जलवायु कार्रवाई

संकट काल में 'वैश्विक वित्तीय प्रणाली हुई विफल, एकजुटता का अभाव'

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने, सोमवार को विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) के एक कार्यक्रम को वर्चुअल रूप से सम्बोधित करते हुए आगाह किया है कि मौजूदा संकट के दौरान विकासशील देशों की सहायता कर पाने में, वैश्विक वित्तीय प्रणाली विफल साबित हुई है और एकजुटता कहीं नज़र नहीं आ रही है.

यूएन महासचिव की युवाओं से पुकार – ‘अपनी आवाज़ बुलन्द करते रहिये’

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कोविड-19 महामारी से पुनर्बहाली और एक बेहतर भविष्य को मूर्त रूप देने के लिये, विश्व भर में युवजन को साथ लेकर चलने का आग्रह किया है. उन्होंने विश्व युवजन फ़ोरम को अपने सन्देश में ध्यान दिलाया है कि कोविड-19 महामारी ने हर किसी को, बहुत गहराई से प्रभावित किया है, मगर, युवाओं पर इस संकट का असर, विशेष रूप से हृदयविदारक साबित हुआ है. 

2021 पर एक नज़र: जलवायु कार्रवाई, या आँय, बाँय, शाँय?

इस वर्ष, संयुक्त राष्ट्र समर्थित रिपोर्टों और ग्लासगो में यूएन के वार्षिक जलवायु सम्मेलन (कॉप26) में निरन्तर यह कड़ा सन्देश दोहराया गया: मानव गतिविधियों की वजह से जलवायु परिवर्तन, ना केवल तात्कालिक बल्कि पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिये बहुत बड़ा ख़तरा है. क्या जलवायु संकट से निपटने के लिये अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के प्रयासों के सार्थक नतीजे सामने आएँगे?

आर्कटिक में तापमान 38 डिग्री सेल्सियस पहुँचने की पुष्टि, नया रिकॉर्ड

संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने आर्कटिक क्षेत्र में 38 डिग्री सेल्सियस, यानि क़रीब 100 डिग्री फ़ैरेनहाइट तापमान दर्ज किये जाने की पुष्टि की है. यूएन एजेंसी का कहना है कि चरम मौसम व जलवायु पुरालेख (archives) में दर्ज आँकड़े बदलती हुई जलवायु को परिलक्षित करते हैं. 

रूपान्तरकारी बदलाव के वाहक – 2021 ‘चैम्पियंस ऑफ़ द अर्थ’ विजेताओं की घोषणा

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने वर्ष 2021 के लिये ‘चैम्पियंस ऑफ़ द अर्थ’ पुरस्कार विजेताओं के नामों की घोषणा की है. पर्यावरण के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की ओर से दिये जाने वाले इस सर्वोच्च सम्मान से नवाज़े जाने वालों में, एक कैरीबियाई देश की प्रधानमंत्री, एक महिला वैज्ञानिक, आदिवासी महिलाओं के एक समूह और एक महिला उद्यमी शामिल हैं. 

कॉप26: अन्तिम चरण की वार्ता का दौर खिंचा, निर्धारित अवधि से लम्बा

स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में संयुक्त राष्ट्र का 26वाँ वार्षिक जलवायु सम्मलेन (कॉप26) शुक्रवार को समाप्त होना था, मगर निर्धारित समय पर ख़त्म होने के बजाय अन्तिम चरण की वार्ताओं का दौर अभी जारी है. 

कॉप26: संकल्पों पर पानी फेरती है अरबों डॉलर की जीवाश्म ईंधन सब्सिडी; जलवायु वार्ता में तेज़ी लाए जाने की पुकार

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने देशों की सरकारों से, कार्बन उत्सर्जन में कटौती, अनुकूलन और वित्त पोषण के विषय में, नपे-तुले अन्दाज़ में ज़्यादा महत्वाकांक्षा दर्शाने पर बल दिया है. स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में कॉप26 सम्मेलन के दौरान महासचिव ने गुरूवार को प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए स्पष्ट किया कि आम सहमति वाले, सबसे निचले स्तर के उपाय पर्याप्त नहीं हैं. 

कॉप26: जलवायु संकट से सर्वाधिक प्रभावितों में महिलाएँ, चुकाती हैं एक बड़ी क़ीमत

स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो शहर में कॉप26 सम्मेलन के दौरान मंगलवार को, जलवायु परिवर्तन से महिलाओं पर होने वाले असर व जलवायु कार्रवाई में उनकी ज़रूरतों को समाहित किये जाने के मुद्दे पर चर्चा हुई. प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख में महिलाओं व लड़कियों के ज्ञान की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है, और उनमें निवेश के ज़रिये, पूर्ण समुदायों तक लाभ पहुँचाया जा सकता है. इस बीच, एक नया विश्लेषण दर्शाता है कि कॉप26 में विश्व नेताओं की घोषणाओं के बावजूद, दुनिया विनाशकारी तापमान वृद्धि की ओर बढ़ रही है.

कॉप26: निर्बल देशों का कड़ा सन्देश, जलवायु वित्त पोषण के वादे निभाएँ विकसित देश

भीषण बाढ़, वनों में विनाशकारी आग और बढ़ता समुद्री जलस्तर, ये ऐसी वास्तविकताएँ हैं जिनका सामना अनेक विकासशील व द्वीपीय देशों को करना पड़ रहा है, और जिनसे अनगिनत लोगों के जीवन व आजीविका पर असर पड़ा है. ग्लासगो में यूएन के वार्षिक जलवायु सम्मेलन (कॉप26) के दूसरे सप्ताह की शुरुआत पर, सोमवार को जलवायु अनुकूलन, क्षति व हानि पर चर्चा केन्द्रित रही और जलवायु जोखिमों को झेल रहे देशों ने विकसित देशों से जलवायु कार्रवाई के लिये वित्तीय सहायता के वादों को पूरा करने का आग्रह किया. 

जलवायु परिवर्तन व स्वास्थ्य जोखिम: देशों के पास समर्थन व धनराशि का अभाव

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक नई रिपोर्ट दर्शाती है कि जलवायु प्रभावों से आमजन के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिये, देशों की सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों को प्राथमिकता दे रही हैं, मगर कारगर कार्रवाई के लिये अनेक देशों के पास पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं है.