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धारीदार शर्ट और शॉर्ट्स पहने एक महिला शहर के क्षितिज की पृष्ठभूमि में हाई किक का पोज दे रही है।

यूक्रेन: युद्ध में पैर खोने के बाद भी नहीं रुकी हौसले की उड़ान

© Photo courtesy of the Pascal family न्यूयॉर्क में साशा पास्कल.

यूक्रेन: युद्ध में पैर खोने के बाद भी नहीं रुकी हौसले की उड़ान

शान्ति और सुरक्षा

पिछले सप्ताह न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर में 10 वर्षीय यूक्रेनी जिम्नास्ट साशा पास्कल ने अपने प्रदर्शन के ज़रिए दुनिया को एक बड़ा सन्देश दिया.

रूसी हमले में एक पैर गंवाने के बावजूद हार न मानने वाली साशा को उम्मीद है कि उनकी कहानी दुनिया को याद दिलाएगी कि यूक्रेन के बच्चे आज भी युद्ध के साए में जी रहे हैं.

अपने प्रदर्शन से पहले साशा और उनकी माँ मारिया ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय का दौरा किया. यूएन न्यूज़ से बातचीत में उन्होंने हौसले, पुनर्बहाली और बच्चों के लिए शान्ति की अहमियत पर अपने अनुभव साझा किए.

फूलों से सजी ब्लाउज पहने एक युवा यूक्रेनी लड़की एक अलंकृत कुर्सी पर बैठी है और अपने सामने बैठी एक महिला से बात कर रही है।
© Photo courtesy of the Pascal family न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय की यात्रा के दौरान साशा पास्कल.

मुश्किलों से उबरकर वापसी

साशा बचपन से ही लयबद्ध जिम्नास्टिक (rhythmic gymnastics) का प्रशिक्षण ले रही थीं, जिसमें संगीत के साथ नृत्य, लचक, संतुलन और कलाबाज़ी का प्रदर्शन किया जाता है. 

लेकिन वर्ष 2022 में उनका जीवन पूरी तरह बदल गया.

यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के आक्रमण के शुरुआती महीनों में, ओडेसा क्षेत्र में हुए एक हमले में वह गम्भीर रूप से घायल हो गईं.

ढहती हुई कंक्रीट की एक पटिया गिरने से उनके पैर की हड्डियाँ बुरी तरह कुचल गईं.  15 दिनों तक चिकित्सकीय रूप से बेहोश रखे जाने के बाद, डॉक्टरों के पास उनका पैर काटने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

कई महीनों के पुनर्वास के बाद, साशा आधुनिक कृत्रिम पैर के सहारे अपने प्रिय खेल में लौट आईं और फिर से नृत्य व कलाबाज़ी से भरी प्रस्तुतियाँ देने लगीं.

पिछले चार वर्षों में उन्होंने बिना विकलांगता वाले बच्चों के साथ कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और अनेक पदक जीते. हाल ही में रोमानिया में आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी उन्होंने पदक हासिल किया.

बच्चों को शान्ति की ज़रूरत

मारिया के लिए साशा की हर प्रस्तुति, दुनिया का ध्यान यूक्रेन के बच्चों पर बनाए रखने का एक अवसर है.

उन्होंने कहा, “मुख्य सन्देश यही है कि लोग यह न भूलें कि हमारे देश में युद्ध अब भी जारी है.”

मारिया ने कहा कि यूक्रेन के बच्चों को सबसे बढ़कर शान्ति की आवश्यकता है.

साशा की कहानी से प्रेरित होकर युवजन ने संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के UPSHIFT कार्यक्रम की सहायता से समावेशन पर आधारित कॉमिक पुस्तक ‘दिल आँखों से अधिक देखता है’ तैयार की गई है.

यह कॉमिक एक युवा जिम्नास्ट की कहानी है, जो अपना एक पैर खोने के बाद भी प्रशिक्षण जारी रखती है. इसका इस्तेमाल कक्षाओं में बच्चों को विकलांगता और समावेशन के बारे में बेहतर समझाने के लिए किया जाता है.

बच्चों पर युद्ध का असर

साशा का अनुभव, यूक्रेन के बच्चों पर युद्ध के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है.

UNICEF के अनुसार, यूक्रेन में लगभग 26 लाख बच्चे यानि देश के कुल बच्चों में से एक-तिहाई से अधिक, अब भी अपने घरों से विस्थापित हैं. इनमें लगभग सात लाख 91 हज़ार बच्चे देश के भीतर विस्थापित हैं, जबकि 18 लाख बच्चे विदेशों में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं.

फ़रवरी 2022 से अब तक हमलों में 3,400 से अधिक बच्चे मारे गए हैं या घायल हुए हैं. हालाँकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होने की आशंका है, क्योंकि अनेक मामलों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है.

युद्ध से बच्चों की शिक्षा भी बुरी तरह प्रभावित हुई है. देश में 1,700 से अधिक स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को नुक़सान पहुँचा है या वे पूरी तरह नष्ट हो गए हैं.

हर तीन में से एक बच्चा अब भी नियमित रूप से स्कूल जाकर पढ़ाई नहीं कर पा रहा है. वहीं, युद्ध के अग्रिम मोर्चों के पास रहने वाले बच्चों पर गम्भीर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है.

UNICEF और उसके साझीदार बच्चों को मानवीय सहायता, मनोसामाजिक समर्थन और शिक्षा सेवाएँ उपलब्ध करा रहे हैं. साथ ही, युद्ध के प्रभावों से उबरने में उनकी मदद के लिए विभिन्न कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं.

लाल रंग की पोशाक पहने एक युवा यूक्रेनी लड़की कृत्रिम पैर का उपयोग करते हुए शहर की एक सड़क पर नृत्य करती है।
© Photo courtesy of the Pascal family टाइम्स स्क्वायर में प्रस्तुति देतीं साशा पास्कल.

खेल से मिली ताक़त

आज साशा सप्ताह में पाँच दिन, प्रतिदिन तीन से चार घंटे अभ्यास करती हैं. उनकी माँ का मानना है कि जिम्नास्टिक्स ने उनके पुनर्वास में अहम भूमिका निभाई है.

मारिया ने कहा, “मुझे लगता है कि खेल के बिना सब कुछ बहुत कठिन होता. वह शायद अपने भीतर सिमट जाती या अपने कृत्रिम पैर को लेकर झिझक महसूस करती. लेकिन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते समय उसे कोई संकोच नहीं होता और उसका आत्मविश्वास काफ़ी बढ़ जाता है.”

साशा का सपना है कि यदि लयबद्ध जिम्नास्टिक पैरालिम्पिक खेलों में शामिल हो, तो वह एक दिन यूक्रेन का प्रतिनिधित्व करें.

साशा को अब भी प्रतियोगिताओं से पहले घबराहट होती है, मगर चुनौतियों का सामना कर रहे अन्य बच्चों के लिए उनका सन्देश स्पष्ट है.

साशा कहती हैं, “हार मत मानिए और आगे बढ़ते रहिए. किसी भी चीज़ से मत डरिए.”