भारत: सौर ऊर्जा और सामुदायिक नेतृत्व से गाँवों में जल सुरक्षा को मिली नई दिशा
भारत के पूर्वी प्रदेश छत्तीसगढ़ के दूरदराज़ आदिवासी गाँवों में सौर ऊर्जा से चलने वाले पम्प अब सुरक्षित पेयजल सीधे घरों तक पहुँचा रहे हैं. इससे महिलाओं और लड़कियों का बोझ कम तो हो ही रहा है साथ ही, ग्रामीण समुदाय जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक मज़बूत बन रहे हैं.
35 वर्षीय पूजा साहू जब अपनी शादी के बाद छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के दरबा गाँव आईं, तो पानी की समस्या उन पहली चुनौतियों में से एक थी, जिसे उन्होंने क़रीब से महसूस किया.
पूजा बताती हैं, “मैं शादी के बाद जब इस गाँव में आई, तो समुदाय के लोगों की परेशानियों से रूबरू हुई, ख़ासतौर पर पानी की आपूर्ति की समस्या से. मैं पिछले साल ही सरपंच बनी.”
पूजा आज दरबा की निर्वाचित सरपंच के रूप में, ‘जल बहिनियों’ नामक प्रशिक्षित महिला जल स्वयंसेवकों के साथ मिलकर, गाँव की सौर ऊर्जा से संचालित पेयजल प्रणाली के प्रबन्धन और निगरानी में मदद कर रही हैं.
यह काम छत्तीसगढ़ में हो रहे एक व्यापक बदलाव का हिस्सा है, जहाँ स्वच्छ ऊर्जा उन समुदायों तक नल से जल पहुँचा रही है, जहाँ पारम्परिक बुनियादी ढाँचा लम्बे समय से नहीं पहुँच पाया था.
दरअसल, छत्तीसगढ़ के दूरदराज के आदिवासी गाँवों में महिलाओं और लड़कियों के लिए पानी लाना कोई रोज़मर्रा का काम नहीं, बल्कि एक सज़ा जैसा था. हर दिन घंटों का समय इसी सफ़र में खप जाता था, और इसे कम करने का कोई आसान विकल्प नहीं था.
लेकिन आज, यह तस्वीर बदल रही है.
वही सूरज, जो कभी इस लम्बे सफ़र को और कठिन बना देता था, अब सौर पम्पों के ज़रिए सीधे घरों तक पानी पहुँचाने में मदद कर रहा है.
ग्रिड से दूर गाँवों तक पहुँच
घने जंगलों और ऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच बसा ग्रामीण छत्तीसगढ़, भौगोलिक रूप से भारत के सबसे कठिन इलाक़ों में से एक है और देश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादियों में से एक का घर है.
ऐसे दुर्गम इलाक़े में न तो बिजली के तार बिछाना आसान था, और न ही यह कम लागत वाला था. यहाँ बिजली नहीं, तो पम्प नहीं. पम्प नहीं, तो नल या पाइप से पानी नहीं. बुनियादी ढाँचे की यह कमी, दरअसल, भूगोल की भी समस्या थी.
भारत के जल जीवन मिशन के तहत, छत्तीसगढ़ ने एक अहम फ़ैसला लिया. दूरदराज़ गाँवों तक बिजली ग्रिड पहुँचने का इन्तेज़ार करने की बजाय, प्रदेश ने अपने दम पर चलने वाले सौर पम्प लगाए और उन बस्तियों तक पाइप से पानी पहुँचाया, जिन्हें पारम्परिक बुनियादी ढाँचा कभी छू भी नहीं पाया था.
कोयला उत्पादन के लिए प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में, अधिकाँश ग्रिड-आधारित जल योजनाएँ कोयले से उत्पन्न बिजली पर निर्भर रहती हैं. इसके विपरीत, ग्रिड के बिना चलने वाली सौर प्रणालियाँ पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करती हैं और सीधे सूर्य की रोशनी से ऊर्जा प्राप्त करती हैं.
स्थाई प्रभाव
जैसे-जैसे मौसम का मिज़ाज बदल रहा है और ऊर्जा की लागत बढ़ रही है, यूनीसेफ़ और सरकार मिलकर ग्रामीण इलाक़ों में सौर ऊर्जा चालित और ऊर्जा-दक्ष जल आपूर्ति प्रणालियों को बढ़ावा दे रहे हैं.
इसका उद्देश्य है कि वॉश सेवाएँ जलवायु बदलावों से निपटने में अधिक सहनसक्षम बन सकें. ये प्रणालियाँ साफ़ पेयजल की आपूर्ति को ज़्यादा भरोसेमन्द बनाती हैं और साथ ही लागत, पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता, जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल तथा समुदायों पर बोझ को कम करती हैं.
यह मॉडल जितना सरल है, उतना ही टिकाऊ भी है. 1.2 किलोवाट का सोलर पम्प, 10 हज़ार लीटर का पानी का टैंक और घर-घर तक नल कनेक्शन का एक नैटवर्क.
हर इकाई पूरी तरह सौर ऊर्जा पर चलती है और हर दिन, दिन में दो बार पानी देती है. न कोई ईंधन, न बिजली का ख़र्च, न किसी बाहरी ग्रिड का झंझट.
अप्रैल 2026 तक, छत्तीसगढ़ के सभी 31 ज़िलों में ऐसी लगभग साढ़े 7 योजनाएँ शुरू हो चुकी थीं, जो प्रदेश की एकल-गाँव पाइप जल आपूर्ति प्रणालियों का 25 प्रतिशत हिस्सा हैं.
