भारत: सपनों से अवसरों तक का सफ़र
भारत के महाराष्ट्र राज्य में शिक्षा और कौशल विकास से जुड़ी साझेदारियाँ, आदिवासी युवजन के लिए आगे बढ़ने और नए अवसर हासिल करने के रास्ते खोल रही हैं.
पूर्वी महाराष्ट्र के घने जंगलों से घिरा गढ़चिरौली ज़िला, गोंड आदिवासी समुदाय की एक बड़ी आबादी का घर है. लेकिन दूरदराज़ इलाक़ा होने के कारण यहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नए अनुभवों और बेहतर करियर अवसरों तक पहुँच लम्बे समय से सीमित रही है.
ऐसे में कई युवाओं के लिए सरकारी आश्रम स्कूल से उच्च शिक्षा तक का सफ़र, और ख़ासतौर पर विदेश में पढ़ाई का सपना, आसान नहीं होता.
इन चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP), महाराष्ट्र के जनजातीय विकास विभाग (TDD) के साथ मिलकर शिक्षा जगत, उद्योग और नागरिक समाज के साथ साझेदारियाँ विकसित कर रहा है, ताकि आदिवासी युवजन को बेहतर शिक्षा, कौशल एवं रोज़गार के अवसर मिल सकें.
गढ़चिरौली से ओहायो तक
चार बहनों में सबसे छोटी योगिता वारखड़े एक गोंड परिवार से आती हैं. उनकी पढ़ाई की शुरुआत एक सरकारी आश्रम स्कूल से हुई.
अपने परिवार में उच्च शिक्षा हासिल करने वाली पहली पीढ़ी के कई विद्यार्थियों की तरह, योगिता के लिए भी मराठी माध्यम से अंग्रेज़ी में पढ़ाई की ओर बढ़ना आसान नहीं था. आर्थिक मुश्किलों के कारण विदेश में पढ़ाई करने का सपना भी लगभग असम्भव लगता था.
आज वह अमेरिका की ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में पोस्टडॉक्टरल शोधार्थी हैं. महाराष्ट्र के जनजातीय विकास विभाग की विदेश छात्रवृत्ति योजना ने उनके इस सफ़र को सम्भव बनाने में अहम भूमिका निभाई.
योगिता कहती हैं, “मेरा सपना भारत लौटकर ग्रामीण समुदायों के उन विद्यार्थियों की मदद करना है, जो विदेश में पढ़ना चाहते हैं, लेकिन अपने सपनों को पूरा करने के लिए उनके पास सही मार्गदर्शन या आर्थिक सहायता नहीं है.”
योगिता की कहानी, ऐसे ही अनेक आदिवासी युवजन की आकाँक्षाओं और उनके सामने मौजूद चुनौतियों की झलक पेश करती है.
महाराष्ट्र में 15 से 24 वर्ष की आयु के क़रीब 20 लाख आदिवासी युवजन हैं. अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE) 2023–24 के अनुसार, राज्य में अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों का सकल नामांकन अनुपात 19.1 है, जबकि राज्य का कुल औसत 36.7 है.
वर्ष 2023 से UNDP, जनजातीय विकास विभाग को ऐसी साझेदारियाँ विकसित करने में सहयोग दे रहा है, जिनका उद्देश्य आदिवासी युवजन को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उद्योग की ज़रूरतों के अनुरूप कौशल और सार्थक रोज़गार से जोड़ना है.
पूर्व छात्र सम्पर्क कार्यक्रम (Alumni Connect Programme) के ज़रिए सरकारी आश्रम स्कूलों और छात्रावासों के दो हज़ार से अधिक विद्यार्थियों को दुनिया के प्रमुख संस्थानों में पढ़ रहे या काम कर रहे आदिवासी पूर्व छात्रों से जोड़ा जा रहा है.
