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दिल्ली के सम्पुष्टि सामुदायिक शिक्षण केन्द्र में युवा सोमाली शरणार्थी नए कौशल सीख रहे हैं

भारत: सोमाली शरणार्थी बच्चों का सहारा बना दिल्ली का एक शिक्षण केन्द्र

© UNHCR/Paridhi Jain दिल्ली के सम्पुष्टि सामुदायिक शिक्षण केन्द्र में युवा सोमाली शरणार्थी नए कौशल सीख रहे हैं.

भारत: सोमाली शरणार्थी बच्चों का सहारा बना दिल्ली का एक शिक्षण केन्द्र

प्रवासी और शरणार्थी

दिल्ली के सम्पुष्टि सामुदायिक शिक्षण केन्द्र मेंशरणार्थी बच्चे और युवजन, अंग्रेज़ीकला और डिजिटल कौशल सीख रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के सहयोग से संचालित यह सुरक्षित एवं समावेशी जगह, उन्हें शिक्षा प्राप्ति में मदद देने के साथ-साथ आत्मविश्वासउद्देश्य और एक-दूसरे का साथ देने की भावना भी विकसित कर रही है.  

भारत की राजधानी नई दिल्ली की एक संकरी गली में, दोपहर ढलते ही एक छोटा-सा शिक्षण केन्द्र बच्चों और युवाओं की आवाज़ों से भरने लगता है. शुरुआत में ये आवाज़ें धीमी और झिझक भरी होती हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनमें आत्मविश्वास झलकने लगता है.

कुछ युवा सोमाली लड़कियाँ और एक लड़का साथ बैठकर अंग्रेज़ी शिक्षा के छोटे वीडियो देख रहे हैं. वे वीडियो को रोकते हैं, शब्द दोहराते हैं और फिर से कोशिश करते हैं. कोई शब्द ग़लत बोलने पर सभी बरबस हँसने लगते हैं, लेकिन फिर उसे सही तरह से दोहराने की कोशिश में लग जाते है. वे एक-दूसरे की मदद करते हैं, धीरे से सुधारते हैं और हर वाक्य के साथ उनका आत्मविश्वास बढ़ता है.

पास ही छोटे बच्चे, मेज़ों पर रंग-बिरंगे काग़ज़ लेकर बैठे हैं. वे सावधानी से काग़ज़ मोड़कर कमल के फूल बना रहे हैं. कुछ बच्चे अपना काम दूसरों से मिलाकर देखते हैं, जबकि कुछ चुपचाप हर मोड़ सही करने में लगे हैं.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के सहयोग से चल रही समुदाय-नेतृत्व वाली पहल, सम्पुष्टि सामुदायिक शिक्षण केन्द्र में बच्चे विभिन्न शिक्षण गतिविधियों में भाग लेते हैं.
© UNHCR/Paridhi Jain संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के सहयोग से चल रही समुदाय-नेतृत्व वाली पहल, सम्पुष्टि सामुदायिक शिक्षण केन्द्र में बच्चे विभिन्न शिक्षण गतिविधियों में भाग लेते हैं.

पास ही एक कमरे में, कुछ युवजन कम्प्यूटरों के सामने बैठे हैं. एक युवा शिक्षक उन्हें समझा रहे हैं कि जानकारी को किस तरह व्यवस्थित किया जाए और उसे साफ़ तरीक़े से कैसे प्रस्तुत किया जाए. इनमें से कई बच्चों और युवाओं के लिए यह पहली बार है, जब वे डिजिटल कौशल को नियमित और व्यवस्थित रूप से सीख रहे हैं.

यह है सम्पुष्टि सामुदायिक शिक्षण केन्द्र - राष्ट्रीय बहाई धर्मार्थ सोसायटी के तत्वावधान में शुरू की गई एक शैक्षिक पहल. इसे शरणार्थी परिवारों, विशेषकर सोमाली समुदाय, के साथ परामर्श के बाद विकसित किया गया है.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के सहयोग से यह पहल, सोमाली शरणार्थी और स्थानीय समुदायों के बच्चों व युवाओं को साझा सीखने के अनुभवों के ज़रिए साथ लाती है.

