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राजस्थान के आदोल गाँव में अपने स्कूल के बाहर पानी पीती, सारा.

‘मैं भारत में रहता हूँ, जहाँ 45°C तापमान अब आम बात है, कल ये सबकी वास्तविकता हो सकती है’

© UNICEF/Vineeta Misra राजस्थान के आदोल गाँव में अपने स्कूल के बाहर पानी पीती एक छात्रा.

‘मैं भारत में रहता हूँ, जहाँ 45°C तापमान अब आम बात है, कल ये सबकी वास्तविकता हो सकती है’

जलवायु और पर्यावरण

भारत के चेन्नई शहर के स्कूलों से लेकर दुनिया के बड़े महानगरों तक, भीषण गर्मी अब लोगों की सेहत, पढ़ाई, कामकाज और दैनिक जीवन को गम्भीर रूप से प्रभावित कर रही है. भारत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के प्रमुख बालकृष्ण पिसुपति का कहना है कि अगर शहरों ने समय रहते टिकाऊ शीतलन उपाय नहीं अपनाए, तो भीषण गर्मी से दुनिया भर के कई शहर रहने योग्य नहीं रह जाएँगे.

भारत के चेन्नई शहर के कई स्कूल दोपहर तक, भीषण गर्मी से तपने लगते हैं. बाहर का तापमान अक्सर 40°C डिग्री तक पहुँच जाता है, और छत पर लगे पंखे भी बच्चों को राहत नहीं दे पाते. छात्र मेज़ों पर सिर टिकाकर निढाल बैठ जाते हैं, पानी की बोतलें पकड़े रहते हैं, और पढ़ाई पर ध्यान देना मुश्किल हो जाता है.

चेन्नई के ये विद्यार्थी दुनिया भर के उन करोड़ों लोगों में शामिल हैं, जिनका जीवन भीषण गर्मी से प्रभावित हो रहा है. बैंकॉक से पेरिस और न्यूयॉर्क तक, तेज़ गर्मी कामकाज को धीमा कर रही है, बीमारियाँ बढ़ा रही है और लोगों की जान ले रही है.

UNEP इंडिया के कंट्री हेड डॉ. बालकृष्ण पिसुपति को एक कार्यालय में साक्षात्कार के दौरान चित्रित किया गया है, जिसकी पृष्ठभूमि में भारतीय ध्वज दिखाई दे रहा है।
© UN India/Rohit Karan भारत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के प्रमुख डॉक्टर बालकृष्ण पिसुपति.

शहरी नियोजन की चुनौती

बढ़ता तापमान दुनिया के शहरों के लिए एक बड़ी चेतावनी है. अगर शहरों ने गर्मी कम करने के ठोस उपाय नहीं किए, तो इनमें से कुछ शहर जल्दी ही रहने योग्य नहीं रहेंगे.

भीषण गर्मी बढ़ने के दो मुख्य कारण हैं. पहला, इनसानी गतिविधियों से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है, जिससे पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है. तापमान पहले ही 1.5°C तक बढ़ चुका है और यह वृद्धि जारी है.

इसी जलवायु परिवर्तन के कारण तापलहरें पहले से अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं. इसका उदाहरण हाल में भारत में हुई रिकॉर्ड तोड़ गर्मी है, जब कई शहरों में तापमान 45°C से ऊपर पहुँच गया.

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शहरों की बनावट भी गर्मी को और बढ़ा रही है. पास-पास बनी इमारतें, कंक्रीट व पक्की सड़कें दिन भर सूरज की गर्मी सोख़ती हैं और फिर उसे धीरे-धीरे छोड़ती रहती हैं. इसे शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव कहा जाता है. कुछ मामलों में, इसके कारण शहर आसपास के ग्रामीण इलाक़ों से 5°C से 10°C तक अधिक गर्म हो सकते हैं.

यह गर्मी हर जगह महसूस होती है. शाम को सड़कें तपती रहती हैं. सूर्यास्त के बाद भी छोटे और तंग घरों में गर्मी बनी रहती है. बसों, बाज़ारों और दुकानों में भी लोगों को राहत नहीं मिलती, और बचने की जगह कम पड़ जाती है.

असमान असर

भीषण गर्मी सभी को प्रभावित करती है, लेकिन इसका सबसे ज़्यादा असर ग़रीब और कमज़ोर समुदायों पर पड़ता है.

झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले परिवार दिन-रात तपती गर्मी झेलते हैं. बाहर काम करने वाले मज़दूर लू लगने का जोखिम उठाते हैं, क्योंकि उनके लिए काम छोड़ना विकल्प ही नहीं होता. थकान और शरीर में पानी की कमी से जूझते स्कूली बच्चे पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पाते.

इन समस्याओं का आसान समाधान वातानुकूलन लग सकता है.

लेकिन यह पूरा समाधान नहीं है.

वातानुकूलन यंत्र महंगे होते हैं और बहुत से लोगों की आर्थिक पहुँच से बाहर हैं. वे भारी मात्रा में बिजली भी इस्तेमाल करते हैं - जिसका ज़्यादातर हिस्सा अब भी जीवाश्म ईंधनों से आता है - और इस तरह उसी जलवायु संकट को और बढ़ाते हैं, जिसके कारण भीषण गर्मी बढ़ रही है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का अनुमान है कि शीतलन उपकरण, वर्ष 2050 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 10 प्रतिशत तक के लिए ज़िम्मेदार हो सकते हैं.

