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आतंकवाद के बदलते स्वरूप से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग ज़रूरी

खुले आसमान के नीचे मलबे और कंक्रीट के ढेर के बीच एक बुरी तरह से क्षतिग्रस्त बहुमंजिला इमारत खड़ी है।
© WFP/Jonathan Dumont सीरिया के अलेप्पो जैसे इलाक़ों में आतंकवादी संगठन सक्रिय थे.

आतंकवाद के बदलते स्वरूप से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग ज़रूरी

शान्ति और सुरक्षा

बढ़ते भू-राजनैतिक तनावलम्बे हिंसक टकरावों और गहराते वैश्विक विभाजन के बीच आतंकवाद का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है. इससे निपटने के लिए अन्तरराष्ट्रीय सहयोग और रणनीतियों को भी नए ख़तरों के अनुरूप ढालना होगा.

संयुक्त राष्ट्र के चौथे आतंकवाद-निरोधक सप्ताह में बदलते आतंकवादी ख़तरों और उनसे निपटने के उपायों पर चर्चा हो रही है. इसमें 119 देशों के 1,000 से अधिक प्रतिभागी शामिल हैं, जो सरकारों, क्षेत्रीय संगठनों, शिक्षण संस्थानों, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद-रोधी मामलों के कार्यवाहक अवर महासचिव अलेक्ज़ांद्र ज़ुएव ने सोमवार को महासभा के समक्ष आतंकवाद के मौजूदा परिदृश्य की जानकारी दी.

बदलते हालात के अनुरूप ख़ुद को ढाल रहे आतंकवादी संगठन

राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी प्रमुखों के उच्चस्तरीय सम्मेलन के उद्घाटन पर अलेक्ज़ांद्र ज़ुएव ने कहा कि अल-क़ायदा, दाएश (ISIL) और उनसे जुड़े संगठन अब भी सक्रिय हैं और लगातार अपने तरीक़े बदल रहे हैं.

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर माध्यमों के बढ़ते इस्तेमाल से उनकी गतिविधियाँ और अधिक जटिल होती जा रही हैं.

उन्होंने कहा, “ये संगठन अस्थिरता, कमज़ोर शासन, सामाजिक-आर्थिक असमानताओं व नई प्रौद्योगिकियों का फ़ायदा उठाकर अपना प्रभाव बढ़ाते हैं, लोगों की भर्ती करते हैं और संसाधन जुटाते हैं.”

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा, “आतंकवाद बदल रहा है और हमें भी उसके अनुरूप बदलाव लाने होंगे.”

यूएन महासचिव ने कहा, “रोकथाम, अन्तरराष्ट्रीय सहयोग और मानवाधिकारों के प्रति मज़बूत प्रतिबद्धता के ज़रिये हम एक अधिक सुरक्षित दुनिया बना सकते हैं, जहाँ लोग भयमुक्त जीवन जी सकें.”

विविध दृष्टिकोण अहम

इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद-निरोधी रणनीति के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं. महासचिव ने कहा कि यह अब तक की प्रगति की समीक्षा करने और आतंकवाद से निपटने के संकल्प को मज़बूत करने का अवसर है.

हालाँकि आतंकवाद की रोकथाम और उससे निपटने की मुख्य ज़िम्मेदारी सदस्य देशों की है. लेकिन, संयुक्त राष्ट्र पीड़ितों, महिलाओं और युवाओं सहित समाज के विभिन्न वर्गों की भागेदारी को भी बेहद अहम मानता है.

फातिमा अली हैदर न्यूयॉर्क में आयोजित 2026 UN आतंकवाद विरोधी सम्मेलन के दौरान एक मंच पर भाषण दे रही हैं।
© UN Photo/Mark Garten आतंकवाद पीड़ित संघों के नेटवर्क (VoTAN) की चिकित्सक डॉक्टर फ़ातिमा अली हैदर संयुक्त राष्ट्र के चौथे उच्चस्तरीय आतंकवाद-रोधी सम्मेलन को सम्बोधित करती हुईं.

महिलाओं की आवाज़ अहम

आतंकवाद पीड़ित संघों के नैटवर्क (VoTAN) की चिकित्सक, डॉक्टर फ़ातिमा अली हैदर ने सरकारों से आग्रह किया कि वे “नीतियों और रणनीतियों के निर्माण में पीड़ितों को साझीदार बनाएँ,” क्योंकि “हमारे पास योगदान देने के लिए बहुत कुछ है.”

आतंकवादी हमले में जीवित बचीं डॉक्टर हैदर ने अपने शोध का उल्लेख करते हुए कहा कि आतंकवाद महिलाओं व पुरुषों को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करता है और इससे लैंगिक हिंसा के गम्भीर रूप सामने आ सकते हैं.

उन्होंने कहा, “इसके बावजूद रणनैतिक निर्णय लेने के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की आवाज़ स्पष्ट रूप से नदारद है.”

उन्होंने कहा, “हमें सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से तैयार करना होगा, ताकि घर व सार्वजनिक स्थानों से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थानों एवं सुरक्षा परिषदतक हर स्तर पर महिलाओं का नेतृत्व और समान भागेदारी सुनिश्चित हो.”

जॉन पी. हुवेन न्यूयॉर्क में United Nations मुख्यालय में UN आतंकवाद विरोधी सप्ताह के दौरान एक मंच पर भाषण दे रहे हैं।
© UN Photo/Mark Garten 11 सितम्बर 2001 के हमलों के दौरान सबसे पहले घटनास्थल पर पहुँचने वाले राहतकर्मियों में शामिल जॉन पी हुवेन, संयुक्त राष्ट्र के चौथे उच्चस्तरीय आतंकवाद-रोधी सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए.

