बढ़ता समुद्र-स्तर, बढ़ते ख़तरे: मानवता के लिए इसके क्या मायने हैं?
महासागर का स्तर अब दर्ज इतिहास में किसी भी समय की तुलना में अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है. इसके प्रभाव अभी से महसूस किए जा रहे हैं और ख़तरे लगातार बढ़ रहे हैं.
ज़मीन के बड़े हिस्से पानी में डूब रहे हैं, घरों में बाढ़ का पानी घुस रहा है और लोगों की आजीविका छिन रही है. इससे अधिक सुरक्षित भविष्य की तलाश में जुटे लोगों के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं.
समुद्र-स्तर में बढ़ोत्तरी का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है. इसका मानवाधिकारों, आर्थिक विकास, स्वास्थ्य, संस्कृति, अनेक देशों के भविष्य और बुनियादी मानवीय गरिमा पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है.
इस संकट से विकसित एवं विकासशील, दोनों तरह के देश प्रभावित हो रहे हैं और दुनिया का शायद ही कोई हिस्सा इससे पूरी तरह अछूता है.
बढ़ता समुद्र-स्तर आने वाली पीढ़ियों के लिए गम्भीर संकट बनेगा या एक ऐसी चुनौती जिससे निपटा जा सके, यह आज कार्रवाई करने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की हमारी क्षमता पर निर्भर करेगा.
समुद्र-स्तर में वृद्धि का क्या अर्थ है?
सरल शब्दों में कहें तो, मानव गतिविधियों से पैदा हुए जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर लगातार बढ़ रहा है.
वर्ष 2014 से 2023 के बीच वैश्विक समुद्र-स्तर में औसतन 4.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष की वृद्धि हुई. 2024 में यह दर रिकॉर्ड 5.9 मिलीमीटर तक पहुँच गई.
सबसे आशावादी अनुमान के तहत भी, वर्ष 2100 तक समुद्र-स्तर में लगभग 0.55 मीटर तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है. सबसे ख़राब स्थिति में यह बढ़ोत्तरी एक मीटर से अधिक हो सकती है.
वहीं, अत्यधिक उत्सर्जन वाले परिदृश्य में इस सदी के अन्त तक समुद्र-स्तर में लगभग 2 मीटर तक की बढ़ोत्तरी की सम्भावना कम है, लेकिन यदि ऐसा हुआ तो इसके प्रभाव बेहद गम्भीर हो सकते हैं.
समुद्र-स्तर क्यों बढ़ रहा है?
- हिमनदों और विशाल हिम-चादरों के पिघलने से.
- महासागर गर्म होने पर समुद्री पानी फैलता है और अधिक जगह घेरता है, जिससे समुद्र-स्तर बढ़ता है.
- पृथ्वी पर जमा हो रही अतिरिक्त गर्मी का लगभग 91 प्रतिशत महासागर सोख रहे हैं. इसलिए, हानिकारक गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म हो रही है, समुद्र-स्तर में आगे और बढ़ोत्तरी होना लगभग तय है.
लोगों पर असर
दुनिया भर में लगभग 77 करोड़ लोग, यानि हर 10 में से क़रीब एक व्यक्ति, ऐसे इलाक़ों में रहते हैं जो समुद्र में ऊँचे ज्वार के स्तर से पाँच मीटर से भी कम ऊँचाई पर हैं.
समुद्र के इतने क़रीब रहने के असर अब साफ़ दिखाई देने लगे हैं.
- मीठे पानी के कुओं और खेती की ज़मीन में खारापन बढ़ रहा है.
- बाढ़ से अस्पतालों, स्कूलों और स्वच्छता प्रणालियों को नुक़सान पहुँच रहा है.
- पानी से फैलने वाली बीमारियों का ख़तरा बढ़ रहा है, जिससे पेयजल आपूर्ति पर असर पड़ रहा है और लोगों में मानसिक तनाव भी बढ़ रहा है.
- मत्स्य पालन और पर्यटन, जो अनेक तटीय अर्थव्यवस्थाओं की रीढ़ हैं, प्रभावित हो रहे हैं.
- कुछ अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2050 तक दुनिया भर में 1.2 अरब लोग विस्थापित हो सकते हैं. लोग न केवल सुरक्षित जगह की तलाश में होंगे, बल्कि ऐसी जगह भी चाहेंगे जहाँ वे अपनी आजीविका फिर से खड़ी कर सकें.
- नए साक्ष्य संकेत देते हैं कि कुछ क्षेत्रों में समुद्र-स्तर बढ़ने से जुड़े ख़तरों को अब तक काफ़ी कम आँका गया हो सकता है. इसका अर्थ है कि पहले के अनुमानों की तुलना में करोड़ों अधिक लोग जोखिम में हो सकते हैं.
इस संकट का असर केवल भौतिक नुक़सान तक सीमित नहीं है. साँस्कृतिक विरासत, पुश्तैनी ज़मीन और पारम्परिक जीवन-शैली भी खो रही हैं, जिसका लोगों की मानसिक और भावनात्मक सेहत पर गहरा असर पड़ रहा है.
आर्थिक क़ीमत
- तटीय बुनियादी ढाँचे को पहुँचने वाला नुक़सान पहले ही 1.8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है.
- अनुकूलन उपाय नहीं किए गए, तो दुनिया भर में हर वर्ष होने वाला नुक़सान 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है.
- लघु द्वीपीय विकासशील देशों को 1970 से 2020 के बीच जलवायु सम्बन्धी आपदाओं से 153 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ.
- अमेरिका में आपदा के जोखिम वाले इलाक़ों में 2020 से 2023 के बीच मकान बीमा प्रीमियम में 33 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई.
