भारत: नागालैंड में शिक्षा सुधारों से खुली बेहतर रोज़गार की राह
भारत के पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड में शिक्षा सुधारों से सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ है. विश्व बैंक समर्थित परियोजना के तहत, तीन वर्षों में कक्षा 10 पूरी करने वाले विद्यार्थियों की दर 34 प्रतिशत से बढ़कर 47 प्रतिशत हुई है, जिससे युवजन में उच्च शिक्षा और बेहतर रोज़गार की आकांक्षाएँ बढ़ी हैं.
स्कूल के दिनों का कोई एक शिक्षक अक्सर जीवनभर याद रह जाता है - वो, जिसने पढ़ाई में रुचि जगाई और भविष्य की राह दिखाई.
नागालैंड के कोहिमा ज़िले में गणित की शिक्षिका रोकोवोनो मेयासे ऐसी ही एक शिक्षक हैं. रूझूख्रिए राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में उनकी कक्षा अब गतिविधियों, हँसी और सीखने के उत्साह से भरी रहती है.
कुछ वर्ष पहले तक उनके पास स्पष्ट पाठ योजना नहीं होती थी और विद्यार्थियों के मन से गणित का डर दूर करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था.
उन्होंने कहा, “प्रशिक्षण के बाद मुझे समझ आया कि गणित को पढ़ाना और सीखना मज़ेदार हो सकता है. जोड़ी और समूह में काम करने से विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ा है और वे एक-दूसरे से सीख रहे हैं.”
अब उनके अनेक विद्यार्थी आगे पढ़ना और शोध, विज्ञान व इंजीनियरिंग के क्षेत्र में जाना चाहते हैं.
कक्षा 12 की छात्रा किमियेनी स्वू ने कहा, “मैं एक दिन पर्यावरण शोधकर्ता बनना चाहती हूँ.”
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तलाश
पहाड़ी और वनाच्छादित नागालैंड में दुर्गम भूभाग और सीमित सड़क सम्पर्क के कारण, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा तक पहुँच कठिन रही है. राज्य के लगभग तीन-चौथाई परिवार ग्रामीण इलाक़ों में रहते हैं और 60 प्रतिशत से अधिक आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है.
वेतन वाले 85 प्रतिशत से अधिक रोज़गार सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र में हैं, जबकि इसके बाद चर्च सबसे बड़ा नियोक्ता है. सीमित अवसरों के कारण अनेक युवजन काम की तलाश में राज्य से बाहर चले जाते हैं.
लगभग एक दशक पहले राज्य में नामांकन दर कम थी और प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने की दर देश में दूसरी सबसे अधिक थी. केवल तीन में से एक बच्चा माध्यमिक विद्यालय तक पहुँचता था और उनमें से लगभग दो-तिहाई अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते थे.
राज्य के लगभग दो हज़ार स्कूलों में पढ़ने वाले डेढ़ लाख विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालयों, विज्ञान प्रयोगशालाओं, खेल परिसरों, पर्याप्त शिक्षण सामग्री और योग्य शिक्षकों की कमी थी. ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक विद्यार्थी अपने परिवार में स्कूल जाने वाली पहली पीढ़ी थे.
पोरबा गाँव के एक ग्रामीण स्कूल प्रशासक ने बताया, “पहले शिक्षकों की गुणवत्ता और कर्मचारियों की कमी के कारण सरकारी स्कूलों पर भरोसा कम था. मगर अब स्थिति सुधर रही है.”
उन्होंने कहा, “मुझे अपने विद्यार्थियों पर गर्व है और विश्वास है कि वे अच्छे नेतृत्वकर्ता बनेंगे और राज्य के विकास में योगदान देंगे.”
स्कूलों में बदलाव की नई पहल
नागालैंड सरकार ने आधुनिक दुनिया की चुनौतियों के लिए विद्यार्थियों को बेहतर ढंग से तैयार करने के उद्देश्य से, वर्ष 2020 में विश्व बैंक के साथ पाँच करोड़ 65 लाख डॉलर की ‘नागालैंड: कक्षा शिक्षण और संसाधनों में सुधार’, यानि NECTAR परियोजना शुरू की.
यह भारत के अपेक्षाकृत वंचित पूर्वोत्तर क्षेत्र में विश्व बैंक की पहली ऐसी शिक्षा परियोजना थी, जिसे सीधे किसी राज्य सरकार ने लागू किया.
परियोजना की कार्यदल प्रमुख कनुप्रिया मिश्रा ने कहा, “परियोजना ने केवल कक्षाओं के बजाय, पूरे स्कूल तंत्र में सुधार के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया.”
इसके तहत प्रशासन और शिक्षक प्रबन्धन प्रणालियों को मज़बूत बनाया गया, बुनियादी ढाँचे का विस्तार किया गया और शिक्षण की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान दिया गया. साथ ही, 16 स्कूल परिसरों को बदलाव के केन्द्र के रूप में चुना गया.
परियोजना के परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं. शैक्षणिक वर्ष 2024-25 तक कक्षा 10 पूरी करने वाले विद्यार्थियों की दर 34 प्रतिशत से बढ़कर 47 प्रतिशत हो गई – यानि तीन वर्षों में 13 प्रतिशत अंकों की वृद्धि.
परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, कक्षा तीन में भाषा के अंक वर्ष 2021 के 60 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 63 प्रतिशत और गणित के अंक 51 प्रतिशत से बढ़कर 57 प्रतिशत हो गए.
