भूमि बहाली, मरुस्थलीकरण रोकने और सूखे से निपटने के सात अहम उपाय
दुनिया भर में, भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण और बढ़ते सूखे से, अरबों लोगों और अनगिनत प्रजातियों का भविष्य ख़तरे में है. विशेषज्ञों का कहना है कि टिकाऊ तरीक़े से खेतीबाड़ी करने, मिट्टी व जल स्रोतों की रक्षा करने और पर्याप्त निवेश जैसे उपायों से, अभी तक क्षतिग्रस्त हो चुके पारिस्थितिकी तंत्रों में फिर से जान फूँकी जा सकती है.
पृथ्वी पर भूमि जीवन का आधार है. वन, खेत, सवाना, पीटलैंड और पर्वतीय क्षेत्र हमें भोजन, पानी और जीवन के लिए ज़रूरी कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं.
लेकिन दुनिया की 2 अरब हैक्टेयर से अधिक भूमि क्षरित हो चुकी है. इससे 3 अरब से अधिक लोग प्रभावित हैं और अनगिनत प्रजातियों का अस्तित्व ख़तरे में है.
गहराते सूखे और बढ़ते तापमान के बीच उपजाऊ भूमि को, रेगिस्तान बनने और मीठे पानी के स्रोतों को सूखने से रोकना बेहद ज़रूरी हो गया है.
यह चुनौती बड़ी है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सभी के मिलकर प्रयास करने से इससे निपटा जा सकता है.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के पारिस्थितिकी तंत्र प्रभाग की उपनिदेशक डोरीन रॉबिन्सन कहती हैं, “मानवता ने पृथ्वी को जो नुक़सान पहुँचाया है, उसकी भरपाई में सरकारों और व्यवसायों की प्रमुख भूमिका है. लेकिन पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली में आम लोगों का योगदान भी बेहद अहम है, क्योंकि हमारा भविष्य इसी पर निर्भर है.”
इसी को ध्यान में रखते हुए, UNEP के प्रकाशन We Are #Generation Restoration में भूमि और पारिस्थितिकी तंत्रों को फिर से स्वस्थ बनाने के सात उपाय बताए गए हैं.
1. कृषि को टिकाऊ बनाएँ
दुनिया भर में विशेषकर ग्रामीण और निर्धन क्षेत्रों के कम से कम 2 अरब लोग अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं. लेकिन मौजूदा खाद्य प्रणालियाँ टिकाऊ नहीं हैं और भूमि क्षरण के प्रमुख कारणों में शामिल हैं.
सरकारें और वित्तीय संस्थान ऐसी कृषि को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे खाद्य उत्पादन बढ़े और पारिस्थितिकी तंत्र भी सुरक्षित रहें.
कृषि उत्पादकों को हर वर्ष लगभग 540 अरब डॉलर की सरकारी सहायता मिलती है. लेकिन इनमें से क़रीब 87 प्रतिशत अनुदान राशि या तो बाज़ार की क़ीमतों को प्रभावित करती है या प्रकृति व मानव स्वास्थ्य को नुक़सान पहुँचाती है. सरकारें इस कृषि अनुदान को टिकाऊ खेती और छोटे किसानों की मदद की ओर मोड़ सकती हैं.
कृषि कम्पनियाँ जलवायु सहनसक्षम फ़सलें विकसित कर सकती हैं, आदिवासी समुदायों के पारम्परिक ज्ञान से सीख सकती हैं और मिट्टी को सुरक्षित रखने के लिए कीटनाशकों व उर्वरकों का सावधानी के साथ इस्तेमाल कर सकती हैं.
लोग स्थानीय, मौसमी और पौध-आधारित भोजन को प्राथमिकता दे सकते हैं. फलियाँ, दाल, चना और मटर जैसे खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करना भी मिट्टी के लिए लाभकारी हो सकता है.
2. मिट्टी की रक्षा करें
मिट्टी केवल हमारे पैरों के नीचे की धूल नहीं है. यह पृथ्वी के सबसे समृद्ध पर्यावासों में से एक है. दुनिया की लगभग 60 प्रतिशत प्रजातियाँ मिट्टी में रहती हैं और हमारे भोजन का 95 प्रतिशत हिस्सा इसी से पैदा होता है.
