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नीली और सफेद वर्दी पहने भारतीय स्कूली छात्राओं का एक समूह दो वयस्क महिलाओं के साथ जमीन पर एक घेरे में बैठा है, जो संभवतः UNV की स्वयंसेवक हैं, एक बाहरी सत्र के दौरान।

भारत: आदिवासी इलाक़ों में लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ते UN स्वयंसेवक

© UNV India भारत में स्वयंसेवक पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से नहीं बल्कि सामुदायिक सेवा के माध्यम से बदलाव ला रहे हैं.

भारत: आदिवासी इलाक़ों में लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ते UN स्वयंसेवक

मानवीय सहायता

भारत के मध्य प्रदेश और राजस्थान के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों मेंआदि कर्मयोगी परियोजना के तहत 82 यूएन स्वयंसेवकों ने 260 गाँवों में लगभग 56 हज़ार लोगों तक पहुँच बनाई है. इस पहल के ज़रिए, परिवारों को सरकारी योजनाओंज़रूरी सेवाओं और सहायता के साथ जोड़ने में मदद मिली है.

कई युवाओं के लिए पहला रोज़गार एक अमूल्य यादगार होता है. लेकिन भारत में UNV से जुड़े कुछ स्वयंसेवकों के लिए यह अनुभव जीवन बदलने वाला साबित हुआ.

उन्हें मध्य प्रदेश और राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में तैनात किया गया था. काम सरल था, लेकिन बेहद अहम: सरकारी सहायता को उन लोगों के क़रीब लाना, जिनके लिए वह बनाई गई है.

इसके लिए स्वयंसेवक गाँव-गाँव और घर-घर पहुँचे. 82 UN स्वयंसेवकों ने 82 आदिवासी स्थानों के 260 गाँवों में काम किया और लगभग 56 हज़ार लोगों तक पहुँच बनाई. 

उन्होंने परिवारों को उन सरकारी सेवाओं और अधिकारों के बारे में जानकारी दी, जिनके बारे में उन्हें शायद पहले मालूम नहीं था, या जिन तक वे पहुँच नहीं बना पाए थे.

भारत में यूएन स्वयंसेवक, समुदाय सेवा के ज़रिए बदलाव ला रहे हैं, और ऐसी सीख हासिल कर रहे हैं जो कोई किताब नहीं सिखा सकती.
© UNV India भारत में यूएन स्वयंसेवक, समुदाय की सेवा के ज़रिए बदलाव ला रहे हैं, और ऐसी सीख हासिल कर रहे हैं जो कोई किताब नहीं सिखा सकती.

भारत के आदिवासी क्षेत्र संस्कृति और पारम्परिक ज्ञान से समृद्ध हैं. लेकिन इनमें से अनेक समुदाय दूरस्थ इलाक़ों में रहते हैं, जहाँ लोगों तक सेवाएँ पहुँचाना आसान नहीं होता. इसी वजह से सरकार के लिए सेवाओं को समुदायों के और क़रीब लाना एक अहम प्राथमिकता है.

इसी सन्दर्भ में भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने आदि कर्मयोगी अभियान शुरू किया. इस पहल का उद्देश्य दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय शासन को अधिक प्रभावी बनाना है.

इस प्रयास को समर्थन देने के लिए, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) और संयुक्त राष्ट्र स्वयंसेवक संस्था (UNV) ने समुदायों को सेवाओं से जोड़ने और स्थानीय नेतृत्व को मज़बूत करने के लिए, भारतीय मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया.

किताबों से आगे की सीख

कई स्वयंसेवकों के लिए यह काम आदिवासी समुदायों और स्थानीय शासन से पहला नज़दीकी परिचय था. उन्हें पहली बार यह देखने और समझने का अवसर मिला कि विकास कार्यक्रम, ज़मीनी स्तर पर किस तरह काम करते हैं.

स्वयंसेवकों को, काम शुरू करने से पहले, UNFPA और UNV ने प्रशिक्षण दिया. इसमें नैतिक आचरण, कार्यस्थल सुरक्षा और यौन उत्पीड़न की रोकथाम जैसे विषय शामिल थे.

यूएन स्वयंसेवकों की सेवा उन्हें सीधे घरों, गाँवों, स्कूलों और स्थानीय कार्यालयों तक ले गई.
© UNV India यूएन स्वयंसेवकों की सेवा उन्हें सीधे घरों, गाँवों, स्कूलों और स्थानीय कार्यालयों तक ले गई.

इसके बाद उनकी सेवा उन्हें सीधे घरों, गाँवों, स्कूलों और स्थानीय कार्यालयों तक ले गई. उन्होंने ज़िला और स्थानीय जनजातीय अधिकारियों के साथ मिलकर, घर-घर सर्वेक्षण किए, योजना-निर्माण में सहायता की और स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका व सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाई.

राजस्थान के उदयपुर में सेवा देने वाले UN स्वयंसेवक राजू कुँवर कहते हैं, “आदिवासी गाँवों में काम करने से मेरी आँखें खुलीं कि लोग वास्तविक जीवन में किन संघर्षों का सामना करते हैं.”

उन्होंने कहा, “जनजातीय विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन में मैंने सीखा कि छोटे, ईमानदार प्रयास भी सार्थक बदलाव ला सकते हैं. इसने मुझे वे बातें सिखाईं, जो कोई किताब नहीं सिखा सकती थी. लोगों की ज़रूरतों को समझना, उनकी कहानियाँ सुनना और व्यवस्था के भीतर काम करना - इन सबने मुझे समावेशी विकास को व्यवहार में देखने का अवसर दिया.”

