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‘चाडो’, यानी जापानी चाय पद्धति के प्रदर्शन में अतिथियों को सदियों पुरानी जापानी चाय परम्परा के दर्शन, रीति-रिवाज़ों, बर्तनों और शिष्टाचार से परिचित कराया गया.

अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस: भारतीय चाय और जापानी माचा ने जोड़े संस्कृति व सम्मान के रंग

© FAO India ‘चाडो’, यानी जापानी चाय पद्धति के प्रदर्शन में अतिथियों को सदियों पुरानी जापानी चाय परम्परा के दर्शन, रीति-रिवाज़ों, बर्तनों और शिष्टाचार से परिचित कराया गया.

अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस: भारतीय चाय और जापानी माचा ने जोड़े संस्कृति व सम्मान के रंग

संस्कृति और शिक्षा

'अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस' के अवसर पर, नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में आयोजित भारत-जापान साँस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम में कहानियोंचाय का स्वाद चखने और जापानी चाय परम्परा चाडो’ के ज़रिए यह दर्शाया गया कि चाय केवल एक पेय भर नहीं हैबल्कि संस्कृतिआजीविका एवं मानवीय जुड़ाव का सेतु भी है.

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 'अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस' हर वर्ष 21 मई को मनाया जाता है, जिसके एक दिन बाद आयोजित इस कार्यक्रम में भारत, जापान और श्रीलंका की चाय परम्पराओं को संस्कृति, कृषि एवं मित्रता के साझा उत्सव के रूप में प्रस्तुत किया गया.

एक बार एक पत्रकार ने भारत और भूटान के लिए जापान के राजदूत ओनो केइची से पूछा कि उन्हें भारतीय चाय ज़्यादा पसन्द है या जापानी चाय. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि उन्हें पता था, इस सवाल का “कूटनैतिक जवाब” देना होगा. लेकिन यह सवाल उनके मन में रह गया.

राजदूत ओनो ने नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि स्वाद एवं परम्परा में अलग होने के बावजूद, भारतीय चाय और जापानी चाय अपनी-अपनी संस्कृतियों की गहरी झलक देती हैं.

उन्होंने कहा, “भारतीय चाय का अपना समृद्ध और प्रभावशाली चरित्र है. इसमें चाय, दूध, चीनी और कई मसाले मिलते हैं, और हर एक की अपनी अलग पहचान होती है. इस अर्थ में, यह भारत की विविधता को दर्शाती है: अनेक भाषाएँ, अनेक धर्म, अनेक परम्पराएँ और अनेक संस्कृतियाँ, जो मिलकर कुछ असाधारण बनाती हैं.”

उन्होंने कहा, इसके विपरीत, जापानी चाय “सूक्ष्म और सरल” है, जहाँ चाय समारोह की हर गतिविधि सदियों में इस तरह निखारी गई है कि “केवल आवश्यक तत्व ही शेष रह जाते हैं.” फिर भी, अलग-अलग स्वादों और परम्पराओं के पीछे, दोनों में एक साझा भावना है.

राजदूत ओनो ने कहा, “चाय केवल एक पेय नहीं है. यह स्वागत का भाव है. यह ईमानदारी, आतिथ्य और सम्मान की अभिव्यक्ति है.”

नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस के अवसर पर भारत-जापान साँस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहाँ अतिथियों को माचा चाय के साथ पारम्परिक जापानी मिठाइयाँ परोसी गईं.
© UN News/Anshu Sharma नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस के अवसर पर भारत-जापान साँस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहाँ अतिथियों को माचा चाय के साथ पारम्परिक जापानी मिठाइयाँ परोसी गईं.

ठहराव व जुड़ाव की रस्म

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने इस कार्यक्रम का आयोजन, भारतीय चाय बोर्ड, जापानी एसोसिएशन ऑफ़ दिल्ली के 'टी सेरेमनी क्लब', जापान फ़ाउंडेशन और जापान अन्तरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) के सहयोग से किया.

