मध्य प्रदेश: टिकाऊ खेती से बदली किसान परिवार की ज़िन्दगी
अनियमित बारिश, मिट्टी की घटती उर्वरता और महंगे उर्वरकों के कारण मध्य प्रदेश के ग्रामीण परिवारों के लिए खेती लगातार कठिन होती जा रही है. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम - UNDP की एक समुदाय-आधारित परियोजना, लघु अनुदान कार्यक्रम के समर्थन से, किसानों को जैविक खेती अपनाने, जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने और टिकाऊ आजीविका बनाने में मदद कर रही है.
मध्य प्रदेश में खजुराहो से लगभग 27 किलोमीटर दूर खांडखुदाई गाँव में खेतीबाड़ी हमेशा से लोगों की आजीविका का मुख्य आधार रही है. लेकिन हाल के वर्षों में अनियमित बारिश, मिट्टी की घटती उर्वरता और उर्वरकों की बढ़ती क़ीमतों ने खेती को लगातार कठिन बना दिया.
कई परिवारों के लिए खेती अब आमदनी का भरोसेमन्द साधन नहीं रही थी. भैयालाल और पूजा पाल भी इसी अनिश्चितता से जूझ रहे थे.
पूजा बताती हैं, “हमारी गुज़र-बसर का ख़र्च बढ़ रहा था, लेकिन आय घट रही थी. कई बार तो, कृषि सामग्री ख़रीदने के लिए भी धन नहीं होते, इसलिए हमें अपनी कुछ ज़मीन ख़ाली छोड़नी पड़ती थी.”
वे भी, कई अन्य छोटे किसानों की तरह, रासायनिक उर्वरकों पर बहुत अधिक निर्भर थे. समय के साथ खेती की लागत बढ़ती गई, मिट्टी की सेहत बिगड़ती गई और फ़सलें ख़राब होने लगीं. इससे खेती में उनका भरोसा भी कम होने लगा.
एक नई शुरुआत
बदलाव की शुरुआत महिला किसानों के एक समूह की बैठक से हुई. वहाँ पूजा ने खेती की लागत घटाने और भूमि को सुरक्षित रखने के तरीक़ों पर हुई चर्चा में हिस्सा लिया.
इसी बैठक में दम्पति को एक समुदाय-आधारित पहल के तहत स्थापित किसान क्षेत्र विद्यालय और जैव-संसाधन केन्द्र के प्रशिक्षण कार्यक्रमों के बारे में मालूम हुआ.
इस पहल को लघु अनुदान कार्यक्रम (SGP) का समर्थन प्राप्त है. वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) द्वारा वित्तपोषित और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा लागू यह कार्यक्रम, स्थानीय आजीविका सुधारने तथा पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने वाली समुदाय-आधारित परियोजनाओं को वित्तीय व तकनीकी सहायता देता है.
इस पहल में किसानों को प्रकृति के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके साथ मिलकर खेती करना सिखाया जाता है.
भैयालाल बताते हैं, “शुरुआत में हमें भरोसा नहीं था. हमें नहीं पता था कि आज की परिस्थितियों में ये तरीक़े सफल होंगे या नहीं.”
सन्देह के बावजूद परिवार ने इन्हें आज़माने का फ़ैसला किया.
प्रकृति के साथ खेती
परिवार ने आधा एकड़ भूमि पर जैविक तरीक़ों से पोषण बगीचा बनाकर छोटे स्तर पर शुरुआत की.
प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने ‘जीव अमृत’ जैसे प्राकृतिक कृषि उत्पाद तैयार करना सीखा. गाय के गोबर और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से बना यह सूक्ष्मजीवी घोल मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद करता है.
उन्होंने नीम से बने जैव-कीटनाशक ‘नीमास्त्र’ से कीटों को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करना और खाद का बेहतर इस्तेमाल करना भी सीखा.
नतीजे तुरन्त नहीं मिले. शुरुआत में पौधों की बढ़त धीमी रही और कई बार परिवार को अपने फ़ैसले पर सन्देह हुआ, लेकिन उन्होंने प्रयास जारी रखे.
धीरे-धीरे सब्ज़ियाँ अधिक स्वस्थ होने लगीं, मिट्टी की गुणवत्ता सुधरी और खेती की लागत घटने लगी.
परिवार ने, इन नतीजों से उत्साहित होकर बाँस के ढाँचों और रस्सियों की मदद से बहुस्तरीय खेती शुरू की. लौकी जैसी बेल वाली सब्ज़ियाँ ऊपर और पत्तेदार सब्ज़ियाँ व मसाले नीचे उगाए गए.
इससे सीमित जगह का बेहतर इस्तेमाल हुआ और खेत की उत्पादकता बढ़ी.