धमतरी ज़िला अब एक मॉडल सोलर हब के रूप में पहचाना जाता है. यहाँ 226 योजनाएँ साढ़े 6 से अधिक घरों को पानी पहुँचा रही हैं. इनसे हर साल लगभग 5 लाख 94 हज़ार यूनिट स्वच्छ ऊर्जा पैदा हो रही है और 420 टन से ज़्यादा CO₂ उत्सर्जन से बचा जा रहा है.
इससे भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) 3.0 लक्ष्य को भी बल मिलता है.
जो पहल बुनियादी ढाँचे की कमी दूर करने के समाधान के रूप में शुरू हुई थी, वह अब चुपचाप एक जलवायु समाधान बन गई है.
व्यवस्था सम्भालती महिलाएँ
लेकिन इस मॉडल की सफलता केवल तकनीक पर निर्भर नहीं है. दरबा जैसे गाँवों में, सेवा वितरण के केन्द्र में महिलाएँ हैं.
ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियाँ, प्रशिक्षित जल बहिनियों के सहयोग से, दैनिक संचालन सम्भालती हैं. इनमें जल शुल्क की वसूली, जल वितरण और गुणवत्ता की निगरानी, तथा कोई ख़राबी आने पर मरम्मत की सूचना देना शामिल है. ये महिलाएँ इस व्यवस्था की महज़ लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि इसकी असली संरक्षक हैं.
दरबा की जल बहिनी ज्योति वर्मा के लिए, यह बदलाव रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में साफ़ दिखाई देता है.
वो कहती हैं, “पहले बोरवेल से पानी लाना बहुत मुश्किल था. सौर पम्पों ने जल आपूर्ति को कहीं अधिक सुविधाजनक बना दिया है. जिस काम में पहले घंटों का समय लगता था, वह अब हमारे दरवाज़े पर कुछ ही मिनटों में हो जाता है. अब मुझे अपने छोटे बच्चे के साथ क़ीमती समय मिल पाता है.”
जिन महिलाओं को पहले पानी लाने में घंटों लग जाते थे, उनके लिए घर के दरवाज़े पर नल कनेक्शन होना, सुविधा से कहीं बढ़कर है.
यह उनके लिए वो बचा हुआ समय है, जिसे वे अब अपने बच्चों के साथ, अपनी आजीविका बढ़ाने में, आराम करने में और अपने लिए इस्तेमाल कर सकती हैं. पानी जैसी ज़िन्दगी की सबसे ज़रूरी चीज़ तक पहुँच में यह एक शान्त, लेकिन गहरा बदलाव है.
पहुँच से स्वामित्व तक
छत्तीसगढ़ की सौर जल आपूर्ति की कहानी वास्तविक और उल्लेखनीय है. लेकिन यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है.
राज्य में सौर ऊर्जा से संचालित जल आपूर्ति अब केवल एक पायलट पहल नहीं रही. यह एक सिद्ध और विस्तार योग्य मॉडल बन चुका है. इससे दूरदराज़ के घरों तक स्वच्छ जल पहुँच रहा है, कार्बन उत्सर्जन व संचालन लागत घट रही है, और जल सेवा की व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका मज़बूत हो रही है.
छत्तीसगढ़ ने दिखाया है कि जब तकनीक को स्थानीय ज़रूरतों व भूगोल के अनुरूप ढाला जाता है, समुदायों पर नेतृत्व के लिए भरोसा किया जाता है, और स्वच्छ ऊर्जा व स्वच्छ जल को साथ लेकर चला जाता है, तो बड़ा बदलाव सम्भव हो सकता है.
पूजा साहू के लिए, यह बदलाव बेहद निजी भी है.
उनका कहना है, “जब से मैं सरपंच बनी हूँ, मेरे बच्चे मुझ पर गर्व करते हैं. वे मुझे बैठकों में जाते और लोगों की समस्याएँ हल करते हुए देखते हैं.”
लेकिन पूजा साहू अगली ज़िम्मेदारी भी स्पष्ट रूप से समझती हैं - उस पानी की बचत करना, जो अब आख़िरकार लोगों के घरों तक पहुँच गया है.
“मैं सभी समुदाय सदस्यों से आग्रह करना चाहती हूँ कि वे पानी का महत्व समझें और इसे व्यर्थ न करें. अब जब पानी उनके दरवाज़े तक पहुँच गया है, तो इसका सोच-समझकर उपयोग करना भी ज़रूरी है.”
हर बच्चे का अधिकार
छत्तीसगढ़ में हर सुबह सूरज उन जंगलों और पहाड़ियों के ऊपर उगता है, जिन्होंने कभी यहाँ के लोगों को सबसे बुनियादी हक़ से दूर रखा था.
आज वही सूरज सोलर पैनलों पर चमकता है, जो धीरे-धीरे सक्रिय होते हैं, पानी को ऊपर खींचते हैं और उसे घरों, रसोईघरों और स्कूल जाते बच्चों के हाथों तक पहुँचाते हैं.
तकनीक सरल है. लेकिन इसका असर बहुत गहरा है.
यह बदलाव किसी एक योजना या आँकड़े तक सीमित नहीं है. यह समुदायों और उनके भविष्य के बीच एक नए भरोसे की शुरुआत है, जो इस विश्वास पर आधारित है कि स्वच्छ, सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल और उससे जुड़ी गरिमा हर व्यक्ति का अधिकार है.
बच्चों के लिए, इसका अर्थ है बेहतर स्वास्थ्य, स्कूल में अधिक समय, और ऐसे समुदायों में बड़ा होने का अवसर, जहाँ सुरक्षित पानी तक पहुँच अब अनिश्चित नहीं रही.
यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.