सम्पुष्टि का उद्देश्य केवल शिक्षा में मदद देना नहीं है. यह बच्चों और युवाओं को एक सुरक्षित व समावेशी स्थान देता है, जहाँ वे आत्मविश्वास बढ़ा सकें, नए कौशल सीख सकें और अपनेपन की भावना महसूस कर सकें.

युवा क्लब के सदस्य प्रश्नावली-आधारित गतिविधियों के ज़रिए अंग्रेज़ी कौशल सीखते हैं.
© UNHCR/Paridhi Jain युवा क्लब के सदस्य प्रश्नावली-आधारित गतिविधियों के ज़रिए अंग्रेज़ी कौशल सीखते हैं.

साथ मिलकर सीखना

विद्यार्थी हर दोपहर, अपनी उम्र के अनुसार अलग-अलग समूहों में इकट्ठा होते हैं. अंग्रेज़ी की कक्षाएँ और किशोर-युवा सशक्तिकरण सत्र अक्सर सबसे ज़्यादा जीवन्त होते हैं.

यहाँ विद्यार्थी बोलना, पढ़ना और लिखना सीखते हैं. साथ ही वे अपने विचार व्यक्त करना, दूसरों के साथ मिलकर काम करना और ऐसा सकारात्मक समूह बनाना भी सीखते हैं, जो आगे चलकर समुदाय की सेवा कर सके.

एक सोमाली शरणार्थी विद्यार्थी हिबो (पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिया गया है) के लिए यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण रहा है.

वह कहती हैं, “मैं समाज में बोलना और अपने विचार व्यक्त करना सीख रही हूँ.” उनके अनुसार, ये कक्षाएँ धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ा रही हैं.

कला कक्षाएँ छोटे बच्चों को सीखने और अपने मन की बात व्यक्त करने का अवसर देती हैं. वह काग़ज़ के फूल बनाने जैसी सरल गतिविधियों के ज़रिए धैर्य, रचनात्मकता और एकाग्रता सीखते हैं. ये सत्र बच्चों को कला के माध्यम से अपनी भावनाएँ और असुरक्षाएँ व्यक्त करने की जगह भी देते हैं.

निम्को इसी केन्द्र में ख़ुद भी विद्यार्थी हैं और छोटे बच्चों को अंग्रेज़ी सीखने में मदद करती हैं.
© UNHCR/Paridhi Jain निम्को इसी केन्द्र में ख़ुद भी विद्यार्थी हैं और छोटे बच्चों को अंग्रेज़ी सीखने में मदद करती हैं.

विद्यार्थी से शिक्षक तक

कुछ युवाओं के लिए, सम्पुष्टि केवल सीखने की जगह नहीं रही, बल्कि नेतृत्व करने का अवसर भी बन गई है.

निम्को, एक सोमाली शरणार्थी हैं, (पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिया गया है), जो पहले इस केन्द्र में विद्यार्थी के रूप में आई थीं. अब वह शिक्षण टीम का हिस्सा हैं. वह छोटे बच्चों की मदद करती हैं और साथ-साथ ख़ुद भी सीख रही हैं.

वह कहती हैं, “यहाँ पढ़ाने से मुझे आत्मविश्वास मिलता है. मैं सीखते रहना चाहती हूँ और सीखने में दूसरों की भी मदद करना चाहती हूँ.”

फ़रीद, एक अफ़ग़ान शरणार्थी और ग्राफ़िक डिज़ाइन के विद्यार्थी, अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए कम्प्यूटर कौशल सिखाते हैं.
© UNHCR/Paridhi Jain फ़रीद, एक अफ़ग़ान शरणार्थी और ग्राफ़िक डिज़ाइन के विद्यार्थी, अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए कम्प्यूटर कौशल सिखाते हैं.