राहतकर्मियों का प्रशिक्षण ज़रूरी

जॉन पी हुवेन 11 सितम्बर 2001 के आतंकवादी हमलों के दौरान न्यूयॉर्क में सबसे पहले घटनास्थल पर पहुँचने वाले राहतकर्मियों में शामिल थे. वह 7 जुलाई 2005 को लन्दन में हुए घातक बम धमाकों के समय भी वहाँ मौजूद थे.

उन्होंने कहा कि देशों को अपने “राहतकर्मियों के नियमित प्रशिक्षण” पर ध्यान देना चाहिए. इसके लिए अभ्यास, आपात प्रतिक्रिया योजनाएँ और आधुनिक तकनीक में निवेश ज़रूरी है.

उन्होंने कहा, “यह सुनिश्चित करना बेहद अहम है कि आतंकवादी हमले की स्थिति में हर राहतकर्मी को अपनी भूमिका और ज़िम्मेदारियों की पूरी जानकारी हो.”

उन्होंने देशों के बीच बेहतर सहयोग और प्रभावी संचार पर भी ज़ोर दिया.

शम्सिया इब्राहिम बार्डे न्यूयॉर्क में UN आतंकवाद विरोधी सप्ताह के एक कार्यक्रम के दौरान एक मंच पर भाषण दे रही हैं।
© UN Photo/Mark Garten संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद-रोधी कार्यालय (UNOCT) के युवा सहभागिता और सशक्तिकरण कार्यक्रम की पूर्व प्रतिभागी शम्सिया इब्राहिम बार्डे, संयुक्त राष्ट्र के चौथे उच्चस्तरीय आतंकवाद-रोधी सम्मेलन को सम्बोधित करती हुईं.

युवजन बन सकते हैं ‘रोकथाम के वाहक’

जॉन पी हुवेन एक आतंकवादी बम हमले के समय नाइजीरिया में भी मौजूद थे. शम्सिया इब्राहिम बार्डे देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में पली-बढ़ीं, जो वर्षों से टकराव, विस्थापन और हिंसक उग्रवाद से प्रभावित रहा है.

उन्होंने असुरक्षा के हालात देखे, लेकिन साथ ही “युवाओं को हिंसा के बजाय शिक्षा, विभाजन के बजाय संवाद और निराशा के बजाय समाजसेवा चुनते हुए” भी देखा.

संयुक्त राष्ट्र के आतंकवाद-रोधी कार्यालय (UNOCT) के युवा सहभागिता और सशक्तिकरण कार्यक्रम में भाग लेने के बाद उन्होंने कहा, “जब युवाओं पर भरोसा किया जाता है, उन्हें सहयोग एवं सार्थक अवसर दिए जाते हैं, तो वे आतंकवाद की रोकथाम और सकारात्मक बदलाव के वाहक बन सकते हैं.”

रिम्मा झुनुसोवा न्यूयॉर्क में United Nations में आयोजित 2026 आतंकवाद-विरोधी सप्ताह के दौरान एक मंच पर भाषण दे रही हैं।
© UN Photo/Mark Garten अल-होल शिविर से स्वदेश लौटीं रिम्मा झुनुसोवा, संयुक्त राष्ट्र के चौथे उच्चस्तरीय आतंकवाद-रोधी सम्मेलन को सम्बोधित करती हुईं.

कट्टरपंथ से निकलकर नई शुरुआत

कज़ाख़स्तान की चार बच्चों की माँ रिम्मा झुनुसोवा बदलाव और पुनर्वास का एक उदाहरण हैं. उन्होंने उत्तर-पूर्वी सीरिया के अल-होल शिविर में कई वर्ष बिताए, जहाँ दाएश से कथित या वास्तविक सम्बन्ध रखने वाले हज़ारों लोगों को रखा गया है.

जुलाई 2013 में कट्टरपंथी प्रचार से प्रभावित होकर वह अपने पति के साथ सीरिया चली गई थीं.

उनकी तरह कई अन्य लोग, विशेष रूप से युवा, यह मानकर वहाँ गए कि वे सही काम कर रहे हैं. मगर वे “नहीं समझ पाए कि चरमपंथी संगठन सुनियोजित प्रचार के ज़रिये उन्हें गुमराह कर रहे थे और अपनी असली प्रकृति छिपा रहे थे.”

मई 2019 में रिम्मा झुनुसोवा और उनके बच्चों को कज़ाख़स्तान वापस लाया गया, जहाँ उन्हें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और अन्य सहायता दी गई. आज वह दरवाज़े बनाने की एक छोटी कार्यशाला चलाती हैं. अपनी कहानी बताते हुए वह कई बार भावुक हो उठीं.

उन्होंने दुभाषिये के माध्यम से कहा, “मैं अपने अतीत को सही ठहराने के लिए यहाँ नहीं हूँ. मैं केवल यह याद दिलाना चाहती हूँ कि ख़तरनाक रास्ते पर जा चुका व्यक्ति भी बदल सकता है.”

उन्होंने कहा, “जो सरकारें, समाज और अन्तरराष्ट्रीय संगठन बचाव, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और शान्तिपूर्ण पुनर्वास के ज़रिये लोगों को दूसरा अवसर देते हैं, वे दुनिया को सभी के लिए अधिक सुरक्षित बनाते हैं.”