बदलाव को गति देने वाली व्यवस्थाएँ
परियोजना के तहत स्कूल नेतृत्वकर्ताओं को अपनी नई ज़िम्मेदारियाँ समझने और स्कूलों की समस्याओं से बेहतर ढंग से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है.
अगस्त 2026 तक पूरी तरह शुरू होने वाली नई डिजिटल प्रणालियों से शिक्षकों की उपस्थिति पर नज़र रखी जाएगी और विद्यार्थियों के नामांकन, प्रगति व सीखने के स्तर की ताज़ा जानकारी उपलब्ध होगी.
अब तक ज़िला और उप-ज़िला स्तर के लगभग 44 प्रतिशत शिक्षा प्रबन्धकों को आधुनिक प्रबन्धन पद्धतियों में प्रशिक्षित किया जा चुका है, जो तय लक्ष्य से अधिक है.
जोत्सोमा के राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की उप-प्रधानाचार्य अलुओउ शुया ने कहा, “अब हम अपने स्कूलों के सामने आने वाली समस्याओं से निपट सकते हैं और इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है.”
परियोजना के प्रोत्साहन अनुदानों से विद्यार्थियों को चित्रकला, क्रोशिया, बढ़ईगीरी, बाग़वानी और अन्य व्यावहारिक कौशल भी सिखाए जा रहे हैं.
पारम्परिक टोकरी बुनना सीख रहे कक्षा नौ के छात्र मेंगुलहुली नागी ने कहा, “मुझे यह काम बहुत अच्छा लगता है. एक दिन मैं अपना व्यवसाय शुरू करना और नागालैंड में रोज़गार पैदा करना चाहता हूँ.”
रटने से समझने की ओर
शिक्षकों को ऐसी आधुनिक शिक्षण पद्धतियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जो विद्यार्थियों की भागेदारी, आलोचनात्मक सोच और आत्मविश्वास बढ़ाती हैं. रटकर सीखने के आदी विद्यार्थियों के लिए यह एक बड़ा बदलाव है.
लेखाशास्त्र के शिक्षक मोसेस यिमचुंगर ने कहा, “मैं 15 वर्षों से पढ़ा रहा हूँ, मगर अब मैंने डिजिटल कौशल सीखे हैं.”
उन्होंने कहा, “आँकड़े सबकुछ बदल देते हैं. वे विषय को वास्तविक दुनिया से जोड़ते हैं. जब यह पता चलता है कि विद्यार्थी कहाँ कमज़ोर हैं, तो उसके अनुसार क़दम उठाए जा सकते हैं.”
परियोजना के शिक्षण कार्यक्रमों से अब एक लाख 30 हज़ार से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं, जिनमें आधे से अधिक लड़कियाँ हैं.
सबसे हाल की उच्च विद्यालय परीक्षाओं में लड़कियों ने विज्ञान समेत सभी विषयों में लड़कों से बेहतर प्रदर्शन किया. लड़कियों की उत्तीर्ण दर 87 प्रतिशत रही, जबकि लड़कों में यह 83 प्रतिशत थी.
कक्षाओं का कायाकल्प
शिक्षा में बदलाव के लिए मज़बूत व्यवस्थाओं के साथ ऐसे स्कूलों की भी ज़रूरत है, जो विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित करें.
इसी उद्देश्य से 16 ‘लाइटहाउस स्कूल कॉम्प्लेक्स’ में आधुनिक कक्षाएँ, विज्ञान प्रयोगशालाएँ और पुस्तकालय विकसित किए जा रहे हैं. निर्माण कार्य का लगभग आधा हिस्सा पूरा हो चुका है और इसके लिए राज्य के भीतर के ठेकेदारों को नियुक्त किया गया है.
यह ऐसे राज्य में अहम है, जहाँ निजी निवेश और ऋण की उपलब्धता सीमित है तथा पूर्वोत्तर राज्यों में अन्तरराज्यीय प्रवासन की दर सबसे अधिक है.
प्रोत्साहन अनुदानों और लगभग तीन लाख डॉलर के सामुदायिक योगदान से स्कूल समितियाँ स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार योजनाएँ तैयार कर रही हैं. पोरबा के राजकीय उच्च विद्यालय जैसे ग्रामीण स्कूलों में इस धनराशि का उपयोग मरम्मत, बुनियादी सुविधाओं, रसोई बाग़ और फुटबॉल शिविरों के लिए किया गया है.
स्कूल शिक्षा निदेशालय के प्रधान निदेशक और NECTAR परियोजना निदेशक शशांक प्रताप सिंह ने कहा, “परियोजना ने समुदायों में स्वामित्व और जवाबदेही की भावना को बढ़ावा दिया है.”
उन्होंने कहा, “अभिभावक-शिक्षक बैठकों से पारदर्शिता बढ़ी है और अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा में अधिक सक्रियता से भाग ले रहे हैं.”
भविष्य की ओर बढ़ते क़दम
नागालैंड के अनुभव से पता चलता है कि आँकड़ों पर आधारित योजना, बेहतर शिक्षण और टिकाऊ संसाधनों के ज़रिए शिक्षा से जुड़ी अनेक चुनौतियों से निपटा जा सकता है.
आज प्रशिक्षण पाने वाले शिक्षक, आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन रहे हैं.
कक्षा 12 के छात्र ख्रिएलेटो रीनो ने कहा, “मुझे गणित से प्यार है और मैं आने वाली पीढ़ी को पढ़ाना चाहता हूँ. अगर मैं किसी और के लिए सीखने को मज़ेदार बना सकूँ, तो इससे मुझे ख़ुशी मिलेगी.”
इस लेख का विस्तृत संस्करण पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.