमान चयन है. अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने भी मंगलवार को महिला आयोग के सत्र को सम्बोधित किया, जिसे ऐतिहासिक माना जा रहा है. 

CSW: कॉर्पोरेट हस्तियों को यूएन प्रमुख का सन्देश - लैंगिक समानता समय की ज़रूरत

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने तमाम कॉर्पोरेट हस्तियों से लैंगिक समानता हासिल करने का आग्रह करते हुए, निजी क्षेत्र और पूरे समाज के लिये, इसके लाभों को भी रेखांकित किया है. यूएन प्रमुख ने, मंगलवार को, महिला स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र के आयोग (CSW) के 65वें सत्र के दौरान आयोजित 'लक्ष्य लैंगिक समानता' कार्यक्रम को दिये वीडियो सन्देश में, ये अपील की.

यूएन महिला आयोग: पूर्ण लैंगिक समानता के लिये रोडमैप पर रहेगा ध्यान

महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग के 65वें सत्र का एक मुख्य ध्यान - दुनिया भर में पूर्ण लैंगिक समानता हासिल करने और निर्णय प्रक्रिया में, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिये एक रौडमैप तैयार करने पर रहेगा. ये सत्र सोमवार को, न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में शुरू हो रहा है.

महिलाओं को अहम फ़ैसलों से दूर रखा जाना सहन नहीं - यूएन महिला संस्था

महिला सशक्तिकरण के लिये यूएन संस्था – यूएन वीमैन (UN Women) की प्रमुख फ़ूमज़िले म्लाम्बो-न्गुका ने कहा है कि महिलाओं की ज़िन्दगी पर असर डालने वाले निर्णयों से उन्हें दूर रखा जाना ग़लत है और इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिये. उन्होंने, अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर, सोमवार को आयोजित एक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है.

योरोप में महिलाओं को, निर्धनता से निकालने के लिये, 'ज़्यादा आर्थिक स्वतन्त्रता' की दरकार

चरम ग़रीबी और मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर ओलिवियर डे शटर ने कहा है कि योरोपीय संघ में महिलाओं को समान वेतन, बाल देखभाल सम्बन्धी सहायता और घरेलू कामकाज में हाथ बँटाने के ज़रिये ज़्यादा आर्थिक स्वतन्त्रता दी जानी चाहिये. महिलाओं को हरसम्भव सहायता प्रदान करके, उन्हें निर्धनता के गर्त में धँसने से बचाया जाना होगा. यूएन न्यूज़ ने, 8 मार्च को, अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर, ओलिवियर डे शटर से ख़ास बातचीत की...

इंजीनियरिंग के क्षेत्र में समानता, टिकाऊ विकास लक्ष्यों के लिये अहम

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवँ सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) व साझीदारों द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, टिकाऊ विकास के 2030 एजेण्डा को साकार करने, और किसी को भी पीछे ना छूटने देने के लिये, अभियान्त्रिकी (इंजीनियरिंग) में व्याप्त क्षेत्रीय विसंगतियाँ को दूर किया जाना होगा.  

सामाजिक न्याय दिवस: एक नज़र महिलाओं के साथ भेदभाव पर...

20 फ़रवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाया जाता है. इस वर्ष, इस दिवस के साथ ही, दुनिया एक नए दशक में क़दम रख रही है, और इसका अर्थ है कि हमारे पास, टिकाऊ विकास लक्ष्यों का लैंगिक समानता पर वैश्विक लक्ष्य #5, हासिल करने के लिये केवल 10 वर्ष का समय बचा है. दुख के साथ कहना पड़ता है कि हमें अभी लम्बा रास्ता तय करना है. यहाँ तक कि भोजन जैसी बुनियादी आवश्यकता पूरी करने के लिये भी, विश्व के लगभग दो तिहाई देशों में, ऐसी अधिक सम्भावना है कि पुरुषों की तुलना में ज़्यादा महिलाएँ, भूख और खाद्य असुरक्षा का सामना करेंगी.

अफ़ग़ानिस्तान: एक बिटिया को जन्म देने वाली माँ की उम्मीदें और डर...

अफ़ग़ानिस्तान में, एक माँ, कुछ ही दिनों में, इस दुनिया में आने वाली अपनी बेटी के लिये, एक ऐसे देश में, अपनी उम्मीदों और डर के बारे में बात कर रही हैं जहाँ एक लड़की को जन्म देना, आशीर्वाद समझने के बजाय, एक अभिशाप भी समझा जा सकता है. देश के, पुरुष प्रधान समाज में, अक्सर महिलाएँ और लड़कियाँ, पुरुषों के हाथों, बुरे बर्ताव और प्रताड़ना का सामना करती हैं, लड़कियों की तुलना में, लड़के ज़्यादा पसन्द किये जाते हैं और उन्हें ज़्यादा अहमियत दी जाती है.