भारत-यूएन कोष: किरिबाती में शुद्ध नारियल तेल से आय व आजीविका की पहल
किरिबाती में पिछली कई पीढ़ियों से नारियल केवल एक फ़सल नहीं है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति और समुदायों के दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है. अब भारत-यूएन विकास साझेदारी कोष के समर्थन से किरिबाती सरकार ने इस महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन के ज़रिए नारियल के बेहतर उत्पाद तैयार करने के लिए एक नई परियोजना शुरू की है.
प्रशान्त महासागर क्षेत्र में स्थित द्वीपीय देश किरिबाती में, राजधानी तरावा के बाहर स्थित द्वीपों में नारियल के शुद्ध तेल (virgin coconut oil) के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 9 लाख अमेरिकी डॉलर की यह परियोजना शुरू की गई है.
दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए यूएन कार्यालय (UNOSSC) की प्रशासनिक देखरेख में, इस पहल को भारत-यूएन विकास साझेदारी कोष के ज़रिए भारत सरकार ने समर्थन दिया है.
दक्षिण-दक्षिण सहयोग, विकासशील देशों के बीच विकास साझेदारी को कहा जाता है, जिसमें ये देश, आपसी सम्मान व लाभ के सिद्धान्तों पर आधारित, साझा विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सहयोग करते हैं.
नारियल पर निर्भरता
किरिबाती में नारियल, लम्बे समय से देश की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और दैनिक जीवन में एक अहम भूमिका निभाते रहे हैं. बाहरी द्वीपों पर बसे अनेक परिवारों के लिए कोपरा (copra), सूखा नारियल और उसकी गिरी, कमाई का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है.
मगर, माल को लाने-ले जाने की लागत बहुत अधिक है, जबकि सामान तैयार करने के लिए उपकरण सीमित हैं. इसके अलावा, ज़रूरी तकनीकी क्षमता की कमी है और न ही भरोसेमन्द बाज़ारों तक पहुँच है.
इस वजह से, नारियल के उत्पाद तैयार करने और स्थानीय उद्यमों को आगे बढ़ाने के प्रयासों में कठिनाई का सामना किया जाता रहा है. इन समस्याओं से निपटने के लिए यह पहल शुरू की गई है.
18 महीनों की अवधि वाली इस परियोजना को लागू करने में किरिबाती सरकार की अग्रणी भूमिका होगी, और यूएन विकास कार्यक्रम द्वारा तकनीकी सहायता, वित्तीय देखरेख और रिपोर्ट तैयार करने में मदद दी जाएगी.
नोनौती और तेराइना द्वीपों में जलवायु प्रभावों को सहन करने में सक्षम दो प्रसंस्करण केन्द्र (processing facilities) स्थापित किए जाएंगे. साथ ही, उच्च मूल्य वाले नारियल उत्पादों को तैयार करने और उनकी बिक्री के लिए स्थानीय लोगों के कौशल को निखारा जाएगा.
परियोजना के मुख्य उद्देश्य:
- सुरक्षित व उच्च गुणवत्ता वाले शुद्ध नारियल तेल तैयार करने के लिए कौशल विकास
- स्थानीय प्रशिक्षकों को बेहतर ट्रेनिंग
- उपकरण इस्तेमाल करने व मरम्मत के लिए क्षमता निर्माण
- उत्पादों की ब्रैंडिंग, पैकेजिंग और बिक्री बढ़ाने में मदद
- वैल्यू चेन में महिलाओं और युवाओं को उत्पादक, उद्यमी, कामगार की भूमिका के लिए प्रोत्साहन
- सामुदायिक स्वामित्व (community ownership) की भावना को बढ़ावा
- स्थानीय स्तर पर मरम्मत योग्य टैक्नॉलॉजी का इस्तेमाल
जलवायु व पर्यावरणीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसे तौर-तरीक़े अपनाए जाएंगे, जिनके लाभ इस परियोजना के बाद भी प्राप्त होते रहें.
आवश्यकताओं के अनुरूप
पैट्रिक तुइमलयलिफ़ानो, प्रशान्त क्षेत्र में स्थित यूएन विकास कार्यक्रम (UNDP) में समावेशी प्रगति विभाग के प्रमुख हैं. उन्होंने बताया कि इस परियोजना की सफलता के लिए स्थानीय वास्तविकताओं का ध्यान रखा जाना होगा और उसके आधार पर ही केन्द्रों, प्रशिक्षण कार्यक्रम व व्यावसायिक मॉडल तैयार किए जाने होंगे.
भारत के उच्चायुक्त सुनीत मेहता ने कहा कि इस परियोजना से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि नारियल से हासिल होने वाली कमाई को किरिबाती में ही रखा जा सके. “इससे बाहरी द्वीपों में किसानों व आपूर्तिकर्ताओं, छोटे व्यवसायों, महिलाओं व युवजन और समुदायों के लिए अवसर पैदा होंगे.”
किरिबाती में पर्यटन, वाणिज्य, उद्योग व सहकारी समिति मामलों की मंत्री, टैंगारिकी रीटे के अनुसार इस परियोजना से, किरिबाती की अर्थव्यवस्था में विविधता लाने और नारियल सैक्टर को मज़बूती देने के प्रयासों को समर्थन मिलेगा.
उन्होंने कहा कि देश के नारियल उद्योग में क्षमता निर्माण और निवेश, उनके लिए एक प्राथमिकता है. किरिबाती अब सूखे नारियल और उसकी गिरी से आगे बढ़कर नए उत्पादों के ज़रिए इस सैक्टर को और मूल्यवान बनाने का इच्छुक है.
अबेमामा, तबितेउआ साउथ और बुटारितारी में पहले से ही शुद्ध नारियल तेल के लिए तीन प्रोसेसिंग केन्द्र हैं और नोनौती व तेराइना में इस पहल के बाद उनकी संख्या पाँच हो जाएगी.
भारत-यूएन विकास कोष
भारत-यूएन विकास साझेदारी कोष, दक्षिण-दक्षिण सहयोग की भावना के तहत, दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित विकासशील देशों के नेतृत्व और स्वामित्व में, टिकाऊ विकास परियोजनाओं को समर्थन प्रदान करता है.
यह कोष 2017 में, 15 करोड़ डॉलर के संकल्प के साथ आरम्भ किया गया था, जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के सहयोग से चलाया जा रहा है, और इसका प्रबन्धन यूएन दक्षिण-दक्षिण सहयोग कार्यालय (UNOSSC) द्वारा किया जाता है.
ये परियोजनाएँ, भारत सरकार के समर्थन व नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के सहयोग से लागू की जाती हैं. इस क्रम में, सबसे कम विकसित देशों और लघु द्वीपीय देशों पर प्रमुखता से ध्यान केन्द्रित किया जाता है.
यह यूएन प्रणाली में दक्षिण-दक्षिण सहयोग का एक उदाहरण है, जिसके ज़रिये सभी 17 टिकाऊ विकास लक्ष्यों की दिशा में प्रगति का लक्ष्य रखा गया है.