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म्याँमार: नागरिकों पर सुनियोजित सैन्य हमलों के प्रमाण

म्यांमार के रखाइन राज्य में एक आईडीपी शिविर में एक अस्थायी बांस के आश्रय के अंदर, एक बुने हुए टोकरी में सोता हुआ बच्चा, एक माँ और एक अन्य बच्चा, कपड़े लटके हुए और दीवारों से छनती हुई सूरज की रोशनी।
© WFP मध्य राख़ीन प्रान्त में 2025 में एक आन्तरिक रूप से विस्थापित लोगों का शिविर. म्याँमार में अनुमानित 36 लाख लोग पहले से ही विस्थापित हैं और 2026 में यह संख्या बढ़कर लगभग 40 लाख होने की आशंका है.

म्याँमार: नागरिकों पर सुनियोजित सैन्य हमलों के प्रमाण

मानवाधिकार

मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त स्वतंत्र जाँचकर्ताओं के अनुसार, म्याँमार की सेना लगातार नागरिकों को निशाना बना रही है. घरोंस्कूलों और विस्थापित लोगों के शिविरों पर हवाई हमलों के अलावामनमाने तरीक़े से लोगों को हिरासत में लिए जानेयातनाएँ देने और यौन हिंसा के मामले भी सामने आए हैं.

म्याँमार संकट क्यों अहम है?
  • नागरिक निशाने पर: घरों, स्कूलों और अस्पतालों पर हवाई हमले.
  • दुर्व्यवहार जारी: यातना, मनमाने ढंग से हिरासत में रखने और यौन हिंसा के मामले दर्ज.
  • सबूत सुरक्षित: अभियोजन में मदद के लिए 1,600 से अधिक स्रोतों से जानकारी जुटाई गई.

ये निष्कर्ष म्याँमार के लिए संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जाँच तंत्र (IIMM) की मंगलवार को जारी वार्षिक रिपोर्ट में सामने आए हैं, जिसमें जुलाई 2025 से जून 2026 तक की स्थिति का ब्यौरा दिया गया है.

जाँच तंत्र के प्रमुख निकोलस कौमजियान ने कहा कि उनकी टीम समुदायों पर हो रहे हवाई हमलों और इनके पीछे की कमान व्यवस्था की जाँच कर रही है, ताकि पता लगाया जा सके कि इन हमलों के आदेश कैसे और कहाँ से दिए गए.

उन्होंने कहा, “ख़ासतौर पर कई हवाई हमलों में स्कूलों को निशाना बनाया गया है, जिसका ख़ामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ा है. अस्पतालों पर भी हमले किए गए हैं. जाँचकर्ता हमलों की जगह और इस्तेमाल किए गए हथियारों से जुड़े सबूत जुटा रहे हैं.”

फ़रवरी 2021 में सेना के सत्ता पर क़ाबिज़ होने के बाद से म्याँमार हिंसक टकराव की चपेट में है. सेना ने निर्वाचित सरकार को हटाकर राष्ट्रपति विन म्यिन्त, स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची समेत शीर्ष नेताओं को हिरासत में ले लिया था.

सैन्य तख़्तापलट के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए और फिर सशस्त्र प्रतिरोध आन्दोलन उभरे, जिनका अब देश के बड़े हिस्सों पर नियंत्रण है.

लगातार हमले

रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी में सम्पन्न हुए चुनावों से पहले हमले तेज़ हो गए थे और उसके बाद भी जारी रहे.

जाँचकर्ताओं ने घरों, स्कूलों, चिकित्सा केन्द्रों, धार्मिक स्थलों और विस्थापित लोगों के शिविरों पर हुए हमलों की पड़ताल की और इनमें शामिल कुछ सैन्य इकाइयों की पहचान भी की.

