भारत: बीमारियाँ फैलने से पहले रोकथाम की तैयारी
कर्नाटक के जंगलों में बन्दरों से जुड़ी बीमारी (monkey disease) के शुरुआती संकेतों से लेकर केरल में निपाह पर तेज़ क़ाबू पाने तक, भारत का अनुभव दिखाता है कि प्रकोप अक्सर वहीं शुरू होते हैं, जहाँ मानव, पशु और पर्यावरण एक-दूसरे के सबसे क़रीब होते हैं.
मार्च 1957 में, कर्नाटक के शिमोगा ज़िले के क्यासानूर जंगल में वन अधिकारियों को कुछ असामान्य दिखा. वहाँ बड़ी संख्या में बन्दर मर रहे थे. कुछ ही समय बाद, लकड़ी काटने या मवेशी चराने के लिए जंगल जाने वाले ग्रामीण भी एक अज्ञात बुख़ार से बीमार पड़ने लगे और उनकी मौत होने लगी.
स्थानीय लोगों ने इसे “मंकी डिज़ीज़” यानि बन्दरों से जुड़ी बीमारी कहना शुरू किया.
माना जाता है कि नए गाँवों और चराई भूमि के लिए जंगलों की कटाई के बाद बन्दर ज़मीन और झाड़ियों के क़रीब अधिक समय बिताने लगे. इन जगहों पर संक्रमित किलनियाँ (ticks) मौजूद थीं - सम्भव है कि उन्हीं से यह बीमारी फैली हो. हालाँकि, वैज्ञानिक अब भी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि यह बीमारी प्रकृति में कैसे फैलती और बनी रहती है.
लेकिन एक बात स्पष्ट है - क्यासानूर जंगल में यह बीमारी वहीं उभरी, जहाँ मानव, पशु और पर्यावरण एक-दूसरे के सम्पर्क में आए.
ब्लॉकचेन फ़ॉर इम्पैक्ट संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, डॉक्टर गौरव सिंह और भारत में यूएनडीपी की स्थानीय उप-प्रतिनिधि, इसाबेल चान के अनुसार, ज़ूनोटिक यानि पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियों के पीछे अक्सर “कोई एक कारण नहीं, बल्कि लोगों, पशुओं और उनकी साझा भूमि के बीच सम्बन्धों में आया बदलाव” होता है.
'वन हैल्थ’ दृष्टिकोण
यह रुझान कई ज़ूनोटिक बीमारियों में दिखाई देता है - यानि वे संक्रमण जो पशुओं से मनुष्यों में फैल सकते हैं.
इबोला, कोविड-19, निपाह, एवियन इन्फ़्लुएंज़ा, रेबीज़ और क्यासानूर फ़ॉरेस्ट डिज़ीज़, सभी एक ही संकेत देते हैं - सार्वजनिक स्वास्थ्य के ख़तरे अक्सर अलग-थलग परिस्थितियों में पैदा नहीं होते.
वे आमतौर पर उन जगहों पर उभरते हैं, जहाँ जंगल, खेत, घर और बाज़ार बदलते पर्यावरण से जुड़ते हैं - और जहाँ लोग, मवेशी, वन्यजीव व पारिस्थितिकी तंत्र एक-दूसरे के अधिक क़रीब आते हैं.
इसी सोच को ‘One Health’, यानि साझा स्वास्थ्य दृष्टिकोण कहा जाता है. विश्व ज़ूनोसिस दिवस हर वर्ष 6 जुलाई को मनाया जाता है और यह दृष्टिकोण उसकी प्रमुख थीम से जुड़ा है. ‘वन हैल्थ’ के तहत मानव, पशुओं और पर्यावरण के स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साझा व जुड़ी हुई प्रणाली के रूप में देखा जाता है.
इस दृष्टिकोण में सार्वजनिक स्वास्थ्य, पशु-चिकित्सा और पर्यावरण क्षेत्र मिलकर काम करते हैं, ताकि ख़तरों को वहीं रोका, पहचाना और उनका जवाब दिया जा सके, जहाँ वे उभरते हैं - चाहे वह ज़ूनोटिक बीमारी हो, भोजन और जल सुरक्षा से जुड़ा जोखिम हो या एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध.
अलग-अलग काम करने की क़ीमत
कई जगहों पर ये प्रणालियाँ आज भी अलग-अलग काम करती हैं.
अस्पतालों में इनसानों में अज्ञात बीमारी के मामले दर्ज किए जाते हैं. पशु-चिकित्सा विभाग पशुओं में बीमारी के मामलों पर नज़र रखता है. वन विभाग वन्यजीवों की मौतों या भूमि उपयोग में बदलाव को दर्ज करता है.
कई बार ये तीनों एजेंसियाँ एक ही ख़तरे के अलग-अलग संकेत देख रही होती हैं, लेकिन उनमें आपसी तालमेल नहीं होता.
इसी वजह से बीमारी की पहचान देर से हो सकती है, आँकड़े बिखरे रह जाते हैं और साझा तैयारी कमज़ोर पड़ती है. यही साधारण दिखने वाली, मगर ख़तरनाक कमियाँ प्रकोपों को फैलने का मौक़ा दे सकती हैं.
निपाह से मिले सबक़
मई 2018 में, केरल के कोझिकोड में अज्ञात बुख़ार से पीड़ित एक व्यक्ति में निपाह वायरस की पुष्टि हुई. कुछ ही सप्ताहों में कोझिकोड और मलप्पुरम ज़िलों में 19 मामले सामने आए, जिनमें 17 लोगों की मौत हो गई.
