भारत: सिन्धुदुर्ग में प्रवाल भित्तियों की रक्षा में जुटे युवा ग़ोताख़ोर
महाराष्ट्र के सिन्धुदुर्ग ज़िले में, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के समर्थन वाली परियोजनाओं ने स्थानीय युवाओं को समुद्री संरक्षण, ज़िम्मेदार ग़ोताख़ोरी और प्रवाल भित्तियों की बहाली से जोड़ा है. इन्हीं प्रयासों के तहत, भूषण जुवाटकर जैसे युवा ग़ोताख़ोर अब अपने समुद्र, आजीविका और अगली पीढ़ी के भविष्य की रक्षा में अहम भूमिका निभा रहे हैं.
भूषण जुवाटकर कहते हैं कि बचपन से ही समुद्र उनके जीवन का हिस्सा रहा है. महाराष्ट्र के सिन्धुदुर्ग ज़िले में पारम्परिक मछुआरा समुदाय से आने वाले उनके परिवार की कई पीढ़ियाँ, भारत के पश्चिमी तट पर अरब सागर में मछली पकड़ती रही हैं.
उनका बचपन भी समुद्र के अनुभवों से भरा रहा - हथेलियों पर रस्सियों की खुरदरी रगड़, सुबह-सुबह गीले जाल उठाने का भार, नंगे पैरों के नीचे लकड़ी की नावों की चरमराहट और मछलियों की हल्की गन्ध.
भूषण, पिछले एक दशक से अधिक समय से, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) भारत द्वारा समर्थित उन परियोजनाओं से जुड़े हैं, जो महाराष्ट्र के सिन्धुदुर्ग ज़िले में भारत के तटीय क्षेत्रों के सहनसक्षम प्रबन्धन पर केन्द्रित हैं.
लहरों के नीचे की दुनिया से परिचय
भूषण की समुद्री संरक्षण यात्रा, भारत सरकार, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम - वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GoI-UNDP-GEF) की संयुक्त सिन्धुदुर्ग परियोजना से शुरू हुई, जिसे 2012 से 2018 के बीच लागू किया गया था.
इस परियोजना के तहत, ज़िले के 20 युवजन को ग़ोताख़ोरी के मास्टर-स्तर के प्रशिक्षण के लिए चुना गया. इसका उद्देश्य तटीय समुदायों के लिए आजीविका के नए अवसर तैयार करना था.
भूषण याद करते हैं, “उस समय मेरी उम्र केवल 20 वर्ष थी, जब मैंने पहली बार पानी के भीतर ग़ोता लगाया. वह अनुभव मेरे लिए जादुई था.”
उन्हें सारगैसम समुद्री शैवाल के बीच तैरना आज भी याद है, जो उन्हें पानी के भीतर घने जंगल से गुज़रने जैसा लगा. फिर उन्होंने पहली बार प्रवाल देखे - टर्बिनेरिया, जो कटोरों जैसे नज़र आते थे.
वह कहते हैं, “मैंने अपने प्रशिक्षक से कहा कि शायद किसी का कटोरा पानी के नीचे गिर गया है.”
उस पल सभी हँस पड़े, और आज भी उसकी याद उनके साथ है. यही वह क्षण था, जब उन्होंने समुद्री दुनिया को सचमुच समझना शुरू किया.
इस प्रशिक्षण ने भूषण और अन्य युवा ग़ोताख़ोरों को समुद्री जीव विज्ञान, प्रवाल पारिस्थितिकी तंत्रों और ज़िम्मेदार पर्यटन पद्धतियों से परिचित कराया. जिस समुद्र को वह पहले अनुभव और अवलोकन से जानते थे, अब उसे वह पारिस्थितिकी के नज़रिये से भी समझने लगे.
प्रवाल भित्तियाँ अब केवल पानी के भीतर की सुन्दर संरचनाएँ नहीं थीं; वे मछलियों की नर्सरी, जैव विविधता का आधार और तटीय अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देने वाली प्राकृतिक संरचना का हिस्सा थीं.
प्रवाल बहाली के केन्द्र में स्थानीय ग़ोताख़ोर
आज, भारत के तटीय समुदायों की जलवायु सहनसक्षमता बढ़ाने की परियोजना (ECRICC) के तहत, समुदाय-आधारित प्रवाल संरक्षण में भूषण जैसे स्थानीय ग़ोताख़ोर की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होने की उम्मीद है.
यह परियोजना भारत सरकार का पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय लागू कर रहा है, और इसे हरित जलवायु कोष (GCF) व भारत में UNDP का समर्थन प्राप्त है.
ये ग़ोताख़ोर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों की अपनी समझ और स्थानीय समुदायों से गहरे जुड़ाव के कारण, पानी के भीतर की बहाली के लाभों को तट पर रहने वाले लोगों तक सरल भाषा में पहुँचा सकते हैं.
