भारत: विश्व बैंक समर्थित नई कृषि तकनीक से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन
विश्व बैंक समूह की पहल, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में किसानों को डिजिटल सेवाओं, वित्त और बाज़ारों से जोड़ने के साथ-साथ, कृषि एवं खाद्य क्षेत्र में रोज़गार के नए अवसर पैदा कर रही है. धान की सीधी बुवाई से कम पानी और लागत में अधिक पैदावार हो रही है और कार्बन उत्सर्जन भी घट रहा है. अब इस पद्धति को पूरे प्रदेश में बड़े पैमाने पर अपनाने की योजना है.
उत्तर प्रदेश के देवपोखर गाँव में इस बार फ़सल कटाई का मौसम कुछ अलग है. किसान बेहतर पैदावार के साथ-साथ विश्व बैंक समूह की ‘एग्रीकनेक्ट’(AgriConnect) पहल और UP-AGREES परियोजना के तहत शुरू की गई नई कृषि तकनीकों की भी चर्चा कर रहे हैं.
किसान, एक पायलट कार्यक्रम के तहत, धान की सीधी बुवाई अपना रहे हैं. इस पद्धति में पौध को नर्सरी में तैयार करके रोपने के बजाय बीज सीधे खेत में बोया जाता है.
इससे पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ खेती की लागत, पानी का इस्तेमाल और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने में मदद मिल सकती है.
इस नई पद्धति से धान की खेती से जुड़े कई क्षेत्रों में रोज़गार भी पैदा हो सकते हैं - कृषि मशीनें चलाने से लेकर भंडारण, प्रबन्धन और उत्पादों की बिक्री तक.
यह उत्तर प्रदेश के लिए विशेष रूप से अहम है. लगभग 24 करोड़ की आबादी वाले इस प्रमुख कृषि प्रदेश में अनेक ग्रामीण परिवार, अब भी कम पैदावार और आधुनिक उपकरणों, सेवाओं व बाज़ारों तक सीमित पहुँच से जूझ रहे हैं.
किसानों को लाभ
कुछ किसानों को इस नई पद्धति के लाभ पहले ही नज़र आने लगे हैं.
किसान सूरजा देवी ने बताया कि उनके खेत में धान की पैदावार बढ़कर नौ टन प्रति हैक्टेयर हो गई है, जो उनकी सामान्य उपज से दोगुनी से भी अधिक है.
उन्होंने कहा, “मैं, अगले मौसम में, अपने पूरे खेत में मशीनों से धान की सीधी बुवाई करूँगी.”
एक अन्य किसान, सुखारी प्रसाद बताते हैं कि इस पद्धति से खेती अधिक कुशल हुई है और लागत भी घटी है.
उन्होंने कहा, “खेती की लागत प्रति हैक्टेयर 10 हज़ार रुपए, यानि 120 डॉलर तक कम हो जाती है. धान की सीधी बुवाई से पानी भी बचता है.”
सेवाओं और बाज़ारों तक पहुँच
इस प्रयास के केन्द्र में विश्व बैंक समूह की ‘AgriConnect’ पहल है. इसका लक्ष्य दुनिया भर के 30 करोड़ छोटे किसानों को सेवाओं, बुनियादी ढाँचे और बाज़ारों से जोड़ना है, ताकि वे गुज़र-बसर भर की खेती से आगे बढ़कर अधिक उत्पादन व आय हासिल कर सकें.
भारत में यह पहल, महिला-नेतृत्व वाले समूहों सहित किसान संगठनों को निवेश और अधिक लाभदायक बाज़ारों तक पहुँचने में मदद कर रही है.
किसानों को फ़सलों, मौसम और पराली प्रबन्धन के बारे में समय पर सलाह भी मिलती है, जिससे पराली जलाने की घटनाएँ कम की जा सकती हैं.
परियोजना का डिजिटल मंच ‘UP-AGRIVERSE’ बाज़ार की जानकारी, कृषि सलाह और वित्तीय सेवाएँ एक ही जगह उपलब्ध कराता है.
इसमें ‘गूगल’ और 'Networks for Humanity' जैसे संगठनों के सहयोग से, ऐसे छोटे एआई मॉडल इस्तेमाल किए जाते हैं, जो साधारण स्मार्टफ़ोन और धीमी रफ़्ता वाले इंटरनेट पर भी काम कर सकते हैं.