उस समय निपाह दक्षिण भारत में पहली बार सामने आया था और कोई तय कार्ययोजना नहीं थी. हालाँकि इसके बाद से केरल ने कई बार निपाह का सामना किया है, लेकिन हर बार जवाबी कार्रवाई तेज़ी से हुई है.
हाल के एक मामले में, कोझिकोड में संक्रमण की आशंका होते ही राज्य की प्रतिक्रिया व्यवस्था सक्रिय कर दी गई और संक्रमण को नियंत्रित कर लिया गया.
वायरस नहीं बदला था. तैयारी बदली थी.
प्रोटोकॉल पहले से तैयार थे, अस्पताल कर्मचारियों को प्रशिक्षण मिल चुका था, प्रयोगशाला प्रणालियाँ तेज़ थीं और सार्वजनिक स्वास्थ्य, पशु-चिकित्सा व वन्यजीव विभागों के अधिकारी मिलकर काम करने के लिए तैयार थे.
सबक़ स्पष्ट है - “अचानक की गई जवाबी कार्रवाई और पहले से अभ्यास की गई तैयारी के बीच का अन्तर, बचाई गई ज़िन्दगियों से मापा जा सकता है.”
विशाल चुनौती
भारत पहले से ही रेबीज़, ब्रुसेलोसिस, लेप्टोस्पायरोसिस, एवियन इन्फ़्लुएंज़ा और क्यासानूर फ़ॉरेस्ट डिज़ीज़ जैसी कई ज़ूनोटिक बीमारियों का बोझ झेल रहा है.
यह जोखिम इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि देश में करोड़ों लोग रोज़ाना मवेशियों के क़रीब रहते और काम करते हैं.
जलवायु व पर्यावरणीय बदलाव इस ख़तरे को और बढ़ा रहे हैं. तापमान और बारिश के बदलते रूझानों से बीमारी फैलाने वाले मच्छरों व किलनियों का दायरा बढ़ रहा है, जबकि प्राकृतिक आवासों के सिकुड़ने से वन्यजीव, मवेशी तथा लोग अधिक निकट आ रहे हैं.
वैश्विक स्तर पर, मनुष्यों में उभरने वाली 10 में से 6 संक्रामक बीमारियाँ पशुओं से उत्पन्न होती हैं. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वन्यजीवों में मौजूद लगभग 17 लाख अज्ञात वायरसों में से क़रीब आधे मनुष्यों को संक्रमित कर सकते हैं.
साझा प्रणाली
भारत की ‘वन हैल्थ’ यात्रा पिछले दो दशकों में लगातार मज़बूत हुई है. इसका उद्देश्य मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को जोड़कर एक एकीकृत राष्ट्रीय प्रणाली तैयार करना है.
हाल के वर्षों में समर्पित ‘वन हैल्थ’ केन्द्रों की स्थापना, राष्ट्रीय वन हैल्थ मिशन की शुरुआत, ज़ूनोटिक निगरानी नेटवर्क का विस्तार और AI-सक्षम प्रारम्भिक चेतावनी प्रणालियों जैसी नई तकनीकों का उपयोग इस दिशा में अहम क़दम रहे हैं.
अब ध्यान केवल प्रकोपों पर प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि उन्हें पहले से पहचानने और रोकने का है. इसके लिए डिजिटल निगरानी, एकीकृत डेटा मंच, जलवायु-आधारित जोखिम मॉडल और समुदाय-आधारित रिपोर्टिंग को मज़बूत किया जा रहा है.
प्रारम्भिक चेतावनी
तमिलनाडु और तेलंगाना में इस दिशा में एक अहम पहल आगे बढ़ रही है.
भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केन्द्र (NCDC) में स्थित वन हैल्थ केन्द्र, यूएनडीपी और ब्लॉकचेन फ़ॉर इम्पैक्ट के साथ मिलकर, बीमारी की रोकथाम, समय पर पहचान तथा प्रकोपों से निपटने की तैयारी को मज़बूत कर रहा है.
पहले चरण में, बहु-क्षेत्रीय टीमों ने पायलट ज़िलों का दौरा किया, ताकि यह समझा जा सके कि सरकारी एजेंसियाँ बीमारी से जुड़ा डेटा कैसे जुटाती हैं और प्रभावी निगरानी के लिए अलग-अलग क्षेत्रों को कौन-सी जानकारी साझा करनी होगी.
इस प्रक्रिया ने एक एकीकृत ‘वन हैल्थ’ डैशबोर्ड की नींव रखी है, जो साक्ष्य-आधारित निर्णयों और प्रारम्भिक चेतावनी प्रणालियों को मज़बूत करने में मदद कर सकता है.
प्रकोपों की रोकथाम
1950 के दशक में क्यासानूर जंगल में बीमारी की पहचान में महीनों लग गए थे. वहीं हाल ही में निपाह के मामले को नियंत्रित करने में केवल कुछ दिन लगे.
भारत की ‘वन हैल्थ’ प्रणाली का लक्ष्य यही है - इस अन्तराल को घटाना.
राष्ट्रीय वन हैल्थ मिशन और मंत्रालयों, विकास साझीदारों, परोपकारी संस्थाओं व शोध संस्थानों के सहयोग से, भारत ऐसी व्यवस्था बना रहा है, जो केवल तेज़ प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकोपों को शुरुआत में ही रोकने पर केन्द्रित है.
डॉक्टर गौरव सिंह और यूएनडीपी की इसाबेल चान के लिए, सफलता का असली पैमाना होगा कि “कितने प्रकोप कभी ख़बर ही न बन पाएँ.”
यह लेख इस ब्लॉग पर आधारित है.