कार्यक्रम के केन्द्र में ‘चाडो’, यानी जापानी चाय पद्धति, का प्रदर्शन था. अतिथियों को सदियों पुरानी जापानी चाय परम्परा के दर्शन, रीति-रिवाज़ों, बर्तनों और शिष्टाचार से परिचित कराया गया. इसके बाद उन्हें माचा चाय और पारम्परिक जापानी मिठाइयाँ परोसी गईं.

राजदूत ओनो के अनुसार, चाडो केवल चाय बनाने या पीने की प्रक्रिया नहीं है. यह “जीवन जीने के तरीक़े की एक गहरी अभिव्यक्ति” है, जो चार मूल्यों पर आधारित है: “सद्भाव, सम्मान, शुद्धता और शान्ति.”

उन्होंने कहा कि ये मूल्य भारत में भी दिखाई देते हैं, जहाँ चाय रोज़मर्रा के जीवन का अभिन्न हिस्सा है.

“मैंने भारत आने के बाद से महसूस किया है कि यहाँ लोगों के दैनिक जीवन में चाय कितनी गहराई से जुड़ी हुई है. उच्च-स्तरीय बैठकों से लेकर सड़क किनारे छोटी चाय की दुकानों तक, औपचारिक आयोजनों से लेकर दोस्तों के साथ मसाला चाय तक, भारत में चाय पिए बिना एक दिन बिताना मुश्किल है. चाय पीते हुए लोग भारत के दृश्य का लगभग हिस्सा हैं.”

विश्व चाय दिवस के अवसर पर, नई दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र भवन में, असम, कांगड़ा, नीलगिरि और दार्जिलिंग की भारतीय चाय क़िस्मों का प्रदर्शन.
© UN News/Anshu Sharma विश्व चाय दिवस के अवसर पर, नई दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र भवन में, असम, कांगड़ा, नीलगिरि और दार्जिलिंग की भारतीय चाय क़िस्मों का प्रदर्शन.

केवल एक पेय नहीं

भारत में एफ़एओ के प्रतिनिधि ताकायुकी हागिवारा के लिए, अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस उन कृषक समुदायों, आदिवासी समुदायों, कामगारों और युवजन को मान्यता देने का अवसर था, जिनका “ज्ञान, समर्पण और श्रम इस क्षेत्र को हर दिन बनाए रखता है.”

उन्होंने कहा कि यह दिन इस बात का उत्सव है कि चाय किस तरह “किसानों, कामगारों, व्यापारियों, शोधकर्ताओं और उपभोक्ताओं को एक साझा वैश्विक परम्परा से जोड़ती है.”

ताकायुकी हागिवारा ने कहा कि भारत दुनिया के अग्रणी चाय उत्पादक देशों में से एक है. असम, दार्जिलिंग, नीलगिरि और अन्य क्षेत्रों की चायों की समृद्ध विविधता देश के अलग-अलग भौगोलिक परिदृश्यों और संस्कृतियों को दर्शाती है.

उनके अनुसार, यूएन खाद्य एवं कृषि संगठन, चाय को एक महत्वपूर्ण कृषि वस्तु मानता है, जिससे ग्रामीण आजीविका, रोज़गार, खाद्य सुरक्षा व वैश्विक स्तर पर टिकाऊ विकास में योगदान मिलता है.

चाय चखने के सत्र में असम, कांगड़ा, नीलगिरि और दार्जिलिंग की पैक की गई भारतीय चाय किस्मों को प्रदर्शित किया गया.
© एफएओ, भारत चाय चखने के सत्र में असम, कांगड़ा, नीलगिरि और दार्जिलिंग की पैक की गई भारतीय चाय किस्मों को प्रदर्शित किया गया.

भारत की चाय कहानी

भारतीय चाय बोर्ड के लिए यह आयोजन भारत में चाय क्षेत्र से जुड़े लोगों, समुदायों और संस्थाओं के योगदान को याद करने का अवसर भी था.

भारतीय चाय बोर्ड के विशेष अधिकारी एस एम नसरुल्लाह ने कहा कि यह आयोजन केवल एक पेय का उत्सव नहीं, बल्कि “शान्ति, समुदाय, विरासत और मानवीय जुड़ाव के वैश्विक प्रतीक” का उत्सव है.

