भारत: तटीय इलाक़ों में जलवायु सहनसक्षमता की अगुवाई करती महिलाएँ
भारत की साढ़े 7 हज़ार किलोमीटर लम्बी तटरेखा पर महिलाएँ, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित समुदायों को नए तरीक़ों से सहारा दे रही हैं. कहीं वे मैन्ग्रोव बहाल कर रही हैं, कहीं धान की खेती को अधिक टिकाऊ बना रही हैं, और कहीं समुद्र से नई आजीविका के अवसर पैदा कर रही हैं.
भारत की तटरेखा, मछली पालन और खेती पर निर्भर लाखों परिवारों को आजीविका देती है. लेकिन जलवायु परिवर्तन - अधिक शक्तिशाली चक्रवात, अनिश्चित बारिश, खारे पानी के प्रवेश और बदलते समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के ज़रिए - तटीय जीवन को और अस्थिर बना रहा है.
इसके बावजूद, तटीय गाँवों में समुदाय अनुकूलन (Adaptation) के नए रास्ते खोज रहे हैं.
भारत के तटीय समुदायों की जलवायु सहनसक्षमता बढ़ाने की पहल - Enhancing Climate Resilience of India’s Coastal Communities (ECRICC) - पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) भारत और हरित जलवायु कोष (GCF) के सहयोग से लागू की जा रही है.
इस पहल की मूल सोच है - जब समुदायों, विशेष रूप से महिलाओं, को प्रकृति की बहाली और उसके साथ मिलकर काम करने में सहयोग मिलता है, तो वे जलवायु परिवर्तन से निपटने में मज़बूत भूमिका निभा सकते हैं.
ओडिशा - अनिश्चितता के बीच खेती
ओडिशा के बालासोर ज़िले के ठाकुरभौरी गाँव में खेतीबाड़ी हमेशा मानसून के मिज़ाज पर निर्भर रही है.
धान के खेतों से घिरा और चक्रवात व बाढ़ के प्रति संवेदनशील यह गाँव, लम्बे समय से अनिश्चितता का सामना करता रहा है. किसी वर्ष भारी बारिश फ़सलों को डुबो देती थी, तो कुछ वर्ष खेत सूखे और अनुपजाऊ रह जाते थे. अधिकतर परिवारों के लिए धान की खेती आय का साधन नहीं, बल्कि जीवित रहने का आधार थी.
49 वर्षीय किसान स्वर्णलता जेना के लिए भी यह अनिश्चितता वर्षों तक जीवन का हिस्सा रही.
वह याद करती हैं, “कुछ वर्षों में हमारे पास पेट भरने के लिए भी मुश्किल से पर्याप्त धान होता था. किसी और चीज़ के लिए धन बचता ही नहीं था.”
यह स्थिति 2024 में बदलनी शुरू हुई, जब स्वर्णलता ने ECRICC के तहत समर्थित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया. वहाँ उन्हें धान गहनता प्रणाली (System of Rice Intensification - SRI) से परिचित कराया गया.
यह जलवायु-सहनसक्षम खेती की एक पद्धति है, जिससे कम पानी, कम बीज और कम रासायनिक प्रयोग के साथ अधिक उत्पादन सम्भव है.
स्वर्णलता जेना ने स्थानीय जलवायु चैम्पियन कबिता जेना के मार्गदर्शन में, उपचारित बीज क्यारियाँ तैयार करना, कम उम्र के पौधों को अधिक दूरी पर रोपना, पानी का बेहतर प्रबन्धन करना, और नीमास्त्र व ब्रह्मास्त्र जैसे जैविक कीट-नियंत्रण उपायों का उपयोग सीखना शुरू किया. उन्होंने दस-दस दिन के अन्तराल पर तीन बार यांत्रिक निराई (mechanical weeding) भी की.
कुछ ही सप्ताहों में नतीजे नज़र आने लगे.