ऐसे में सवाल यह है - अगर वातानुकूलन ही पूरा समाधान नहीं है, तो शहर क्या कर सकते हैं? लम्बी अवधि में बढ़ते तापमान से निपटने के लिए शहर मुख्य रूप से तीन बड़े क़दम उठा सकते हैं.

तीन उपाय

पहला, नगर प्रशासन भवन नियमों में निष्क्रिय शीतलन उपायों को शामिल कर सकता है. ये सरल उपाय होते हैं, जैसेकि छाया के लिए पेड़ लगाना या धूप को परावर्तित करने के लिए छतों को सफ़ेद रंगना. ऐसे उपाय इमारतों के भीतर का तापमान 8°C तक कम कर सकते हैं. इससे पसीने और बेचैनी भरी रातें, आरामदेह बन सकती हैं.

दूसरा, शहर अपनी सार्वजनिक इमारतों में कुछ उपाय अपनाकर उदाहरण पेश कर सकते हैं. इनमें निष्क्रिय शीतलन तकनीकों का उपयोग, पंखे लगाना, और ज़रूरत पड़ने पर ऊर्जा-कुशल वातानुकूलन यंत्रों का इस्तेमाल शामिल है. सार्वजनिक ख़रीद से जुड़ी ऐसी नीतियाँ बड़े बदलाव का आधार बन सकती हैं.

भारत के चेन्नई शहर में एक गुंबददार औपनिवेशिक शैली की इमारत के सामने सड़क को हरे रंग की छायादार चंदवा से ढका गया है, जिसके नीचे से एक ऑटो रिक्शा गुजर रहा है।
© UNEP India पैसिव कूलिंग समाधानों में गर्मी प्रतिबिंबित करने वाली छतों से लेकर ठंडे फ़ुटपाथ और छाया प्रदान करने वाले वृक्ष आवरण शामिल हैं.

तीसरा, शहर पुरानी स्थापत्य शैलियों और पारम्परिक निर्माण सामग्री से भी सीख सकते हैं. ये तरीक़े अक्सर आज की काँच और कंक्रीट से बनी बड़ी इमारतों की तुलना में गर्मी कम करने में अधिक कारगर होते हैं.

वातानुकूलन यंत्रों के आने से बहुत पहले, भारत में घरों को इस तरह बनाया जाता था कि वे प्राकृतिक रूप से ठंडे रह सकें. मिट्टी की दीवारें, छायादार आँगन, चूने का पलस्तर व ऊँची छतें, हवा के बेहतर प्रवाह में मदद करती थीं और गर्मी को कम सोख़ती थीं.

ये तकनीकें पीढ़ियों के अनुभव और स्थानीय जलवायु के अनुसार विकसित हुई थीं. मगर समय के साथ इनमें से कई तरीक़े छोड़ दिए गए, और उनकी जगह कंक्रीट पर आधारित निर्माण ने ले ली. ऐसे निर्माण अक्सर भीषण गर्मी में राहत देने में कमज़ोर साबित होते हैं.

भारत के तमिलनाडु में लड़कियों के लिए जलवायु-सहनसक्षम कक्षाएँ.
© UNEP भारत के तमिलनाडु में लड़कियों के लिए जलवायु-सहनसक्षम कक्षाएँ.

बदलाव की मिसाल

कुछ स्थानों पर हालात बदल रहे हैं. उदाहरण के लिए, चेन्नई में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) कम आय वाले इलाक़ों के स्कूलों में निष्क्रिय शीतलन उपाय अपनाने में मदद कर रहा है. इससे स्कूलों के भीतर तापमान 3°C तक कम हुआ है और 1 लाख 50 हज़ार विद्यार्थियों को लाभ मिलने की सम्भावना है. 

यह परियोजना भले ही छोटी हो, लेकिन यह दिखाती है कि बदलाव सम्भव है. उम्मीद है कि दुनिया भर के सरकारी अधिकारी इस सीख को गम्भीरता से लेंगे.

चेन्नई में चल रहा यह काम, यूनेप की एक व्यापक वैश्विक पहल का हिस्सा है, जिसमें 50@50 पहल भी शामिल है. इसका उद्देश्य शहरों को भीषण गर्मी से निपटने की बेहतर तैयारी में मदद देना है - ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करके और टिकाऊ, लोगों को केन्द्र में रखने वाले शीतलन समाधानों को बढ़ावा देकर.

भीषण गर्मी पहले ही अनेक स्थानों पर दैनिक जीवन को बदल रही है. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ने के साथ, हमारे शहर और अधिक गर्म होते जाएँगे. लेकिन तपते दिनों और दमघोंटू रातों वाले भविष्य को अपनी नियति मान लेने की ज़रूरत नहीं है. 

समझदारी और नए उपायों के साथ, हम अपने शहरों को आने वाले वर्षों में भी जीवन्त एवं रहने योग्य बनाए रख सकते हैं.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.