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मेरीहुन लिंगदोह अपने किचन गार्डन में उगाई गई पत्तागोभी दिखाते हुए.

भारत: बदलाव के बीज बोते हिमालयी समुदाय

© UNDP India मेरीहुन लिंगदोह अपने किचन गार्डन में उगाई गई पत्तागोभी दिखाते हुए.

भारत: बदलाव के बीज बोते हिमालयी समुदाय

आर्थिक विकास

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय, पारम्परिक ज्ञान और स्थानीय तरीक़ों के ज़रिए टिकाऊ खाद्य प्रणालियों को सहेज रहे हैं. हिमालयी कृषि-पारिस्थितिकी पहल (HAI) उनके अनुभवों और आवाज़ को भविष्य की नीतियों और निवेश से जोड़ने का प्रयास कर रही है.

 

मेघालय के री-भोई ज़िले के उमन्गेई गाँव में 24 वर्षीय मेरिहुन लिंगदोह ने अपने परिवार के लिए पौष्टिक सब्ज़ियाँ उगाने के उद्देश्य से एक छोटा रसोई बाग़ शुरू किया.

UNDP के लघु अनुदान कार्यक्रम (SGP) के तहत प्रशिक्षण मिलने के बाद, उन्होंने खेती बढ़ाई और अतिरिक्त उपज बेचकर आमदनी भी कमानी शुरू की.

मेरिहुन कहती हैं, “प्रशिक्षण के बाद मुझे लगा कि मैं सिर्फ़ अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि बाज़ार में बेचने के लिए भी पर्याप्त उपज उगा सकती हूँ. अब गाँव के दूसरे किसान भी मुझसे अपना बाग़ शुरू करने के लिए सलाह लेते हैं.”

बन्दासुक नोंग्रुम अपने वर्मीकम्पोस्ट डिब्बों के साथ.
© UNDP India बन्दासुक नोंग्रुम अपने वर्मीकम्पोस्ट डिब्बों के साथ.

पास के उमप्लिंग गाँव में किसान बन्दासुक नोंग्रुम ने मिट्टी की उर्वरता घटने पर वर्मी-कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) बनाना शुरू किया. इसी परियोजना के समर्थन से मिट्टी की उर्वरता बढ़ी और फ़सल उत्पादन में सुधार हुआ. अब वह साल में चार बार तक फ़सल उगा पाती हैं. अतिरिक्त कम्पोस्ट की बिक्री से उन्हें आमदनी भी होती है.

बीज संरक्षण, मिश्रित खेती, कृषि वानिकी, जल संचयन, पशुपालन और स्थानीय खाद्य प्रसंस्करण जैसी परम्पराएँ हिमालयी समुदायों की खाद्य प्रणालियों का अहम हिस्सा रही हैं.

लेकिन जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि, पारम्परिक फ़सलों व पशुधन की घटती विविधता और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता से इन प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है.

सीढ़ीनुमा कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र, जो हिमालयी भू-दृश्यों को अधिक सहनसक्षम बनाते हैं.
© UNDP India सीढ़ीनुमा कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र, जो हिमालयी भू-दृश्यों को अधिक सहनसक्षम बनाते हैं.

समुदायों के अनुभवों से तैयार रोडमैप

2024 में शुरू हुई हिमालयी कृषि-पारिस्थितिकी पहल (HAI), सरकारों, शोधकर्ताओं, किसान संगठनों, महिला समूहों, नागरिक समाज और खाद्य क्षेत्र से जुड़े उद्यमों को एक मंच पर ला रही है.

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मेघालय और नागालैंड में विभिन्न पक्षों से विचार-विमर्श के आधार पर, भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए कृषि-पारिस्थितिकी रोडमैप तैयार किया जा रहा है. इसमें महिलाओं, आदिवासी और स्थानीय समुदायों की भागेदारी पर विशेष ध्यान दिया गया है.

हिमाचल प्रदेश के किसान नेक राम कहते हैं, “यह देखकर अच्छा लगता है कि हमारे विचार और अनुभव इस रोडमैप में शामिल हो रहे हैं. हमें उम्मीद है कि इससे पर्वतीय किसानों को समर्थन मिलेगा, टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिलेगा और हमारे प्राकृतिक संसाधन व पारम्परिक ज्ञान आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहेंगे.”

रोडमैप में यह भी देखा जा रहा है कि प्राकृतिक खेती, बाग़वानी, पशुपालन, वन, जल, ग्रामीण आजीविका, स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी सरकारी योजनाएँ किस तरह बेहतर तालमेल के साथ काम कर सकती हैं.

साथ ही, पीएम पोषण जैसी सार्वजनिक ख़रीद योजनाओं के ज़रिए स्थानीय, पौष्टिक और पारम्परिक खाद्य पदार्थों की माँग बढ़ाने की सम्भावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है.

कृषि-जैव विविधता और स्थानीय खाद्य अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखने में योगदान देती महिला किसान.
© UNDP India कृषि-जैव विविधता और स्थानीय खाद्य अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखने में योगदान देती महिला किसान.

महिलाओं की अहम भूमिका

हिमालयी खाद्य प्रणालियों में महिलाएँ अहम भूमिका निभाती हैं. वे खेती और बीज संरक्षण से लेकर खाद्य प्रसंस्करण, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन और परिवार के पोषण तक कई ज़िम्मेदारियाँ सम्भालती हैं.

रोडमैप में महिलाओं के नेतृत्व को बढ़ावा देने, भूमि, जल, वित्त और कौशल तक उनकी पहुँच बेहतर बनाने और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागेदारी बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया है. साथ ही, महिलाओं पर काम का बोझ कम करने और उनके नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों को मज़बूत बनाने की बात कही गई है.

UNDP अपनी जैव विविधता वित्त पहल (BIOFIN) के ज़रिए HAI को सहयोग दे रहा है. इसमें हिमालयी समुदायों के साथ पहले किए गए कार्यक्रमों से मिले अनुभवों को भी शामिल किया जा रहा है.

UNDP भारत की स्थानीय प्रतिनिधि डॉक्टर एंजेला लुसिगी कहती हैं, “हिमालयी समुदायों के पास पीढ़ियों से यह ज्ञान है कि उनके स्थानीय परिवेश में क्या कारगर है. अब ज़रूरत इस ज्ञान को बाज़ारों, निवेश और नीतिगत समर्थन से बेहतर ढंग से जोड़ने की है.”

HAI को अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) और जर्मनी के आर्थिक सहयोग एवं विकास मंत्रालय (BMZ) का समर्थन प्राप्त है. इसका समन्वय विश्व भविष्य परिषद और IFOAM–Organics International कर रहे हैं. भारत में इसे अन्तरराष्ट्रीय जैवविविधता गठबन्धन और CIAT लागू कर रहे हैं. इसमें UNDP तकनीकी भागीदार है.

अब लक्ष्य इस रोडमैप को ठोस कार्रवाई में बदलना है, ताकि पीढ़ियों से हिमालयी खाद्य प्रणालियों को सहेजते आए समुदायों का ज्ञान और अनुभव भविष्य की नीतियों और निवेश को भी दिशा दे सके.

इस लेख का विस्तृत संस्करण पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.