2024–25 के ख़रीफ़ मौसम में, स्वर्णलता ने एक एकड़ भूमि पर SRI पद्धति से खेती की और 28.59 क्विंटल धान की पैदावार प्राप्त की. परम्परागत खेती से वह आमतौर पर 16-18 क्विंटल उत्पादन हासिल कर पाती थीं.
उन्होंने घर के उपयोग के लिए अनाज अलग रखने के बाद, शेष धान स्थानीय मंडी में बेचा और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 74 हज़ार 400 रुपए की रक़म जुटाई.
पहली बार धान की खेती केवल खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं रही. यह भरोसेमन्द आय का स्रोत बन गई.
स्वर्णलता की कहानी ओडिशा के तट पर जारी एक बड़े बदलाव को दर्शाती है. ECRICC के तहत बालासोर, केन्द्रपाड़ा, गंजाम और पुरी के तटीय ज़िलों में 28 हज़ार से अधिक किसान SRI और अन्य जलवायु-सहनसक्षम कृषि पद्धतियाँ अपना रहे हैं.
स्वर्णलता कहती हैं, “पहले हम धान केवल खाने के लिए उगाते थे, आय के लिए नहीं. अब मैं खेती को ऐसी आजीविका के रूप में देखती हूँ, जो मेरे परिवार को सहारा दे सकती है. SRI ने हमारा जीवन बदल दिया है. इससे हमें भोजन भी मिलता है और आय भी, और मिट्टी पहले से अधिक स्वस्थ लगती है.”
महाराष्ट्र - तट की बहाली
मुम्बई से लगभग 30 किलोमीटर दूर, गव्हाण गाँव के पीछे मैन्ग्रोव की जड़ें ज्वार के दबाव के बीच गीली मिट्टी को थामे रहती हैं.
मनीषा घरत के लिए ये कभी केवल पेड़ नहीं रहे. 24 वर्ष पहले शादी के बाद जब वह इस गाँव में आईं, तब मैन्ग्रोव महाराष्ट्र के पारम्परिक तटीय समुदायों - आगरी और कोली के दैनिक जीवन का हिस्सा थे. इन समुदायों के घर, खेत और भोजन इस तट से गहराई से जुड़े रहे हैं.
वह याद करती हैं, “मैन्ग्रोव मेरे दैनिक जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा थे. उन्हें गाँव का रक्षक कहा जाता था, क्योंकि वे लहरों और तूफ़ानों से बचाते थे, और धान के खेतों को खारे पानी के प्रवेश से भी सुरक्षित रखते थे. हम अक्सर भोजन के लिए केकड़े और सीप खोजने के लिए तट पर जाते थे.”
स्थानीय स्तर पर मनीषा ताई के नाम से जानी जाने वाली मनीषा, एक सामुदायिक आयोजक और स्थानीय उद्यमी हैं. उन्होंने ECRICC परियोजना के तहत गव्हाण की मैन्ग्रोव सह-प्रबन्धन समिति (MCMC) की अध्यक्ष के रूप में नई नेतृत्व भूमिका सम्भाली.
ये समितियाँ समुदाय के सदस्यों और वन विभाग को एक मंच पर लाती हैं, ताकि मैन्ग्रोव का संरक्षण और बहाली मज़बूत की जा सके. साथ ही, स्थानीय लोगों को केकड़ा पालन और मछली से जुड़े मूल्य-वर्धित उत्पादों जैसी जलवायु-सहनसक्षम आजीविकाएँ अपनाने में मदद मिलती है.
मुम्बई मैन्ग्रोव सेल के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक और महाराष्ट्र में ECRICC के परियोजना निदेशक डॉक्टर रविकिरण गोवेकर कहते हैं कि मैन्ग्रोव सह-प्रबन्धन समितियाँ समुदाय और वन विभाग को साथ लाकर तटीय क्षेत्रों में पारिस्थितिकी-आधारित अनुकूलन को आगे बढ़ाती हैं. उनके अनुसार, तटीय समुदायों की आजीविका मैन्ग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी रही है, इसलिए संरक्षण में समुदाय-आधारित प्रबन्धन ज़रूरी है.