एक दूसरे कमरे में, एक युवा अफ़ग़ान शरणार्थी शिक्षक फ़रीद, (पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिया गया है) कम्प्यूटर कक्षाएँ चलाते हैं. वह ग्राफ़िक डिज़ाइन के विद्यार्थी हैं और आर्थिक व अन्य चुनौतियों के बीच, सप्ताह में तीन दिन दूसरों को पढ़ाते हैं.

वह कहते हैं, “मैं समुदाय में योगदान देने के लिए जुड़ा. इससे मुझे उद्देश्य की भावना मिलती है. मैं अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहता हूँ और बेहतर भविष्य बनाना चाहता हूँ.”

जैसे-जैसे कक्षाएँ आगे बढ़ती हैं, निमको छोटे विद्यार्थियों को अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए दूसरे कमरे में चली जाती हैं. उनकी यात्रा इस पहल के भीतर एक बड़े बदलाव को दिखाती है: विद्यार्थी अब शिक्षक बन रहे हैं, और सहयोग समुदाय के भीतर से ही आने लगा है.

निमको कहती हैं, “यह मेरे लिए अच्छा है. मैं अपने परिवार की मदद कर सकती हूँ और पढ़ाई भी कर सकती हूँ. भविष्य में मैं फ़ैशन डिज़ाइनर बनना चाहती हूँ.”

युवा क्लब के एक सत्र में विद्यार्थी अंग्रेज़ी सीखने वाले वीडियो से वाक्य दोहराते हैं और उच्चारण सुधारने में एक-दूसरे की मदद करते हैं.
© UNHCR/Paridhi Jain युवा क्लब के एक सत्र में विद्यार्थी अंग्रेज़ी सीखने वाले वीडियो से वाक्य दोहराते हैं और उच्चारण सुधारने में एक-दूसरे की मदद करते हैं.

अपना भविष्य ख़ुद गढ़ता समुदाय

आज यह केन्द्र 40 से अधिक नियमित विद्यार्थियों को सहयोग दे रहा है. वे भाषा और तकनीक के बुनियादी कौशल सीखने के साथ-साथ, अपने भविष्य को लेकर आत्मविश्वास भी बढ़ा रहे हैं.

सम्पुष्टि में शरणार्थी केवल सहायता प्राप्त नहीं करते, बल्कि केन्द्र के काम में सक्रिय भूमिका भी निभाते हैं. युवा ज़िम्मेदारी सम्भाल रहे हैं और अन्य को सीखने में मदद कर रहे हैं.

UNHCR के समर्थन से, ऐसी पहलें दिखाती हैं कि समुदाय-नेतृत्व वाले प्रयास शिक्षा, समावेशन और सहनसक्षमता को मज़बूत कर सकते हैं.

सम्पुष्टि सामुदायिक शिक्षण केन्द्र में युवा कम्प्यूटर कक्षाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं.
© UNHCR/Paridhi Jain सम्पुष्टि सामुदायिक शिक्षण केन्द्र में युवा कम्प्यूटर कक्षाओं में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं.

दिन ढलने पर कक्षाएँ ख़ाली होने लगती हैं. कॉपियाँ बैग में रखी जाती हैं, कम्प्यूटर बन्द होते हैं, और बच्चे काग़ज़ के फूल सावधानी से अपने साथ घर ले जाते हैं.

पीछे रह जाती है आगे बढ़ने की एक भावना - सीखने की, उद्देश्य की, और अपने भविष्य को ख़ुद आकार देते समुदाय की.

मानवता की एकता के सिद्धान्त से प्रेरित सम्पुष्टि, यह सन्देश देती है कि अजनबी को पूर्वाग्रह के बिना साथी के रूप में देखा जाना चाहिए. यह भारत की वैदिक परम्परा “वसुधैव कुटुम्बकम्” - यानि ‘पूरा विश्व एक परिवार है’ की भावना को भी दर्शाती है, और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता के सिद्धान्त से मेल खाती है.

ये मूल्य, दिल्ली के इस छोटे-से शिक्षण केन्द्र में, समावेशन, गरिमा और समुदाय-नेतृत्व वाले बदलाव के रूप में व्यवहार में दिखाई देते हैं.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.