स्वस्थ मिट्टी बड़ी मात्रा में कार्बन को अपने भीतर जमा रखती है और ग्रीनहाउस गैसों को वातावरण में जाने से रोकती है. इस तरह यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में अहम भूमिका निभाती है.
मिट्टी को स्वस्थ और उपजाऊ बनाए रखने के लिए सरकारें और वित्तीय संस्थान जैविक तथा मिट्टी के अनुकूल खेती को बढ़ावा दे सकते हैं.
कृषि कम्पनियाँ शून्य-जुताई (zero-tillage) जैसी तकनीक अपना सकती हैं, जिसमें मिट्टी को जोते बिना फ़सल उगाई जाती है और उसकी ऊपरी जैविक परत सुरक्षित रहती है. मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए उसमें खाद और अन्य जैविक पदार्थ भी मिलाए जा सकते हैं.
ड्रिप सिंचाई और अन्य तकनीकों से मिट्टी में नमी बनाए रखने और सूखे के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है.
लोग फलों और सब्ज़ियों के बचे हुए हिस्सों से खाद बनाकर उसका इस्तेमाल, अपने बाग़ीचजों और घरों में रखे गमलों में कर सकते हैं.
3. परागण करने वाले जीवों की रक्षा करें
फल और बीज देने वाली हर चार में से तीन फ़सलें, परागण करने वाले जीवों पर निर्भर हैं. मधुमक्खियाँ इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं, लेकिन चमगादड़, तितलियाँ, पक्षी, भृंग आदि कीट भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. चमगादड़ों के बिना केले, एवोकाडो और आम जैसी फ़सलों का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है.
इतनी अहम भूमिका के बावजूद, परागण करने वाले जीवों की संख्या तेज़ी से घट रही है, विशेषकर मधुमक्खियों की.
इनकी रक्षा के लिए वायु प्रदूषण कम करना, कीटनाशकों और उर्वरकों का सावधानी से इस्तेमाल करना तथा घास के मैदानों, वनों व आर्द्रभूमियों को बचाना ज़रूरी है.
शहरों में घास की कटाई कम की जा सकती है और छोटे तालाब बनाए जा सकते हैं, जहाँ ये जीव पनप सकें.
घरों और शहरों के बगीचों में स्थानीय फूल लगाने से मधुमक्खियों, तितलियों व पक्षियों को आकर्षित करने में भी मदद मिलेगी.
4. मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली करें
नदियाँ, झीलें और आर्द्रभूमियाँ जैसे सामान्य पानी के पारिस्थितिकी तंत्र, जल चक्र को बनाए रखते हैं और भूमि को उपजाऊ बनाने में मदद करते हैं. ये अरबों लोगों को भोजन और पानी उपलब्ध कराते हैं, सूखे व बाढ़ का असर कम करते हैं तथा अनगिनत पौधों व जीवों को रहने की जगह देते हैं.
लेकिन प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक मछली पकड़ने और पानी के ज़रूरत से ज़्यादा दोहन के कारण, ये पारिस्थितिकी तंत्र तेज़ी से नष्ट हो रहे हैं.
इनकी रक्षा के लिए पानी की गुणवत्ता सुधारना, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करना और नदियों, झीलों व आर्द्रभूमियों की नियमित निगरानी करना ज़रूरी है.
देश वर्ष 2030 तक क्षतिग्रस्त नदियों और आर्द्रभूमियों की बहाली तेज़ करने के लिए ‘फ़्रेशवॉटर चुनौती’ (Freshwater Challenge) में शामिल हो सकते हैं.
क्षतिग्रस्त क्षेत्रों से आक्रामक प्रजातियों को हटाकर वहाँ स्थानीय वनस्पतियाँ दोबारा लगाई जा सकती हैं. शहर सीवेज प्रबन्धन, वर्षा जल निकासी और शहरी बाढ़ से निपटने के लिए अपशिष्ट जल से जुड़े नवाचारी उपायों को बढ़ावा दे सकते हैं.