समन्वय विभाग के विशेष सचिव और UPDASP के अतिरिक्त परियोजना समन्वयक प्रत्युष पांडे ने बताया, “हम यूपी-एग्रीवर्स के ज़रिए, राज्यव्यापी डिजिटल कृषि व्यवस्था तैयार कर रहे हैं, जहाँ डेटा, सेवाएँ और एआई विश्लेषण मिलकर छोटे किसानों से लेकर मत्स्यपालकों तक सभी की मदद करेंगे और कृषि क्षेत्र को भविष्य के लिए तैयार बनाएँगे.”
व्यापक विस्तार की योजना
शुरुआती नतीजे बताते हैं कि धान की सीधी बुवाई से, कम संसाधनों में अधिक उत्पादन किया जा सकता है.
निकट भविष्य में इस पद्धति को दो लाख हैक्टेयर तक फैलाने की योजना है, जबकि दीर्घकालीन लक्ष्य इसे 20 लाख हैक्टेयर तक पहुँचाना है.
बड़े पैमाने पर सफल होने पर इससे, किसानों की पैदावार व आमदनी बढ़ सकती है, अधिक लोगों को रोज़गार मिल सकता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मज़बूत हो सकती है.
इससे लगभग दो लाख 30 हज़ार टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन घटने का अनुमान है.
इसका असर खेती से परे भी दिखाई देगा. उत्पादन बढ़ने के साथ भंडारण, परिवहन, पैकेजिंग, गुणवत्ता जाँच और डिजिटल बाज़ार सेवाओं की माँग भी बढ़ सकती है.
इससे मशीनरी संचालकों, गोदाम प्रबन्धकों, शीत-श्रृँखला (cold-chain) कर्मचारियों और डिजिटल सेवा प्रदाताओं के लिए नए रोज़गार अवसर पैदा हो सकते हैं.
निजी निवेश से नए अवसर
निजी निवेशक और कम्पनियाँ धान और गेहूँ किसानों को बेहतर बीज, मशीनरी और सेवाएँ उपलब्ध कराने के साथ उन्हें बड़े बाज़ारों से जोड़ने में मदद कर सकती हैं.
यह परियोजना मत्स्यपालन क्षेत्र में दुबई स्थित कम्पनी ‘Aqua Bridge’ के 46 करोड़ 10 लाख डॉलर के निवेश को भी बढ़ावा दे रही है. कम्पनी मछली और झींगा पालन को आधुनिक बनाने पर काम करती है.
इसे राज्य के मत्स्यपालन क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश बताया गया है. इसके तहत मछली पालकों को एआई-संचालित ड्रोन तकनीक उपलब्ध कराई जाएगी.
मछली पालक कैलाश नारायण सिंह कहते हैं, “आज हम स्थानीय बाज़ारों में कम मुनाफ़े पर मछली बेचते हैं. जल्द ही हम अधिक मूल्य वाले वैश्विक बाज़ारों में बेचेंगे.”
साझेदारियों की अहम भूमिका
इस पहल में सरकारी संस्थानों, निजी कम्पनियों और तकनीकी संगठनों की साझेदारी अहम है. इनके ज़रिए किसानों को उपयोगी उपकरणों के साथ फ़सल, मौसम और बाज़ार की ताज़ा जानकारी मिलती है.
इसी वर्ष विश्व बैंक समूह, महाराष्ट्र सरकार और भारतीय ग़ैर-लाभकारी संस्था ‘EkStep Foundation’ ने एग्रीकनेक्ट के तहत एक साझेदारी की है.
इसके ज़रिए एआई आधारित, बहुभाषी और मुक्त-स्रोत उपकरण विकसित किया जा रहा है, जो किसानों को समय पर सलाह देगा.
उत्तर प्रदेश में हो रहे बदलाव केवल खेती का तरीक़ा सुधारने तक सीमित नहीं हैं. वे दिखाते हैं कि तकनीक, निजी निवेश और सरकारी नीतियाँ मिलकर ग्रामीण क्षेत्रों में नए व्यवसाय और रोज़गार पैदा कर सकती हैं.
इन बदलावों का लाभ खेतों के साथ-साथ कृषि से जुड़ी सेवाओं और कारोबारों को भी मिलेगा.
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