वैश्विक खाद्य बाज़ारों पर मौसम और भूराजनैतिक जोखिमों का साया
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की एक नई रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि मौसमी परिस्थितियाँ, भूराजनैतिक तनाव व युद्ध की वजह से ऊर्जा व उर्वरक बाज़ारों में उतार-चढ़ाव, और व्यापार नीतियों से जुड़ी अनिश्चितताएँ आगामी दिनों में वैश्विक खाद्य बाज़ारों को प्रभावित कर सकती हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक खाद्य वस्तु बाज़ारों की स्थिति फ़िलहाल अपेक्षाकृत अनुकूल है और वर्ष 2026-27 में अनाज उत्पादन ऊँचे स्तर पर रहने का अनुमान है, हालांकि यह रिकॉर्ड स्तर से कुछ कम रहेगा.
आगामी वर्ष में गेहूँ, मोटे अनाज और चावल की वैश्विक पैदावार रिकॉर्ड स्तरों से कुछ कम रहने का अनुमान है, मगर यह अब भी ऊँचे स्तर पर बनी रहेगी. साथ ही, पर्याप्त भंडार उपलब्ध होने के कारण आपूर्ति की स्थिति भी मज़बूत रहने की उम्मीद है.
वर्ष में दो बार प्रकाशित होने वाली इस रिपोर्ट में प्रमुख खाद्य उत्पादों के उत्पादन, व्यापार और भंडार से जुड़े नवीनतम आकलन प्रस्तुत किए गए हैं, जिनमें अनाज, तिलहन, चीनी, माँस, डेयरी उत्पाद और मत्स्य उत्पाद शामिल हैं.
FAO के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने कहा है कि कृषि-खाद्य प्रणालियाँ उत्पादन स्तर पर मज़बूत दिख रही हैं, लेकिन जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं और इनमें वैश्विक आपूर्ति पर तेज़ी से नकारात्मक असर डालने की क्षमता है.
उन्होंने कहा कि लचीलापन बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है कि व्यापार प्रवाह को खुला रखा जाए, आपूर्ति श्रृंखला सुचारु रूप से काम करे और साथ ही स्थानीय स्तर पर मौसम से जुड़े झटकों के लिए तैयारी भी मज़बूत की जाए.
आँकड़ों पर एक नज़र...
FAO के अनुसार, वर्ष 2026 में वैश्विक अनाज उत्पादन 2 प्रतिशत घटकर 2.98 अरब टन रहने का अनुमान है, हालांकि यह स्तर अब भी ऊँचा बना रहेगा.
वहीं, अनाज की खपत में वृद्धि जारी रहने की उम्मीद है और मानव उपभोग के लिए इस्तेमाल होने वाले अनाज की मात्रा में 1 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खाद्य अभाव वाले निम्न-आय देशों में प्रति व्यक्ति अनाज खपत में 0.4 प्रतिशत की मामूली गिरावट आ सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026-27 में वैश्विक गेहूँ और मोटे अनाज का उत्पादन घटने का अनुमान है, जबकि सोयाबीन उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच सकता है. वहीं, वैश्विक मांस उत्पादन में मामूली वृद्धि होने की सम्भावना है, हालांकि गोमाँस उत्पादन में गिरावट आ सकती है.
इसके अलावा, वनस्पति तेलों की वैश्विक खपत उत्पादन से अधिक रहने का अनुमान है, जिससे बाज़ार पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि मत्स्य और जलीय कृषि उत्पादन में भी वृद्धि की सम्भावना जताई गई है, जिसका मुख्य कारण जलीय कृषि क्षेत्र का विस्तार है.