स्रेब्रेनीत्सा की भयावह स्मृतियाँ: ‘डर ही था, जिसने मुझे आगे बढ़ते रहने की ताक़त दी’
संयुक्त राष्ट्र ने बुधवार को जुलाई 1995 में स्रेब्रेनीत्सा में मारे गए 8 हज़ार से अधिक बोसनियाई मुस्लिम पुरुषों और किशोरों को श्रद्धाँजलि दी. साथ ही, उन महिलाओं और जनसंहार से जीवित बचे लोगों को भी याद किया गया, जिन्हें इस त्रासदी के बाद अपना जीवन फिर से बसाने के लिए अथक संघर्ष करना पड़ा.
पूर्वी बोस्निया और हर्ज़ेगोविना के स्रेब्रेनीत्सा में हुआ यह क़त्लेआम, यहूदी जनसंहार के बाद योरोप का सबसे बड़ा हत्याकांड था. यह पूर्व यूगोस्लाविया के विघटन के बाद भड़के युद्धों के सबसे काले अध्यायों में से एक है.
जुलाई 1995 में बोसनियाई सर्ब सेना ने स्रेब्रेनीत्सा पर धावा बोल दिया था. इससे पहले, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 819 (1993) के तहत इसे एक सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया था.
अनेक लोगों ने पास के पोतोचारी में स्थित संयुक्त राष्ट्र परिसर में शरण लेने की कोशिश की. मगर उन्हें उनके परिवारों से अलग कर दिया गया, उनकी हत्या कर दी गई तथा उनके शव सामूहिक क़ब्रों में दफ़ना दिए गए.
भय, अपनों को खोने का दर्द और जीवित रहने का संघर्ष
11 जुलाई 1995 को जब स्रेब्रेनीत्सा पर क़ब्ज़ा हुआ, तब हसन हसानोविच 19 वर्ष के थे. अपने पिता और जुड़वाँ भाई हुसैन के साथ, वह जंगल के रास्ते बच निकलने की कोशिश कर रहे पुरुषों व किशोरों के एक समूह में शामिल हो गए.
कुछ ही घंटों में वह अपने परिजनों से बिछड़ गए. घात लगाकर किए गए हमलों, हत्याओं और तोपख़ाने की गोलाबारी के बीच, वह कई दिनों तक भूखे और बिना सोए अकेले चलते रहे.
स्रेब्रेनीत्सा स्मृति केन्द्र में मौखिक इतिहास कार्यक्रम के प्रमुख हसन हसानोविच ने संयुक्त राष्ट्र महासभा कक्ष में कहा, “वो डर ही था, जो मुझे आगे बढ़ाता रहा.”
उन्होंने कहा, “वर्षों बाद, जब सामूहिक क़ब्रों से मेरे पिता और जुड़वाँ भाई के अवशेष बरामद हुए, तो मैंने उन्हें अपने हाथों से दफ़नाया. उन दर्दनाक पलों का सामना करने के लिए मैं किसी भी तरह तैयार नहीं हो सकता था.”
सामूहिक ज़िम्मेदारी
अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और पूर्व यूगोस्लाविया के लिए अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक ट्राइब्यूनल (ICTY) ने स्रेब्रेनीत्सा में बोसनियाई मुसलमानों की उन क्रूर हत्याओं को, जनसंहार की एक कार्रवाई के रूप में मान्यता दी थी.
संयुक्त राष्ट्र इस वर्ष दूसरी बार 11 जुलाई को ‘स्रेब्रेनीत्सा में 1995 में हुए जनसंहार की याद और आत्मचिन्तन का अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ मना रहा है.
जनसंहार की रोकथाम पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष सलाहकार चालोका बेयानी ने कहा कि यह जनसंहार “अन्तरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और विश्व के आधुनिक इतिहास की सामूहिक अन्तरात्मा पर हमेशा एक भारी बोझ बना रहेगा.”
उन्होंने पीड़ितों तथा उस क्षेत्र से जबरन विस्थापित की गईं और बाद में यातनाएँ झेलने वाली महिलाओं एवं लड़कियों की स्मृति में एक मिनट का मौन रखने का आहवान किया.
चेतावनी संकेतों को पहचानें
संयुक्त राष्ट्र महासचिव के कार्यालय प्रमुख (Chef de Cabinet) कोर्टेने रैटरे द्वारा पढ़े गए वक्तव्य में याद दिलाया कि स्रेब्रेनीत्सा के बाद “दुनिया ने एक बार फिर कहा था - ‘फिर कभी नहीं’.”