उन्होंने पाया कि सेना द्वारा मोटर चालित ग्लाइडर और ड्रोन का बढ़ता इस्तेमाल, नागरिकों के लिए हमलों का पहले से अनुमान लगाना और मुश्किल बना रहा है, जिससे उन्हें बच निकलने या सुरक्षित जगह पहुँचने के लिए बहुत कम समय मिलता है.

म्यांमार के महाआंगम्याय में एक क्षतिग्रस्त पैगोडा का दृश्य, जिसमें नीले आकाश के नीचे ढही हुई ईंटों की संरचना और उजागर पत्थर की सीढ़ियाँ दिखाई दे रही हैं।
© UNOPS/KMT मध्य मागुए में एक व्यावसायिक स्थल पर सेना के हवाई हमले के बाद का दृश्य. (फ़ाइल फ़ोटो)

ज़िन्दगियों पर गहरा असर

निकोलस कौमजियान ने कहा, “हमने जो भी सबूत जुटाए हैं, उनके पीछे ऐसे लोग हैं जिनकी ज़िन्दगियाँ इन अपराधों से तबाह हुई हैं.”

उन्होंने कहा, “म्याँमार में समुदाय न केवल लगातार हिंसा के ख़तरे में जी रहे हैं, बल्कि जो कुछ उन्होंने झेला है, उसके गहरे और दीर्घकालिक असर से भी जूझ रहे हैं.”

जाँचकर्ताओं ने सेना द्वारा संचालित हिरासत केन्द्रों में व्यापक यातना और यौन हिंसा के मामले भी दर्ज किए हैं. इनमें 2025 के उस क़ानून से जुड़े मामले भी शामिल हैं, जिसके तहत चुनावों की आलोचना को अपराध माना गया है. ऑनलाइन आलोचनात्मक टिप्पणी करने जैसे मामलों में भी लोगों को 20 साल तक की जेल या मृत्युदंड का सामना करना पड़ सकता है.

हालाँकि अधिकाँश सबूत सेना और उससे जुड़े मिलिशिया समूहों से सम्बन्धित हैं, जाँच तंत्र ने कहा कि वह सेना का विरोध करने वाले सशस्त्र समूहों के दुर्व्यवहार की भी जाँच कर रहा है.

ये निष्कर्ष 1,600 से अधिक स्रोतों से जुटाई गई जानकारी पर आधारित हैं, जिनमें 750 से अधिक प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, तस्वीरें, वीडियो, फॉरेंसिक सबूत और उपग्रह तस्वीरें शामिल हैं.

IIMM क्या है?

म्याँमार के लिए स्वतंत्र जाँच तंत्र (IIMM) की स्थापना संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने 2018 में की थी. इसका उद्देश्य 2011 से म्याँमार में हुए सबसे गम्भीर अपराधों के सबूत जुटाना और सुरक्षित रखना है, ताकि भविष्य में मुक़दमों में उनका इस्तेमाल किया जा सके.

यह तंत्र स्वयं मुक़दमे नहीं चलाता, बल्कि अपने सबूत उन अदालतों और अधिकारियों के साथ साझा करता है जो ऐसा कर सकते हैं.

इनमें अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय, रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही अर्जेन्टीना की अदालतें और अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय शामिल हैं. अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय इस बात पर विचार कर रहा है कि 2016-2017 में जातीय रोहिंज्या समुदाय के ख़िलाफ़ कार्रवाई के दौरान म्याँमार ने जनसंहार कन्वेंशन का उल्लंघन किया था या नहीं.

2017 में तत्कालीन यूएन मानवाधिकार प्रमुख ज़ैद राअद अल हुसैन ने म्याँमार की सेना द्वारा रोहिंग्या समुदाय के उत्पीड़न की निन्दा की थी, जिसके कारण लाखों लोग पड़ोसी बांग्लादेश में शरण लेने के लिए मजबूर हुए थे.

उन्होंने जिनीवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से कहा था, “यह स्थिति जातीय सफ़ाए का एक स्पष्ट उदाहरण प्रतीत होती है.”