म्याँमार में रोहिंग्या समुदाय ‘हृदयविदारक’ पीड़ा व क्रूरता का शिकार
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा है कि म्याँमार में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय “कई स्तरों पर ऐसी पीड़ा, दुर्दशा और क्रूरता झेल रहा है, जो दिल दहला देने वाली है.”
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने यह टिप्पणी संयुक्त राष्ट्र के एक स्वतंत्र तथ्य-अन्वेषी मिशन की नई रिपोर्ट जारी होने के बाद की. रिपोर्ट के अनुसार, म्याँमार में विशेषकर अल्पसंख्यकों के लिए मानवाधिकारों की स्थिति, अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है.
म्याँमार में सेना और विभिन्न प्रतिरोधी गुटों के बीच भीषण गृहयुद्ध जारी है.
अगस्त 2017 में म्याँमार की सेना ने पश्चिमी राख़ीन प्रान्त में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ निर्मम कार्रवाई की थी. इसके बाद 7 लाख 40 हज़ार से अधिक लोग बांग्लादेश भाग गए थे, जिनमें से अधिकतर आज भी वहाँ शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं.
पाँच वर्ष पहले सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बाद से सैन्य जुंटा कम से कम 8,075 लोगों की जान ले चुका है और लाखों लोगों को जबरन सेना में भर्ती किया है.
वहीं, राख़ीन के अधिकतर हिस्से पर नियंत्रण रखने वाली विद्रोही अराकान आर्मी पर भी रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर दुर्व्यवहार के आरोप हैं.
जून 2025 से मई 2026 की अवधि पर केन्द्रित रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2025 में एक सशस्त्र गुट ने अन्य सैन्य-विरोधी समूहों को आपूर्ति देना बन्द कर दिया, जिससे सेना को बढ़त मिली. इसके बाद सेना ने “विरोध को कुचलने और लोगों को झुकने पर मजबूर करने” के लिए मानवीय सहायता तक रोक दी.
रोहिंग्या समुदाय की पीड़ा जारी
रिपोर्ट के अनुसार, रोहिंग्या समुदाय “सभी पक्षों के हाथों सुनियोजित भेदभाव झेल रहा है और दोषियों को पूरी तरह दंडमुक्ति हासिल है.”
राख़ीन प्रान्त के अधिकतर हिस्से पर अराकान आर्मी का नियंत्रण होने के बाद, म्याँमार की सेना ने विद्रोहियों को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए हैं. रिपोर्ट की अवधि में कम से कम 2,592 हवाई हमले हुए, जिनमें कई नागरिक इलाक़े भी प्रभावित हुए.
2017 में हज़ारों रोहिंग्या लोगों की जान लेने वाली सेना ने तब से क़रीब 1 लाख 25 हज़ार लोगों को जबरन भर्ती किया है, जिनमें बड़ी संख्या में रोहिंग्या भी हैं. रिपोर्ट के अनुसार, कुछ लोगों को जबरन शराब पिलाई गई, आराम नहीं करने दिया गया और शारीरिक यातनाएँ दी गईं.
“समावेशी शासन और समान व्यवहार” का दावा करने वाली अराकान आर्मी पर भी रोहिंग्या लोगों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने, उनसे जेल जैसे हिरासत शिविर बनवाने, सीमा पार आवाजाही पर सख़्त पाबन्दियाँ लगाने और मनमाने ढंग से हत्या व यातना करने के आरोप हैं.
हिरासत में रहे रोहिंग्याओं ने बताया कि उन्हें बाँस से पीटा गया, माचिस से जलाया गया और उल्टा लटकाकर तब तक घुमाया गया जब तक वे बेहोश नहीं हो गए.
कुछ लोगों ने जननांगों पर मिर्च लगाए जाने और नाख़ून उखाड़े जाने की भी बात कही. रिपोर्ट के अनुसार, एक जनसंहार के बाद एक रोहिंग्या बच्चे को अपने ही समुदाय के लोगों की हड्डियाँ और खोपड़ियाँ हटाने के लिए मजबूर किया गया.
टकराव की अर्थव्यवस्था से समुदाय तबाह
रिपोर्ट के अनुसार, 2021 के सैन्य तख़्तापलट के बाद म्याँमार अफ़ीम और कृत्रिम मादक पदार्थों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है. इसके साथ ही, अरबों डॉलर के ऑनलाइन घोटाले और दुर्लभ खनिजों का अनियंत्रित खनन भी तेज़ी से बढ़ा है.
क़ानून का शासन कमज़ोर होने से इन अवैध गतिविधियों के ज़रिए टकराव के लिए धन जुटाया गया, अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक नैटवर्क मज़बूत हुए और पर्यावरण को नुक़सान पहुँचा.
रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती संख्या में महिलाओं व लड़कियों को खनन क्षेत्र में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिससे उनके लिए यौन हिंसा और आवाज़ उठाने पर बदले की कार्रवाई का ख़तरा बढ़ गया है.
रिपोर्ट के अनुसार, “दोषियों को बाहरी जाँच एवं क़ानूनी कार्रवाई से बचाया गया, जिससे दंडमुक्ति बढ़ी और बार-बार यौन हिंसा व श्रम शोषण होता रहा.”
विदेशी प्रबन्धक भी कई मामलों में म्याँमार के कामगारों का शोषण करते हैं, उन्हें ख़तरनाक परिस्थितियों में काम करने और क़र्ज़ के जाल में फँसे रहने के लिए मजबूर करते हैं.
रोहिंग्या समुदाय के बड़े पैमाने पर जबरन विस्थापन के नौ वर्ष पूरे होने पर, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने मंगलवार को कहा कि म्याँमार, बांग्लादेश और क्षेत्र के अन्य हिस्सों में रोहिंग्या लोग “बढ़ती असुरक्षा, घटते संरक्षण एवं स्थाई समाधान की कम होती सम्भावनाओं” का सामना कर रहे हैं. जीवनरक्षक सहायता के लिए धन में कटौती ने हालात और कठिन बना दिए हैं.