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एआई डेटा केन्द्रों से दुनिया भर की बिजली प्रणालियों पर बढ़ता दबाव

नीदरलैंड के मिडेनमीर में स्थित माइक्रोसॉफ्ट डेटा सेंटर की इमारतों एएमएस13 और एएमएस14 का हवाई दृश्य, जिसमें काले रंग के अग्रभाग, छत पर लगे शीतलन इकाइयां और ट्रांसफार्मर सबस्टेशन हैं, जो हरे-भरे खेतों और नहरों के बीच स्थित हैं।
© Adobe Stock नीदरलैंड्स में स्थित इस तरह के डेटा केन्द्रों को बहुत बड़ी मात्रा में बिजली की ज़रूरत होती है.

एआई डेटा केन्द्रों से दुनिया भर की बिजली प्रणालियों पर बढ़ता दबाव

आर्थिक विकास

योरोप के लिए संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक आयोग ने चेतावनी दी है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) डेटा केन्द्रों जैसी तकनीकों की बिजली माँग, बिजली ढाँचे के विस्तार से कहीं तेज़ी से बढ़ रही है. इससे भविष्य में दुनिया भर में बिजली आपूर्ति की स्थिरता और भरोसेमन्द व्यवस्था पर असर पड़ सकता है.

अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, डेटा केन्द्रों की बिजली खपत 2030 तक लगभग दोगुनी हो सकती है - 2025 के 485 टेरावॉट-घंटे से बढ़कर 950 टेरावॉट-घंटे तक. यह दुनिया की कुल बिजली माँग का लगभग तीन प्रतिशत होगा.

इसके विपरीत, डेटा केन्द्रों के बुनियादी ढाँचे में वैश्विक निवेश 2050 तक लगभग दोगुना होने का अनुमान है - 2026 में लगभग 800 अरब डॉलर प्रति वर्ष से बढ़कर 1.8 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष.

जिनीवा स्थित संयुक्त राष्ट्र योरोपीय आर्थिक आयोग (UNECE) ने चेतावनी दी है कि कई जगह डेटा केन्द्र और अन्य अधिक बिजली खपत वाली सुविधाएँ, उन्हें बिजली देने के लिए ज़रूरी ग्रिड ढाँचे की तुलना में कहीं तेज़ी से बन रही हैं.

एक बड़ा डेटा केन्द्र आमतौर पर दो से पाँच साल में बनकर चालू हो सकता है, लेकिन उसे पर्याप्त बिजली देने के लिए नई ट्रांसमिशन लाइनें और ग्रिड ढाँचा तैयार करने में 10 साल से भी ज़्यादा समय लग सकता है.

बिजली प्रणालियों पर बढ़ता दबाव

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एक बड़ी चिन्ता यह है कि बिजली नैटवर्क पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ पड़ने से वोल्टेज में उतार-चढ़ाव, अचानक बिजली कटने और बड़े पैमाने पर आपूर्ति बाधित होने जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं.

UNECE के अनुसार, कुछ मामलों में यह समस्या नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भर प्रणालियों में पहले से सामने आ रही है. एआई डेटा केन्द्रों की माँग अचानक बढ़ सकती है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भर ग्रिड उतनी तेज़ी से बिजली आपूर्ति नहीं बढ़ा पाते.

माँग और आपूर्ति के इस अन्तर को देखते हुए कई देशों ने बिजली नैटवर्क पर दबाव कम करने के लिए विभिन्न पाबन्दियाँ और बचाव उपाय लागू किए हैं.

दुनिया में सबसे अधिक डेटा केन्द्रों की मौजूदगी वाले देशों में शामिल आयरलैंड ने डबलिन में नए बिजली कनेक्शनों पर पाबन्दियाँ लगाई हैं, जबकि नीदरलैंड्स ने डेटा केन्द्रों के निर्माण स्थलों को लेकर सीमाएँ तय की हैं.

ख़र्च कौन उठाएगा?

एक अहम सवाल यह भी है कि डेटा केन्द्रों के लिए बिजली ग्रिड के विस्तार और उसे मज़बूत बनाने का ख़र्च कौन उठाएगा.

बड़े डेटा केन्द्रों को बिजली ग्रिड से जोड़ने के लिए बुनियादी ढाँचे में भारी निवेश की ज़रूरत पड़ सकती है. लेकिन यह ख़र्च डेटा केन्द्र कम्पनियों, बिजली कम्पनियों और उपभोक्ताओं के बीच कैसे बाँटा जाए, इसे लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है.

UNECE ने चेतावनी दी है कि स्पष्ट नियमों के अभाव में ज़रूरी निवेश में देरी हो सकती है.

नियमन में कमियाँ

डेटा केन्द्र कहाँ बनाए जाएँ, इसे लेकर भी नियमों में कमियाँ हैं. अधिक बिजली खपत वाली सुविधाएँ अक्सर उन इलाक़ों में बन रही हैं जहाँ बेहतर सम्पर्क और अनुकूल नियम हैं, भले ही वहाँ का स्थानीय बिजली ग्रिड अतिरिक्त माँग सम्भालने में सक्षम न हो.

डेटा केन्द्रों के पानी के इस्तेमाल, उत्सर्जन और स्थानीय संसाधनों पर असर को लेकर पर्यावरणीय नियम भी बढ़ रहे हैं, लेकिन UNECE के अनुसार ये अभी बिखरे हुए और असंगत हैं.

नियामकों के पास इसकी भी पर्याप्त जानकारी नहीं है कि बड़े डेटा केन्द्र वास्तविक समय में कितनी बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे ग्रिड पर उनके असर का पहले से सही अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है.

UNECE ने कहा है कि बिजली प्रणालियों की दीर्घकालिक विश्वसनीयता और मज़बूती सुनिश्चित करने के लिए बेहतर नियम और अधिक समन्वय ज़रूरी हैं.