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‘दासता की विरासत आज भी मौजूद’: मुआवज़े की मांग को यूएन समर्थन

कैनसस सिटी के डाउनटाउन में एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान, नारंगी टी-शर्ट और हेडरैप पहने एक मुस्कुराती हुई अश्वेत महिला सफेद मेगाफोन में बोल रही है, जो तख्तियां लिए समर्थकों से घिरी हुई है।
© Adobe Stock/Rawpixel अमेरिका के कैनसस सिटी शहर के मध्य क्षेत्र में नस्लवाद-विरोधी प्रदर्शन. (फ़ाइल)

‘दासता की विरासत आज भी मौजूद’: मुआवज़े की मांग को यूएन समर्थन

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) ने कहा है कि दासता भले ही इतिहास का हिस्सा होलेकिन उसके असर आज भी नस्लवाद और व्यवस्थागत असमानताओं के रूप में दिखाई देते हैं. 

अफ़्रीकी मूल के लोगों के अन्तरराष्ट्रीय दिवस पर समिति ने देशों से व्यापक सुधारात्मक न्याय (reparative justice) के उपाय अपनाने का आहवान किया है. इनमें मुआवज़ा, अधिकारों की बहाली, पुनर्वास और व्यवस्थागत सुधार शामिल हैं.

समिति ने कहा कि केवल समय बीत जाने के आधार पर इन ऐतिहासिक अन्यायों को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता. देशों को इन अपराधों के लिए “उचित सुधारात्मक न्याय और जवाबदेही के उपाय” अपनाने चाहिए.

चार साल के लिए चुने गए 18 स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों की यह समिति, सदस्य देशों द्वारा नस्लवाद और भेदभाव से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों पर पेश रिपोर्टों की समीक्षा करती है.

यह समिति वित्तीय, ग़ैर-वित्तीय और व्यवस्थागत सुधारों पर भी ज़ोर देती है. इनमें मुआवज़ा, पुनर्वास, अधिकारों की बहाली और ऐसे अन्याय दोबारा न हों, इसकी गारंटी शामिल है.

राष्ट्रीय योजनाएँ और समयसीमा

विशेषज्ञों ने एक वक्तव्य में कहा कि नस्लीय भेदभाव का अन्त तब तक पूरी तरह सम्भव नहीं है, जब तक दास बनाए गए अफ़्रीकी मूल के लोगों की तस्करी व नस्लीय दासता से हुए ऐतिहासिक अन्याय और उनके आज तक जारी प्रभावों को स्वीकार कर उनका निवारण नहीं किया जाता.

समिति ने मुआवज़े के लिए स्पष्ट समयसीमा वाली राष्ट्रीय कार्ययोजनाएँ बनाने की सिफ़ारिश की है. इन्हें अफ़्रीकी मूल के लोगों और क्षतिपूर्ति से जुड़े निकायों के परामर्श से तैयार किया जाना चाहिए.

समिति ने देशों से उन क़ानूनों, नीतियों एवं संस्थागत व्यवस्थाओं में बदलाव करने की भी मांग की, जो नस्लवाद, भेदभाव या नस्लीय असमानताओं को बनाए रखते हैं और सुधारात्मक न्याय में बाधा बनते हैं.

विशेषज्ञों ने कहा, “ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करना और माफ़ी माँगना अहम है, लेकिन इसके साथ ठोस क़दम भी उठाए जाने चाहिए. केवल माफ़ी, उचित निवारण का विकल्प नहीं हो सकती.”

निजी पक्षों की ज़िम्मेदारी

CERD ने धार्मिक संगठनों, विश्वविद्यालयों, व्यवसायों, बैंकों, बीमा कम्पनियों और अन्य वित्तीय संस्थानों की भूमिका की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जिन्होंने दास बनाए गए अफ़्रीकी लोगों की तस्करी में भाग लिया, उसे बढ़ावा दिया या उससे लाभ कमाया.

समिति ने देशों से कहा कि वे सुनिश्चित करें कि ऐसी संस्थाएँ भी सुधारात्मक न्याय में योगदान दें. इसके तहत उन्हें अपनी ऐतिहासिक भूमिका स्वीकार करनी चाहिए, सम्बन्धित अभिलेख सार्वजनिक करने चाहिए और अपनी भागेदारी व उससे हुए लाभ के अनुरूप मुआवज़े में योगदान देना चाहिए.

समिति के अनुसार, यह ज़िम्मेदारी आज भी बनी हुई है क्योंकि दासता और अफ़्रीकी लोगों की तस्करी के प्रभाव अब भी “व्यवस्थागत नस्लीय भेदभाव और संरचनात्मक असमानताओं” के रूप में दिखाई देते हैं.

विशेषज्ञों ने ख़ासतौर पर नस्लीय हिंसा, रूढ़िवादी धारणाओं और संरचनात्मक बाधाओं की ओर इशारा किया, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसरों और पर्यावरणीय सुरक्षा में असमानताएँ बढ़ाती हैं.

उन्होंने कहा कि दासता की इस विरासत को “अश्वेत-विरोधी नस्लवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों” ने और गहरा किया है.