भारत के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में, UN स्वयंसेवक, परिवारों को जानकारी, सेवाओं और सहायता से जोड़ने में मदद कर रहे हैं.
© UNV India भारत के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में, UN स्वयंसेवक, परिवारों को जानकारी, सेवाओं और सहायता से जोड़ने में मदद कर रहे हैं.

जानकारी से सशक्तिकरण

गाँव के स्तर पर, स्वयंसेवकों ने परिवारों को, आयुष्मान भारत, PM उज्ज्वला योजना, PM आवास योजना, जल जीवन मिशन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान, स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया और सुकन्या समृद्धि योजना जैसी सरकारी योजनाओं को समझने में मदद की.

कई परिवारों के लिए यह पहला मौक़ा था, जब उन्हें उपलब्ध सहायता के बारे में स्पष्ट और भरोसेमन्द जानकारी मिली.

यूएन स्वयंसेवक वसु चौबे ने कहा, “किसी परिवार को यह समझने में मदद करना कि वे किसी सरकारी योजना के पात्र हैं, और उनके चेहरे पर राहत देखना बेहद संतोषजनक था. इससे मुझे अहसास हुआ कि जानकारी तक पहुँच अपने आप में सशक्तिकरण का एक रूप है.”

स्वयंसेवकों ने आदिवासी सेवा केन्द्रों और ज़िला कार्यालयों में भी मदद की. उन्होंने स्कूलों में आपसी सीख के सत्र आयोजित करने में सहयोग दिया, जहाँ युवा सवाल पूछने, नई जानकारी हासिल करने और अपने भविष्य के बारे में अधिक आत्मविश्वास से सोचने का मौक़ा मिल सके. 

जनजातीय गौरव दिवस और उसके बाद सप्ताह भर चले कार्यक्रमों के दौरान यह प्रयास और भी स्पष्ट दिखा. स्वयंसेवकों ने स्वास्थ्य शिविरों, स्वच्छता अभियानों और सामुदायिक कार्यक्रमों में मदद की, जिससे यह सांस्कृतिक आयोजन गरिमा और समावेशन का मंच बन गया.

स्वयंसेवकों को “Just Ask” नामक AI-सक्षम chatbot का इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण भी दिया गया, जो सामाजिक मुद्दों और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों पर जानकारी देता है.
© UNV India स्वयंसेवकों को “Just Ask” नामक AI-सक्षम chatbot का इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण भी दिया गया, जो सामाजिक मुद्दों और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों पर जानकारी देता है.

तकनीक और परम्परा का मेल

UNFPA के शासनादेश के अनुरूप, स्वयंसेवकों को “Just Ask” नामक AI-सक्षम chatbot का इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण भी दिया गया. यह chatbot सामाजिक मुद्दों और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों के बारे में जानकारी देता है.

ऐसे इलाक़ों में, जहाँ इन विषयों पर अक्सर खुलकर बात नहीं होती, इस उपकरण ने किशोरों को सवाल पूछने और भरोसेमन्द जानकारी पाने के लिए एक सुरक्षित और गोपनीय स्थान दिया.

एक यूएन स्वयंसेवक ममता बाई कहती हैं, “हमें संवेदनशील मुद्दों पर बात करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करने से, युवाओं के साथ सम्मानजनक और सार्थक तरीक़े से जुड़ने में मदद मिली.”

यूएन स्वयंसेवकों की सेवा उन्हें सीधे घरों, गाँवों, स्कूलों और स्थानीय कार्यालयों तक ले गई.
© UNV India यूएन स्वयंसेवकों की सेवा उन्हें सीधे घरों, गाँवों, स्कूलों और स्थानीय कार्यालयों तक ले गई.

स्थानीय भरोसा

स्वयंसेवकों ने हर सप्ताह समीक्षा बैठकों और रिपोर्टिंग के ज़रिए, अपने अनुभव साझा किए. उन्होंने यह समझा कि कहाँ मुश्किलें आ रही हैं, क्या तरीक़ा काम कर रहा है और समुदायों तक बेहतर तरीक़े से किस तरह पहुँचा जा सकता है.

कार्यक्रम के अन्त तक, वे 82 आदिवासी स्थानों के 260 गाँवों में लगभग 56 हज़ार लोगों तक पहुँच चुके थे.

ईश्वर नामक एक स्वयं सेवक कहते हैं, “इस फ़ैलोशिप ने केवल उन समुदायों में ही बदलाव नहीं लाया, जिनकी हमने सेवा की - इसने हमारे अन्दर भी बदलाव किया है.”

स्वयंसेवकों के लिए यह अनुभव एक बड़ा मोड़ था. उन्होंने नज़दीक से देखा कि सरकारी नीतियाँ लोगों तक कैसे पहुँचती हैं, और युवाओं की सेवा भावना ज़मीनी स्तर पर कितना बदलाव ला सकती है.

समुदायों के लिए भी इसका असर साफ़ दिखा. लोगों को अपने अधिकारों और योजनाओं के बारे में बेहतर जानकारी मिली, स्थानीय सहायता प्रणालियों से उनका जुड़ाव बढ़ा, और उन्हें अपने सवालों के जवाब पाने के लिए भरोसेमन्द जगह मिली.

आदि कर्मयोगी फ़ैलोशिप ने दिखाया कि जब सरकारी सहयोग, समुदायों का अनुभव और युवजन की ऊर्जा साथ आते हैं, तो बदलाव गाँव-गाँव तक पहुँचता है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.