उन्होंने याद दिलाया कि भारतीय चाय बोर्ड की स्थापना 1 अप्रैल 1954 को चाय अधिनियम, 1953 की धारा 4 के तहत की गई थी, और इसका उद्देश्य भारतीय चाय उद्योग के घरेलू और अन्तरराष्ट्रीय विकास को विनियमित, प्रोत्साहित और समर्थन देना है.

उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक चाय क्षेत्र में एक प्रमुख स्थान रखता है और दुनिया के सबसे बड़े चाय उत्पादक व उपभोक्ता देशों में से एक है, विशेष रूप से काली चाय के मामले में.

असम से सिक्किम, कांगड़ा और अन्य चाय उत्पादक क्षेत्रों तक, भारत की चाय विरासत “बातचीत, जुड़ाव और समुदाय की लम्बी परम्परा” को दर्शाती है. “संस्कृतियाँ, स्वाद और रस्में भले अलग हों, लेकिन मूल भावना एक ही रहती है: चाय जुड़ने का निमंत्रण है.”

अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस के अवसर पर भारत, जापान और श्रीलंका के प्रतिनिधिमंडलों ने चाय पीने की परम्परा का उत्सव मनाया.
© FAO India अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में भारत, जापान और श्रीलंका के प्रतिनिधिमंडलों ने चाय पीने की परम्परा का उत्सव मनाया.

एक साझा एशियाई परम्परा

इस कार्यक्रम में श्रीलंका ने भी अपना दृष्टिकोण सामने रखा जहाँ चाय, पहचान, आतिथ्य और आजीविका से गहराई से जुड़ी हुई है.

भारत में श्रीलंका की उच्चायुक्त महाशिनी कोलोन्ने ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस केवल चाय का उत्सव नहीं, बल्कि “उस संस्कृति, मित्रता और मानवीय जुड़ाव का उत्सव है, जिसका यह प्रतिनिधित्व करती है.”

उन्होंने कहा कि सीलोन चाय अपनी गुणवत्ता और विशिष्ट पहचान के लिए दुनिया भर में जानी जाती है, और “पीढ़ियों के ज्ञान, समर्पण और मेहनत” का प्रतीक है.

“श्रीलंका में चाय पेश करना अक्सर बातचीत की शुरुआत और गर्मजोशी व सद्भावना की अभिव्यक्ति होता है.”

उन्होंने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय चाय दिवस उन लाखों लोगों की याद दिलाता है जिनकी आजीविका इस क्षेत्र पर निर्भर है - “उत्पादकों और बागान कामगारों से लेकर छोटे उत्पादकों और निर्यातकों तक.”

उन्होंने कहा, “जब हम चाय के सांस्कृतिक महत्व का उत्सव मना रहे हैं, तो हमें इस क्षेत्र की स्थिरता को समर्थन देना भी जारी रखना होगा, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन सहित वैश्विक चुनौतियों के बीच.”

माचा से भारतीय चाय तक

जापानी चाय समारोह के बाद, अतिथियों ने भारतीय चाय बोर्ड के सहयोग से आयोजित, चाय का आनंद उठाने और एक संवाद सत्र में हिस्सा लिया, जहाँ देश भर की प्रसिद्ध भारतीय चाय किस्मों को प्रस्तुत किया गया.

कार्यक्रम का उद्देश्य भारत और जापान की चाय विरासत को सामने लाना, दोनों देशों के साँस्कृतिक सम्बन्धों को मज़बूत करना तथा टिकाऊ कृषि-खाद्य प्रणालियों में चाय की भूमिका को उजागर करना था.

यूएन हाउस में जब माचा और भारतीय चाय के प्याले साझा किए गए, तो सन्देश सरल ही था - चाय अलग-अलग संस्कृतियों में अलग रूप ले सकती है, लेकिन उसका मूल भाव एक ही रहता है - ठहरने, स्वागत करने और जुड़ने का एक अवसर.