योगिता समेत विदेश छात्रवृत्ति योजना का लाभ पाने वाले विद्यार्थियों के अनुभवों को भी दर्ज किया जा रहा है, ताकि अन्य आदिवासी युवजन भी अपने लिए उपलब्ध सम्भावनाओं को पहचान सकें.
कौशल से मिली स्थिरता
पुणे ज़िले के जुन्नर तालुका के 29 वर्षीय अक्षय बोकड़ के लिए एक नया अवसर, स्थानीय सामुदायिक नेटवर्क पर साझा किए गए एक व्हाट्सऐप सन्देश के ज़रिए आया.
उस समय वह ठाणे के पास एक औद्योगिक क्षेत्र में ठेका मज़दूर के रूप में काम कर रहे थे. काम नियमित नहीं था और रोज़गार की कोई स्थिरता नहीं थी. साथ ही उन पर अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी थी.
फोर्कलिफ्ट ऑपरेटर प्रशिक्षण कार्यक्रम के ज़रिए अक्षय ने ऐसे व्यावहारिक कौशल हासिल किए, जिनकी भारत के तेज़ी से बढ़ते विनिर्माण और वेयरहाउस क्षेत्रों में माँग है.
आज वह वापी में Godrej Material Handling से जुड़े एक विक्रेता के यहाँ औपचारिक रूप से कार्यरत हैं और सालाना ₹2.6 लाख कमाते हैं. स्थिर रोज़गार से अब वह अपने माता-पिता की देखभाल करने के साथ-साथ अधिक भरोसे के साथ भविष्य की योजनाएँ भी बना पा रहे हैं.
एकलव्य कुशल कौशल विकास कार्यक्रम के तहत अब तक 10 हज़ार से अधिक आदिवासी युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें 42प्रतिशत महिलाएँ हैं.
इस पहल के तहत जनजातीय विकास विभाग, UNDP, गोदरेज समूह और वाधवानी फ़ाउंडेशन मिलकर प्रशिक्षण को उद्योग की बदलती ज़रूरतों के अनुरूप ढाल रहे हैं, ताकि युवाओं को व्यावहारिक कौशल और कामकाज का अनुभव मिल सके.
प्रशिक्षकों का क्षमता निर्माण
युवाओं को कामकाज की दुनिया के लिए तैयार करने के साथ-साथ, उन्हें प्रशिक्षण देने वालों की क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है.
ज्योति पोपट वाडेकर ने जनजातीय विकास विभाग, UNDP और वाधवानी फ़ाउंडेशन द्वारा आयोजित प्रशिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लिया.
उन्होंने कहा, “इस क्षमता-विकास कार्यक्रम ने हमें उद्योग की ज़रूरतों को बेहतर ढंग से समझने में मदद की है और इससे जिन विद्यार्थियों को हम प्रशिक्षण देते हैं, वे अधिक आत्मविश्वासी बन सकेंगे.”
ज्योति जैसे प्रशिक्षक उद्योग की नई जानकारी और अनुभव को विद्यार्थियों तक पहुँचाकर, सैकड़ों आदिवासी युवजन को ऐसे कौशल एवं आत्मविश्वास विकसित करने में मदद कर सकते हैं, जिनकी कामकाज की दुनिया में बढ़ती माँग है.
साझेदारियों से बढ़ती सम्भावनाएँ
योगिता, अक्षय और ज्योति की राहें अलग-अलग हैं. योगिता उच्च शिक्षा के लिए विदेश पहुँचीं, अक्षय ने कौशल प्रशिक्षण के ज़रिए स्थिर रोज़गार हासिल किया और ज्योति अब अन्य युवाओं को आगे बढ़ने के लिए तैयार कर रही हैं.
9 अगस्त को मनाए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस पर ये अनुभव दिखाते हैं कि किस तरह शिक्षा, कौशल, मार्गदर्शन और पेशेवर नेटवर्क तक बेहतर पहुँच से आदिवासी युवजन अपनी आकाँक्षाओं को वास्तविक अवसरों में बदल सकते हैं.