केवल गव्हाण में 14 आजीविका इकाइयाँ स्थापित की गई हैं. नई आजीविका गतिविधियाँ अपनाने वाले 104 निवासियों में से 76 महिलाएँ हैं. महाराष्ट्र के चार तटीय ज़िलों में 131 मैन्ग्रोव सह-प्रबन्धन समितियाँ बनाई गई हैं, जो 558 आजीविका इकाइयों को समर्थन दे रही हैं.
मनीषा कहती हैं, “मैन्ग्रोव सह-प्रबन्धन समिति एक मज़बूत सामुदायिक संस्था है, जहाँ पुरुष और महिलाएँ मिलकर काम करते हैं. इसके सदस्यों की लगन मुझे प्रेरित करती है. मैं ऐसे और प्रयासों का नेतृत्व करना चाहती हूँ, जो समुदायों को सशक्त बनाएँ और मैन्ग्रोव संरक्षण को मज़बूत करें.”
आंध्र प्रदेश - जब समुद्र बना खेत
आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले के तटीय गाँव बुडागतलापालेम में रमालक्ष्मी का जीवन वर्षों तक समुद्री मछली बेचने और सूखी मछली तैयार करने पर निर्भर रहा.
उनकी आय मछली पकड़ की अनिश्चितता, मौसमी माँग और समुद्र की बदलती परिस्थितियों पर टिकी थी. उन्होंने 19 वर्ष की उम्र में शादी के बाद, चार सदस्यों वाले परिवार की ज़िम्मेदारी निभाते हुए, लगातार मेहनत की, मगर आय में स्थिरता नहीं आ पाई.
यह स्थिति 2025 में तब बदली, जब ECRICC परियोजना ने मत्स्य विभाग के सहयोग और केन्द्रीय समुद्री मत्स्य अनुसन्धान संस्थान (CMFRI) के तकनीकी समर्थन से गाँव में समुद्री शैवाल की खेती शुरू की. इसे जलवायु-सहनसक्षम आजीविका विकल्प के रूप में पेश किया गया.
रमालक्ष्मी आगे आने वाली पहली महिलाओं में से एक थीं. उन्होंने समुद्री पारिस्थितिकी और बेड़ा निर्माण पर प्रशिक्षण लिया. इसके बाद अपने पति और स्व-सहायता समूह (SHG) की अन्य सदस्यों की मदद से समुद्र में 10 बेड़े लगाए.
45 दिन बाद पहली फ़सल तैयार हुई.
रमालक्ष्मी कहती हैं, “केवल 45 दिनों में पहली फ़सल तैयार हो गई, और इसने सब कुछ बदल दिया. मैंने अन्य लोगों को भी जुड़ने के लिए प्रेरित किया. इस तरह एक व्यक्तिगत पहल, समुदाय-नेतृत्व वाले तटीय उद्यम में बदल गई.”
उनके समूह ने शुरुआती सफलता के बाद, हरित जलवायु कोष और प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) के वित्तीय सहयोग से बेड़ों की संख्या 10 से बढ़ाकर 50 कर दी.
यह पहल अब उत्पादन बढ़ाने के लिए बाज़ार सम्पर्क, ब्रैंडिंग और पैकेजिंग की सम्भावनाएँ तलाश रही है.
मत्स्य विकास अधिकारी के रवि कुमार कहते हैं कि रमालक्ष्मी की यात्रा दिखाती है कि वैज्ञानिक ज्ञान और सामुदायिक कार्रवाई मिलकर तटीय सहनसक्षमता का ऐसा मॉडल बना सकते हैं, जो महिलाओं को उद्यमी बनने में सक्षम करे.
ओडिशा के धान के खेतों से लेकर महाराष्ट्र के मैन्ग्रोव वनों और आंध्र प्रदेश के समुद्री शैवाल बेड़ों तक, ये कहानियाँ दिखाती हैं कि जलवायु सहनसक्षमता महिलाओं के नेतृत्व, स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक कार्रवाई से भी बनती है.
यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.