- दुनिया के 80 प्रतिशत से अधिक व्यापार को सम्भालने वाले बन्दरगाहों पर बाढ़ और बढ़ते समुद्री-स्तर का ख़तरा लगातार बढ़ रहा है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृँखलाओं के लिए भी जोखिम पैदा हो रहे हैं.
सबसे अधिक ख़तरा कहाँ है?
समुद्र-स्तर बढ़ने के सबसे बड़े ख़तरे का सामना कर रहे कई देशों का उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है, और इससे निपटने के संसाधन भी सीमित हैं.
- छोटे द्वीपीय देश: प्रशान्त क्षेत्र के कुछ देशों में स्थानीय समुद्र-स्तर वैश्विक औसत की तुलना में दोगुनी से भी अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है. बार-बार आने वाली बाढ़ के कारण ये देश विशेष रूप से संवेदनशील हैं.
- निचले इलाक़ों में बसे डेल्टा शहर: ढाका, मुम्बई व कोलकाता जैसे शहरों में 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के घर, आजीविका और जीवन ख़तरे में हैं.
- तटीय महानगर: मियामी, न्यूयॉर्क और ग्वांगझोउ जैसे शहरों में बुनियादी ढाँचे को भारी क्षति से ख़रबों डॉलरों का आर्थिक नुक़सान हो सकता है.
क्या इसे रोका जा सकता है?
पूरी तरह नहीं. समुद्र-स्तर में कुछ बढ़ोत्तरी अब लगभग तय हो चुकी है.
लेकिन आगे इसमें कितनी बढ़ोत्तरी होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हानिकारक उत्सर्जन में अभी कितनी तेज़ी और कितने बड़े पैमाने पर कटौती की जाती है.
एक बड़ा चिन्ता का विषय अंटार्कटिका का थ्वाइट्स हिमनद है, जो लगभग 1 लाख 90 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है.
यदि यह हिमनद ढहता है, तो अकेले इसके कारण समुद्र-स्तर में अचानक और अपरिवर्तनीय रूप से आधे मीटर से अधिक की बढ़ोत्तरी हो सकती है.
यह एक वास्तविक और सम्भावित ‘टिपिंग पॉइंट’ हो सकता है, यानि ऐसी सीमा जिसके पार पहुँचने के बाद हालात को वापस पहले जैसी स्थिति में लाना सम्भव नहीं होगा.
अपरिहार्य बदलावों के अनुरूप ढलना
वैश्विक तापमान और उसके साथ समुद्र-स्तर बढ़ने की रफ़्तार को धीमा करने के लिए जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने वाले जीवाश्म ईंधनों से दूरी बनाना दुनिया की सबसे बड़ी प्राथमिकता है. लेकिन इसके साथ-साथ अनुकूलन उपायों पर भी अभी से काम करना ज़रूरी है.
- आपदा आने से पहले लोगों को सुरक्षित करने के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ.
- समुद्री दीवारें, मैन्ग्रोव संरक्षण, रेत के टीलों की बहाली और ख़तरे वाले इलाक़ों से लोगों का योजनाबद्ध तरीक़े से सुरक्षित स्थानों पर जाना.
- बेहतर आँकड़े और निगरानी, क्योंकि अनेक क्षेत्रों में अब भी समुद्री परिस्थितियों की बुनियादी निगरानी पर्याप्त नहीं है.
- भूमि के पानी में डूबने की स्थिति में देश की सम्प्रभुता और समुद्री सीमाओं से जुड़े क़ानूनी मुद्दों पर स्पष्टता.
विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के लिए हर साल लगभग 310 से 365 अरब डॉलर की ज़रूरत है, जबकि 2023 में इसके लिए वैश्विक स्तर पर केवल 26 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता उपलब्ध थी.
निष्कर्ष
बढ़ता समुद्र-स्तर भले ही एक अटल चुनौती लगे. लेकिन इसका असर कितना गम्भीर होगा और सबसे अधिक नुक़सान किसे झेलना पड़ेगा, यह आज लिए जाने वाले फ़ैसलों पर निर्भर करेगा.
आख़िरकार, लोगों के घरों, आजीविका, इतिहास और पहचान की रक्षा के लिए जलवायु अनुकूलन हेतु वित्तीय सहायता बढ़ाना ज़रूरी है. साथ ही, यह सुनिश्चित करना होगा कि बढ़ता समुद्र-स्तर देशों की सम्प्रभु स्थिति को प्रभावित न करे और इस संकट को तत्काल स्थाई वैश्विक प्राथमिकता दी जाए.
समुद्र-स्तर पहले से कहीं तेज़ी से बढ़ रहा है, यूएन रिपोर्ट
सोमवार को पलाऊ में पेश की गई एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि समुद्र-स्तर पहले से कहीं तेज़ी से बढ़ रहा है और दुनिया भर में लोगों के लिए “सबसे गम्भीर ख़तरों में से एक” बनता जा रहा है.
रिपोर्ट में समुद्र-स्तर बढ़ने के सामाजिक, आर्थिक और क़ानूनी प्रभावों के साथ-साथ उनसे निपटने के उपायों पर भी ध्यान दिया गया है. इसे 24 सितम्बर को इस मुद्दे पर होने वाली संयुक्त राष्ट्र की उच्चस्तरीय बैठक से पहले तैयार किया गया है.
पत्रकारों से बातचीत में संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग के प्रमुख नवीद हनीफ़ ने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास तेज़ करना बेहद ज़रूरी है.
उन्होंने कहा, “समुद्र-स्तर बढ़ रहा है. हमारी सहनसक्षमता, वित्तीय सहायता और महत्वाकाँक्षा को उससे भी तेज़ी से बढ़ना होगा.”