वे कृत्रिम रीफ़ और स्थल पर ही विकसित की जाने वाली प्रवाल नर्सरियों की स्थापना में भी सहयोग करेंगे. इनके स्थापित होने के बाद, वे उनकी निगरानी और रखरखाव में मदद करेंगे.
सिन्धुदुर्ग की प्रवाल भित्तियाँ क्यों अहम
सिन्धुदुर्ग तटीय और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (SCME), भारतीय तट पर पहचाने गए 11 पारिस्थितिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण आवासों में से एक है.
वर्ष 2012 में, महाराष्ट्र वन विभाग ने मैन्ग्रोव और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण के लिए देश का पहला मैन्ग्रोव प्रकोष्ठ स्थापित किया. महाराष्ट्र में भारत के तटीय समुदायों की जलवायु सहनसक्षमता बढ़ाने की परियोजना के क्रियान्वयन में यही प्रकोष्ठ मुख्य विभाग है.
मैन्ग्रोव प्रकोष्ठ, मुम्बई के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक और महाराष्ट्र में इस परियोजना के राज्य परियोजना निदेशक डॉक्टर रविकिरण गोवेकर कहते हैं, “सिन्धुदुर्ग की प्रवाल भित्तियाँ भारत के सात संरक्षित समुद्री क्षेत्रों में शामिल हैं. स्थानीय समुदाय का समुद्र से गहरा रिश्ता है और वे इसके संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकते हैं."
"इसलिए हम टिकाऊ मत्स्य पालन, समुद्री जीवन को कम प्रभावित करने वाले पर्यटन और ज़िम्मेदार ग़ोताख़ोरी पर प्रशिक्षण व जागरूकता गतिविधियाँ आयोजित करते हैं. कई स्थानीय लोग कछुओं और डॉल्फ़िन जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के बचाव में भी वन कर्मचारियों की मदद कर रहे हैं.”
ग़ोताख़ोरी प्रशिक्षण से जलवायु कार्रवाई तक
भूषण की जलवायु कार्रवाई उनके ग़ोताख़ोर मास्टर प्रशिक्षण के दौरान और गहरी हुई. इस प्रशिक्षण में 60 ग़ोते लगाने का लक्ष्य पूरा करना अनिवार्य था.
भूषण और उनके साथियों ने इन ग़ोतों को केवल प्रशिक्षण की शर्त पूरा करने के रूप में नहीं देखा. उन्होंने इनका इस्तेमाल घोस्ट नेट हटाने के लिए किया. घोस्ट नेट फेंके हुए मछली पकड़ने वाले जाल होते हैं, जो प्रवाल चट्टानों में उलझकर समुद्री जीवन के बड़े हिस्सों को ढककर नष्ट कर सकते हैं.
इन जालों में मछलियाँ, केकड़े-झींगे जैसे समुद्री जीव और अन्य प्राणी फँस जाते हैं, जिससे व्यापक पारिस्थितिक नुक़सान हो सकता है.
भूषण कहते हैं, “2016 से 2026 के बीच, हमने 50 से अधिक सफ़ाई अभियान आयोजित किए हैं. इनमें कई मीट्रिक टन ठोस कचरा इकट्ठा किया गया है. क्षेत्र के आधार पर, एक ही अभियान में 300 किलो से लेकर 1.5 टन तक ठोस कचरा इकट्ठा किया जाता है.”
भावी पीढ़ी के लिए प्रवाल भित्तियों की बहाली
भूषण की पीढ़ी ने सिन्धुदुर्ग की समुद्री पारिस्थितिकी में बड़े बदलाव देखे हैं.
मछलियों की घटती पकड़ और विशाल ग्रूपर व रैड स्नैपर जैसी मछली प्रजातियों के लगभग ग़ायब हो जाने के अनुभव से, स्थानीय ग़ोताख़ोरों को समझ में आ गया है कि प्रवाल केवल पारिस्थितिक सन्तुलन के लिए ही नहीं, बल्कि उनके समुदाय की आजीविका और स्थिरता के लिए भी ज़रूरी हैं. ये प्रजातियाँ कभी इन जल क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पाई जाती थीं.
भूषण के लिए, प्रवाल भित्तियों की बहाली ऐसे भविष्य की उम्मीद है, जिसमें समुद्र फिर से स्वस्थ हो सके.
वह कहते हैं, “मेरे भतीजे की उम्र डेढ़ साल और मेरी भतीजी की आयु नौ महीने है. मैं उन्हें दस साल की उम्र पूरी होते ही, उनकी पहली ग़ोताख़ोरी के लिए ले जाना चाहता हूँ."
"हमने अपने जीवनकाल में समुद्र का क्षरण होते देखा है, लेकिन हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे अपने जीवनकाल में इसे बेहतर होते देखें. इसे सम्भव बनाने के लिए हम कार्रवाई करने को तैयार हैं.”
(यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.)