मध्य पूर्व टकराव: विकासशील देश ऊर्जा संकट की विशाल क़ीमत चुका रहे हैं
मध्य पूर्व में भड़के हिंसक टकराव और उसके प्रभावों से जूझ रहे विकासशील देश, वर्तमान संकट की सबसे अधिक क़ीमत चुकाने के लिए मजबूर हो रहे हैं, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास प्राथमिकताओं में निवेश के लिए उनके पास संसाधन कम होते जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने अपने एक नए विश्लेषण में यह निष्कर्ष साझा किया है.
यूएन कार्यक्रम की यह रिपोर्ट सोमवार को एक ऐसे समय में जारी हुई है जब बीते सप्ताहांत ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा फिर से हमले किए गए हैं, हालांकि कूटनैतिक प्रयासों के बाद टकराव फिर भड़कने के जोखिम में कमी आई है. लेकिन मौजूदा तनाव का विश्व में सबसे निर्धन देशों पर गहरा असर हो रहा है.
UNDP की नई रिपोर्ट रिपोर्ट दर्शाती है कि निम्न- और मध्य-आय वाले देशों ने अपनी आबादियों को कुछ हद तक तेल क़ीमतों में आए उछाल से बचाने की कोशिश की है, जिसके लिए ईंधन में सब्सिडी दी गई है, क़ीमतें तय की गई हैं, कर में छूट दी गई है और मांग को नियंत्रित करने की कोशिशें हो रही हैं.
UNDP के प्रशासक ऐलेक्ज़ेंडर डी क्रू ने बताया कि स्कूलों, अस्पतालों और स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों में निवेश की जाने वाली धनराशि, अब अर्थव्यवस्था को किसी तरह चलाए रखने में ख़र्च हो रही है.
इन उपायों के ज़रिए अल्पकाल के लिए कुछ राहत तो मिली है, लेकिन लम्बे समय में इसकी एक बड़ी क़ीमत सहन करनी पड़ सकती है.
जीवाश्म ईंधन को मिलने वाली सब्सिडी में, वैश्विक स्तर पर गिरावट का रुझान दर्ज किया जा रहा था, वह अब बढ़कर 1,100 अरब डॉलर तक पहुँच जाने की सम्भावना है. 2025 के स्तर के मुक़ाबले यह 410 अरब डॉलर की वृद्धि को दर्शाता है, यदि तेल की औसत क़ीमत को प्रति बैरल 88.6 डॉलर आंका जाए.
मगर, यदि तेल क़ीमतों में उछाल का रुझान जारी रहा और वे 110 डॉलर प्रति बैरल पहुँची, तो यह सब्सिडी 1,400 अरब डॉलर के आँकड़े को पार कर सकती हैं.
यूएन विकास कार्यक्रम का कहना है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सरकारें, घर-परिवारों को बढ़ती ऊर्जा क़ीमतों से बचाने के लिए सैकड़ों अरब डॉलर ख़र्च करने के लिए मजबूर हो रही हैं, जिससे स्कूलों, अस्पतालों और जलवायु कार्रवाई के लिए धनराशि घटती जा रही है.
28 फ़रवरी को ईरान पर अमेरिका व इसराइल की हवाई बमबारी और फिर ईरान के जवाबी ड्रोन व मिसाइल हमलों के बाद, होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते से गुज़रने वाले जहाज़ों की आवाजाही थम गई थी. इन हालात का उन देशों पर ज़्यादा असर हुआ है जोकि ईंधन व खाद्य वस्तुओं के आयात पर निर्भर हैं.
विकास पर चोट
बहुत से विकासशील देश ऐसे समय में इस संकट की चपेट में आए हैं, जब वे पहले से ही क़र्ज़ की ऊँची क़ीमतों के बोझ का सामना कर रहे थे.
विश्व में लगभग 50 फ़ीसदी देश या तो ऋण के भुगतान की चुनौती को झेल रहे हैं या उसके जोखिम में हैं. ब्याज़ के लिए किया जाने वाला भुगतान, सरकारी बजट का एक बड़ा हिस्सा निगल रहा है.
यूएन विकास कार्यक्रम ने चेतावनी दी है कि पहले से ही क़िल्लत का शिकार सार्वजनिक कोष को जीवाश्म ईंधन सब्सिडी की ओर धकेलने से टिकाऊ विकास लक्ष्यों की दिशा में प्रगति पर असर होगा और देश, कार्बन पर आधारित ऊर्जा प्रणालियों पर और अधिक निर्भर हो जाएंगे.
इसके मद्देनज़र, यूएन एजेंसी ने कहा कि विकासशील देशों को एक ऐसे संकट से निपटने के लिए दीर्घकालिक विकास को तिलांजलि देने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए, जिसके लिए वे ज़िम्मेदार नहीं हैं.
यूएन विकास कार्यक्रम के प्रमुख ने अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संसाधनों के लिए आसान सुलभता, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश पर बल देते हुए ध्यान दिलाया है कि स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करने से ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूती मिलेगी और भूराजनैतिक झटकों के प्रति सम्वेदनशीलता में भी कमी लाई जा सकेगी.