तापलहरों और ऊर्जा संकट से खाद्य क़ीमतों पर दबाव
भीषण तापलहरों और जारी भू-राजनैतिक अनिश्चितता से दुनिया भर में ऊर्जा क़ीमतें प्रभावित हुईं, जिससे पिछले महीने प्रमुख खाद्य वस्तुओं की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई.
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के शुक्रवार को जारी नए आँकड़ों के अनुसार, जुलाई में प्रमुख खाद्य वस्तुओं की क़ीमतें पिछले साल इसी महीने की तुलना में एक प्रतिशत अधिक रहीं.
यह क्यों महत्वपूर्ण है
- खाद्य महंगाई: प्रमुख खाद्य वस्तुओं की क़ीमतें अब भी 2025 के स्तर से ऊपर हैं.
- जलवायु का असर: तापलहरों और अल-नीनो से फ़सलों की पैदावार पर ख़तरा बना हुआ है.
- हिंसक टकराव का असर: युद्ध और भू-राजनैतिक तनाव से खाद्य व ऊर्जा बाज़ारों में अनिश्चितता बढ़ रही है.
- भुखमरी का जोखिम: कुछ क्षेत्रों में बेहतर पैदावार के बावजूद, लाखों लोग अब भी भूख से जूझ रहे हैं.
जुलाई में चीनी की क़ीमत में सबसे उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी दर्ज की गई, जो 5.6 प्रतिशत महंगी हुई.
FAO खाद्य मूल्य सूचकांक के अनुसार, इसकी एक प्रमुख वजह योरोपीय संघ में लगातार गर्म और शुष्क मौसम से फ़सलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका है.
वहीं एशिया के प्रमुख उत्पादक देशों में अल-नीनो से जुड़ी मौसम परिस्थितियों को लेकर भी चिन्ता बनी हुई है.
मौसम की मार
जून की तुलना में अनाज की क़ीमतों में 3.4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई.
इससे साल की शुरुआत में दर्ज गिरावट का रुख़ पलट गया और क़ीमतें जुलाई 2025 के स्तर से 6.9 प्रतिशत ऊपर पहुँच गईं.
हालाँकि पिछले महीने चावल की क़ीमतें स्थिर रहीं, लेकिन गेहूँ की वैश्विक क़ीमतों में 5.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई.
इसके पीछे यूक्रेन पर रूस के जारी व्यापक हमले के कारण काला सागर से निर्यात में लगातार व्यवधान, और कई देशों में हाल की तापलहरों से फ़सल की पैदावार पर सम्भावित असर, प्रमुख वजहें रहीं.
FAO के अनुसार, मक्के की वैश्विक क़ीमतें 3.6 प्रतिशत बढ़ीं. अमेरिका के कुछ हिस्सों में गर्म और शुष्क मौसम को लेकर चिन्ता के साथ-साथ, बढ़ते भू-राजनैतिक तनाव के बीच ऊर्जा क़ीमतों में तेज़ी का असर भी मक्के की क़ीमतों पर पड़ा.
वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक जून 2022 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गया, जिसमें दो प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई. इसकी मुख्य वजह इंडोनेशिया के बायोडीज़ल क्षेत्र से बढ़ी मांग और कच्चे तेल की ऊँची क़ीमतें रहीं.
अमेरिका में कच्चे माल की बढ़ती मांग के कारण सोयाबीन तेल महंगा हुआ, जबकि वैश्विक स्तर पर सूरजमुखी और रेपसीड तेल की क़ीमतों में गिरावट आई.
मलावी में हालात
इस बीच, संयुक्त राष्ट्र समर्थित खाद्य असुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, मलावी में पिछले दो वर्षों की तुलना में भूख की स्थिति में “उल्लेखनीय सुधार” हुआ है.
IPC के अनुसार, इसकी एक बड़ी वजह 2024-25 में अल-नीनो के गम्भीर प्रभावों के बाद, 2025-26 के कृषि मौसम में हुई अच्छी पैदावार है.
इसके बावजूद, दक्षिणी अफ़्रीका के इस देश में लगभग 19 लाख लोग गम्भीर खाद्य असुरक्षा के “संकट” स्तर का सामना कर रहे हैं. इसे पाँच स्तरों वाले IPC पैमाने पर चरण 3 में रखा गया है.
हालाँकि, अक्टूबर 2026 से मार्च 2027 के कम पैदावार वाले मौसम में हालात बिगड़ने की आशंका है. इस दौरान 26 लाख लोग संकट यानि IPC चरण 3 की स्थिति में पहुँच सकते हैं.
IPC विशेषज्ञों ने कहा, “खाद्य पदार्थों की ऊँची क़ीमतें, महंगाई और मुख्य फ़सलों का औसत से कम उत्पादन गम्भीर खाद्य असुरक्षा को बढ़ा रहे हैं. वहीं 2026-27 के वर्षा मौसम में प्रबल अल-नीनो के पूर्वानुमान को देखते हुए स्थिति पर कड़ी निगरानी की ज़रूरत है.”