कुएँ की बहाली से लौटी उम्मीद
पानी की उपलब्धता, परिवार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी. समय के साथ उनका कुआँ सूख गया था, जिससे गर्मियों में खेती करना मुश्किल हो गया.
परिवार ने हार मानने के बजाय स्वयं कुएँ को फिर से उपयोग में लाने का फ़ैसला किया.
पाँच दिनों तक सभी ने मिलकर कुएँ की सफ़ाई की, उसमें जमा मिट्टी हटाई और उसे गहरा किया, ताकि उसमें अधिक पानी जमा हो सके.
उनकी मेहनत सफल हुई और कुएँ में फिर से पानी आ गया.
इससे परिवार लम्बे समय तक सब्ज़ियाँ उगा सका और अनिश्चित बारिश पर उसकी निर्भरता कम हुई.
ज्ञान और अनुभव पर भरोसा
परिवार की नई खेती पद्धतियों की असली परीक्षा ख़रीफ़ के मौसम में हुई.
मौसम विभाग ने भारी बारिश का अनुमान जताया था. गाँव के कई किसान इस बात को लेकर उलझन में थे कि कौन-सी फ़सल बोई जाए और वो सम्भावित नुक़सान से चिन्तित भी थे.
भैयालाल ने, प्रशिक्षण और पारम्परिक ज्ञान के आधार पर, सोयाबीन उगाने का फ़ैसला किया, क्योंकि यह फ़सल जलभराव की स्थिति को बेहतर ढंग से सह सकती है.
उनका फ़ैसला सही साबित हुआ. आसपास के कई खेतों में फ़सलों को नुक़सान पहुँचा, लेकिन उनकी फ़सल अच्छी रही.
उन्होंने, जैविक कृषि सामग्री और सही फ़सल के चुनाव से, अच्छी पैदावार हासिल की. इससे यह भी साबित हुआ कि रसायनों पर अधिक निर्भर हुए बिना भी, सफल खेती की जा सकती है.
स्थिरता की ओर
खेती की उत्पादकता बढ़ने के साथ परिवार की आमदनी भी बढ़ने लगी.
भैयालाल और पूजा ने अपनी सब्ज़ियों को, आसपास के बाज़ारों में बेचना शुरू किया और उन्हें ताज़ा, स्थानीय व रसायन-मुक्त उत्पादों के रूप में पेश किया.
पूजा बताती हैं, “शुरुआत में हमें थोड़ी झिझक होती थी. लेकिन जब लोगों ने हमारी सब्ज़ियों पर भरोसा दिखाया, तो हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ा.”
कुछ ही महीनों में परिवार ने सब्ज़ियाँ बेचकर लगभग 8 हज़ार रुपए कमाए. साथ ही, उन्हें अपने खेत में उगाया गया अधिक पौष्टिक भोजन भी मिलने लगा.
उनकी सफलता की चर्चा जल्द ही गाँव में फैलने लगी. पड़ोसी उनके खेत पर आकर खेती के तरीक़ों और नतीजों के बारे में जानने लगे.
पूरे समुदाय में फैलता बदलाव
भैयालाल और पूजा की यह पहल अब केवल उनके खेत तक सीमित नहीं रही.
गाँव के अन्य किसान भी ऐसे तरीक़े अपनाने लगे हैं, जिनसे रसायनों का इस्तेमाल कम हो, मिट्टी की सेहत सुधरे और पानी का बेहतर प्रबन्धन किया जा सके.
महिला समूह इस बदलाव में अहम भूमिका निभा रहे हैं. वे जानकारी साझा करते हैं, नए प्रयोगों के लिए प्रोत्साहित करते हैं और किसानों को एक-दूसरे से सीखने का अवसर देते हैं.
एक खेत से शुरू हुआ छोटा-सा बदलाव अब धीरे-धीरे पूरे गाँव में फैल रहा है.
भविष्य की ओर
भैयालाल और पूजा अब भविष्य को लेकर अधिक आशावान हैं. वे अलग-अलग फ़सलें उगा रहे हैं, मिट्टी की सेहत सुधारने के प्रयास जारी रखे हुए हैं और सब्ज़ी उत्पादन बढ़ाने की योजना बना रहे हैं.
वे अपने अनुभव गाँव के अन्य किसानों के साथ भी साझा कर रहे हैं.
भैयालाल कहते हैं, “हमने एक बात सीखी है. अगर हम मिट्टी की देखभाल करेंगे, तो मिट्टी हमारी देखभाल करेगी.”
उनकी कहानी से स्पष्ट है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े निवेश की ज़रूरत नहीं होती. कई बार इसकी शुरुआत छोटे फ़ैसलों, स्थानीय ज्ञान और कुछ नया आज़माने के साहस से होती है.
ऐसे छोटे प्रयास केवल एक परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि ऐसी ही चुनौतियों का सामना कर रहे अनेक लोगों के लिए भी उम्मीद बन सकते हैं.
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