5. तटीय और समुद्री क्षेत्रों की बहाली
महासागर और समुद्र हमें ऑक्सीजन, भोजन और पानी देते हैं. वे जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने और समुदायों को चरम मौसम से निपटने में भी मदद करते हैं. विकासशील देशों में 3 अरब से अधिक लोग अपनी आजीविका के लिए समुद्री और तटीय जैव विविधता पर निर्भर हैं.
देश, इस प्राकृतिक सम्पदा को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाने की ख़ातिर, कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ़्रेमवर्क को तेज़ी से लागू कर सकती हैं.
देश मैन्ग्रोव, खारे दलदली क्षेत्रों, केल्प वनों और प्रवाल भित्तियों जैसे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली कर सकते हैं. प्रदूषण, खेतों से बहकर आने वाले रसायनों, औद्योगिक कचरे और प्लास्टिक को तटीय क्षेत्रों तक पहुँचने से रोकने के लिए सख़्त नियम भी लागू किए जा सकते हैं.
देश प्लास्टिक उत्पादों को इस तरह बना सकते हैं कि उनका दोबारा इस्तेमाल, मरम्मत और पुनर्चक्रण किया जा सके और वे महासागरों तक न पहुँचें. व्यवसाय अपशिष्ट जल और पशुओं के कचरे से पोषक तत्व निकालकर उन्हें उर्वरक के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.
6. शहरों में प्रकृति को वापस लाएँ
दुनिया की आधी से अधिक आबादी शहरों में रहती है और वर्ष 2050 तक हर तीन में से दो लोगों के शहरों में रहने का अनुमान है.
शहर पृथ्वी के 75 प्रतिशत संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं, आधे से अधिक वैश्विक कचरा पैदा करते हैं और कम से कम 60 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं.
शहरों के फैलाव से आसपास का प्राकृतिक वातावरण प्रभावित होता है, जिससे भूमि क्षरण और सूखे का ख़तरा बढ़ सकता है.
लेकिन शहरों को कंक्रीट के जंगल बनने की ज़रूरत नहीं है. शहरी वन हवा को साफ़ कर सकते हैं, छाया बढ़ा सकते हैं और ठंडक के लिए मशीनों पर निर्भरता कम कर सकते हैं.
नहरों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों की रक्षा करने से तापलहरों का असर कम हो सकता है और जैव विविधता बढ़ सकती है. इमारतों की छतों व दीवारों पर बाग़ीचे लगाने से पक्षियों, कीटों और पौधों को भी जगह मिल सकती है.
7. बहाली के लिए वित्त जुटाएँ
दुनिया के जलवायु, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली से जुड़े लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रकृति-आधारित समाधानों में निवेश, वर्ष 2030 तक दोगुने से अधिक बढ़ाकर 542 अरब डॉलर करना होगा.
देशों की सरकारें, मौजूदा वित्तीय कमी को दूर करने के लिए, सूखे के सबसे गम्भीर प्रभावों से बचाव के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियों में निवेश कर सकती हैं. वे भूमि बहाली के प्रयासों और प्रकृति-आधारित समाधानों के लिए धनराशि भी उपलब्ध करा सकती हैं.
निजी क्षेत्र अपने व्यावसायिक मॉडल में पारिस्थितिकी तंत्रों की बहाली को शामिल कर सकता है, प्रभावी कचरा प्रबन्धन अपना सकता है और टिकाऊ कृषि, पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन व हरित प्रौद्योगिकी पर काम करने वाले सामाजिक उद्यमों में निवेश कर सकता है.
लोग अपने बैंक खाते ऐसे वित्तीय संस्थानों में स्थानान्तरित कर सकते हैं, जो टिकाऊ उद्यमों में निवेश करते हैं. वे बहाली के प्रयासों के लिए दान दे सकते हैं या पृथ्वी की रक्षा में मदद करने वाले नवाचारों के लिए सामूहिक वित्तपोषण कर सकते हैं.
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