उन्होंने कहा, “आज नफ़रत फैलाने वाली भाषा बढ़ रही है, जिससे भेदभाव, चरमपंथ और विभाजन को बढ़ावा मिल रहा है. युद्ध अपराधों के दोषियों का महिमामंडन भी किया जा रहा है.”
उन्होंने कहा, “हम इन चेतावनी संकेतों को अनदेखा नहीं कर सकते. हमें समय रहते कार्रवाई करनी होगी, क्योंकि रोकथाम हमारी साझा ज़िम्मेदारी और सुरक्षा का सबसे भरोसेमन्द उपाय है.”
जनसंहार से इनकार ‘एक नया ख़तरा’
बोस्निया और हर्ज़ेगोविना के राष्ट्रपति मण्डल के अध्यक्ष डेनिस बेचिरोविच ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की गरिमा और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के अधिकार की रक्षा करना अब पहले से कहीं अधिक आवश्यक है.
उन्होंने कहा, “अदालतों के फ़ैसलों से स्थापित तथ्यों को राजनैतिक हितों के अनुसार तोड़-मरोड़कर पेश नहीं किया जाना चाहिए.”
उन्होंने कहा, “बोसनियाई लोगों के जनसंहार को नकारना सभ्यता-विरोधी कृत्य है. यह मृतकों का अपमान और जीवित लोगों के लिए एक नया ख़तरा है.”
‘फिर कभी नहीं’ का संकल्प निभाएँ
महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा कि स्रेब्रेनीत्सा, रवांडा और अन्य स्थानों पर हुए जनसंहार “सामूहिक क़ब्रों से शुरू नहीं होते.”
इनकी शुरुआत नफ़रत और भेदभाव, लोगों को “हम” और “वो” में बाँटने के प्रयासों तथा ऐसी नीतियों व बयानबाज़ी से होती है, जो मनुष्यों से उनकी गरिमा छीन लेती हैं.
उन्होंने एक वीडियो सन्देश में अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया कि वह यह सुनिश्चित करे कि “‘फिर कभी नहीं’ केवल बार-बार दोहराया जाने वाला वाक्य न रहे, बल्कि ऐसा संकल्प बने जिसे हम हर हाल में निभाएँ.”
छिनीं ज़िन्दगियाँ, उजड़ गया भविष्य
एमिना सिनानोविच केवल पाँच वर्ष की थीं, जब स्रेब्रेनीत्सा जनसंहार में उनके पिता, दादा और चाचा की हत्या कर दी गई थी.
उन्होंने कहा, “बहुत से लोगों के लिए स्रेब्रेनीत्सा इतिहास का हिस्सा है. लेकिन मेरे लिए यह मेरे जीवन का हर दिन है. यह मेरे और मेरे पिता के बीच खड़ी एक अदृश्य दीवार है, जिसे नफ़रत और अमानवीयता ने बनाया है.”
उनके पिता मुरिज़ की उम्र 32 वर्ष थी, जब 13 जुलाई 1995 को क्रावित्सा के एक गोदाम में उनकी हत्या कर दी गई. यह वही स्थान था, “जहाँ हज़ारों ज़िन्दगियाँ और सपने नष्ट कर दिए गए.”
एमिना सिनानोविच के पास अपने पिता की बहुत कम यादें हैं. उनकी एकमात्र निशानी सिगरेट का एक छोटा डिब्बा है, जो सामूहिक क़ब्र में उनके अवशेषों के पास मिला था.
उन्होंने कहा, “हत्याएँ रुक जाने से जनसंहार समाप्त नहीं हो जाता.”
“यह भविष्य छीन लेता है. यह उन आलिंगनों को छीन लेता है, जो आपको कभी नसीब नहीं होंगे, उन शब्दों को छीन लेता है, जिन्हें आप कभी नहीं सुन पाएँगे, और उन यादों को भी, जिन्हें बनाने का अवसर आपको कभी नहीं मिलेगा.”
उन्होंने दुनिया से आग्रह किया कि जब भी जनसंहार को नकारा जाए, वह मुँह न मोड़े, “क्योंकि जनसंहार को नकारना, उसे जारी रखने के समान है.”