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बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना काफ़ी नहीं, सुरक्षित ढाँचा ज़रूरी

चार युवा वयस्कों को एक जीवंत गुलाबी सोफे पर बैठा जाता है, जो उनके स्मार्टफोन में विकसित होता है। दृश्य डिजिटल प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया के साथ युवा सगाई को उजागर करता है, जो इंटरनेट सुरक्षा, साइबरबुलिंग रोकथाम और डिजिटल नागरिकता के विषयों को दर्शाता है।.
© UNICEF नॉर्थ मैसेडॉनिया में युवा बच्चे अपने फ़ोन पर सोशल मीडिया देख रहे हैं.

बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना काफ़ी नहीं, सुरक्षित ढाँचा ज़रूरी

मानवाधिकार

बच्चों को सीखने-सिखाने, समुदायों और सृजनशीलता से जोड़ने वाली डिजिटल दुनिया, उनकी सुरक्षा, निजता व कल्याण के लिए जोखिम की भी वजह भी बन सकती है. इसके मद्देनज़र, यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त ने देशों की सरकारों और टैक्नॉलॉजी कम्पनियों से ऑनलाइन माध्यमों के डिज़ाइन यानि ढाँचे को बेहतर बनाने और बच्चों की सुरक्षा के लिए लिए ठोस क़दम उठाने का आग्रह किया है.

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने एक 10-सूत्री ढाँचा प्रस्तुत करते हुए कहा है कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया माध्यमों पर पाबन्दी लगा देना, इन मंचों को सुरक्षित बनाने का स्थान नहीं ले सकता है. 

मानवाधिकार मामलों के प्रमुख के अनुसार, डिजिटल जगत में बच्चे, निजी तौर पर अनेक दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं. उन्हें ऑनलाइन बने रहने की लत लग रही है, उनकी निजता का हनन हो रहा है. ऐसा नहीं है कि इस स्थिति को टाला नहीं जा सकता हो, लेकिन यह स्थिति, कम्पनियों द्वारा कमर्शियल हितों के लिए सोच-समझकर उठाए गए क़दमों का नतीजा है. 

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जिस तरह से ऑनलाइन मंचों को बनाया जाता है, वह बच्चों को लगातार स्क्रीन पर सामग्री देखने, स्वतः चलने वाले वीडियो देखने और लगातार सन्देश पाने के लिए बांधे रखता है.

मानवाधिकार कार्यालय ने बच्चों के लिए ऑनलाइन सुरक्षा पर यह मार्गदर्शिका एक ऐसे समय में जारी की है जब सोशल मीडिया मंचों पर आयु-आधारित पाबन्दियाँ विश्व के अनेक हिस्सों में अपनाई जा रही हैं. 

दिसम्बर 2025 में, ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पाबन्दी लगा दी थी, जिसके बाद इंडोनेशिया और मलेशिया में भी ऐसी ही पाबन्दियाँ लगाईं. इसके बाद, 12 से अधिक देश इसी तरह के क़दमों पर विचार कर रहे हैं.  

उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने सचेत किया कि इस तरह की पाबन्दियों को बेअसर बनाने का रास्ता आसानी से निकाला जा सकता है. इस वजह से, बच्चों के ऐसी दिशा में आगे बढ़ने का जोखिम पैदा होता है, जहाँ कोई निगरानी व्यवस्था ही न हो. 

“सोशल मीडिया मंचों तक पहुँच को ही सीमित कर देना, जिससे वह असुरक्षित बने रहें, यह कोई अन्तिम बिन्दु नहीं हो सकता है.”

प्रौद्योगिकी कम्पनियों से आग्रह

OHCHR में विशेष प्रक्रियाओं के लिए निदेशक पैगी हिक्स ने जिनीवा में बताया कि टैक कम्पनियों को अब एक स्पष्ट चयन करना है.

“सोशल मीडिया मंचों को जिस तरह से बनाया व संचालित किया जाता है उसमें बदलाव कीजिए, बेहतर ढंग से बच्चों के अधिकारों व सुरक्षा के लिए.” या फिर आपको सख़्त क़ानूनों व नियामन सम्बन्धी जुर्माने के तहत ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

इन दिशानिर्देशों में मंचों के ताने-बाने को बुनते समय ही सुरक्षा उपायों पर ध्यान देने की बात कही गई है, बजाय इसके कि जोखिमों से निपटने की ज़िम्मेदारी अभिभावकों और बच्चों पर छोड़ी जाए.

इसके साथ-साथ, बाल अधिकारों पर होने वाले असर की समीक्षा करने, आयु सत्यापन प्रक्रिया को सख़्ती से लागू करने, और बच्चों के साथ भी विचार-विमर्श करने की सिफ़ारिश की गई है, जिसे नियामन प्रक्रिया के दौरान अपनाया जाना होगा.

OHCHR के अनुसार, डिजिटल जगत में तेज़ी से बदलाव आ रहे हैं, कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) और अन्य टैक्नॉलॉजी तेज़ी से उभर रही हैं और इस वजह से स्फूर्त, तथ्य-आधारित नीतिनिर्माण आवश्यक हो गया है.