वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां
सूडानी महिलाओं और बच्चों का एक समूह, जिनमें से कई रंगीन हेडस्कर्स पहने हुए हैं, एक स्पष्ट आकाश के नीचे एक विस्थापित शिविर में खड़े हैं, पृष्ठभूमि में टेंट दिखाई दे रहे हैं।

युद्ध महिलाओं और लड़कियों के लिए बन रहा है मृत्युदंड

UNFPA सूडान में युद्ध के दौरान, महिलाओं के शरीरों को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, और उन्हें पीड़ाजनक यौन अपराधों की निशाना बनाया गया.

युद्ध महिलाओं और लड़कियों के लिए बन रहा है मृत्युदंड

महिलाएँ

युद्ध का असर सभी पर एक जैसा नहीं होता. महिलाओं और लड़कियों के लिए युद्ध विस्थापनयौन हिंसाभूखस्वास्थ्य संकटशिक्षा में रुकावट और निर्णयों से बाहर रखे जाने जैसी गम्भीर चुनौतियाँ पैदा करता है. आइए समझते हैं कि आधुनिक दौर में युद्ध उनके लिए क्यों अधिक ख़तरनाक होते जा रहे हैंऔर शान्ति व पुनर्बहाली में उनकी भूमिका को केन्द्र में रखना क्यों ज़रूरी है.

युद्ध अब महिलाओं एवं लड़कियों के लिए और भी ख़तरनाक होते जा रहे हैं.

दुनिया भर में युद्ध लम्बे, अधिक क्रूर और अब दूर-दराज़ के युद्धक्षेत्रों के बजाय शहरों और बस्तियों के भीतर लड़े जा रहे हैं. घर, स्कूल, अस्पताल और आश्रय स्थल तबाह हो रहे हैं, और इसकी सबसे बड़ी क़ीमत आम नागरिक चुका रहे हैं.

आज दुनिया में 1946 के बाद से सक्रिय हिंसक टकरावों और युद्धों की संख्या सबसे अधिक है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 67 करोड़ 60 लाख महिलाएँ ऐसे इलाक़ों में रहती हैं, जो घातक टकरावों से 50 किलोमीटर के दायरे में हैं. 

कल्पना कीजिए कि बमों और मिसाइलों के बीच आपको रातोंरात अपना घर छोड़कर भागना पड़े, और उसी समय आपके आसपास पानी, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाएँ भी ठप हो जाएँ.

बम पुरुषों और महिलाओं में भेदभाव नहीं करते, लेकिन युद्ध का असर उन पर अलग-अलग होता है. आइए समझते हैं कि आधुनिक युद्ध महिलाओं और लड़कियों के लिए अधिक घातक क्यों होते जा रहे हैं, और युद्ध किस तरह पहले से मौजूद असमानताओं को और गहरा कर देता है.

हिंसक टकराव के दौरान महिलाओं के साथ क्या होता है?

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युद्ध के दौरान महिलाओं और लड़कियों के लिए कई तरह के जोखिम बढ़ जाते हैं. उन्हें अपने घरों से विस्थापित होना पड़ सकता है, स्कूल या काम छोड़ना पड़ सकता है, स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित होना पड़ सकता है, और यौन हिंसा, आघात, भूख व ग़रीबी का सामना करना पड़ सकता है.

जब बुनियादी सेवाएँ ठप हो जाती हैं और परिवार जीवित रहने की कोशिशों में जुटे होते हैं, तो अक्सर महिलाओं से ही बच्चों, घायलों और बुज़ुर्गों की देखभाल करने की उम्मीद की जाती है. वे अपने परिवारों और समुदायों को सम्भालती हैं, जबकि ख़ुद भी ख़तरे और आघात से गुज़र रही होती हैं.

युद्ध के दौरान परिवारों और समुदायों को टिकाए रखने में महिलाओं की अहम भूमिका होती है. इसके बावजूद, उन्हें अक्सर राजनैतिक निर्णयों और शान्ति वार्ताओं से बाहर रखा जाता है.

आधुनिक युद्ध महिलाओं और लड़कियों के लिए अधिक घातक क्यों होते जा रहे हैं?

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2025 में 20 सशस्त्र टकरावों में 37 हज़ार आम नागरिक मारे गए. इनमें लगभग हर पाँच में से एक महिला थी.

कुल मिलाकर, चार वर्षों में पहली बार आम नागरिकों की मौतों में कमी आई. इससे पहले लगातार तीन वर्षों तक यह संख्या बढ़ रही थी. लेकिन कुछ देशों में हालात और बिगड़े - सूडान और काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में आम नागरिकों की हत्याओं में तेज़ वृद्धि देखी गई.

2026 के पहले तीन महीने, यूक्रेन की महिलाओं और लड़कियों के लिए बेहद घातक रहे. 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के पहले वर्ष के बाद, यह उनके लिए सबसे ख़तरनाक सर्दियों का दौर था.

जनवरी से मार्च 2026 के बीच 199 महिलाओं और लड़कियों की मृत्यु हुई . यह संख्या इसी अवधि के लिए 2025, 2024 और 2023 से अधिक है. 

आबादी वाले इलाक़ों में लड़े जा रहे हैं युद्ध

आज के युद्ध अक्सर दूर-दराज़ के युद्धक्षेत्रों के बजाय आबादी वाले और रिहायशी इलाक़ों में लड़े जा रहे हैं. घर, अस्पताल, स्कूल और यहाँ तक कि सुरक्षित घोषित किए गए आश्रय स्थल भी क्षतिग्रस्त या नष्ट हो रहे हैं. इससे आम नागरिकों के घायल होने और मारे जाने का ख़तरा बढ़ गया है.

कई महिलाओं और लड़कियों के लिए अब कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है. कुछ अपने घरों में शरण लेते समय मौत के मुँह में धकेल दी जाती हैं. कुछ हमलों से बचकर भागते हुए घायल हो जाती हैं. कई महिलाएँ भोजन की तलाश या बुनियादी सेवाओं के ढह जाने के बीच अपने परिवारों को बचाने की कोशिश में भी जोखिम का सामना करती हैं.

ड्रोन हमलों से आम नागरिकों पर विनाशकारी असर

ग़ाज़ा, फ़लस्तीन में दिसम्बर 2025 तक युद्ध में 38 हज़ार महिलाओं व लड़कियों की मृत्यु हो चुकी थी. युद्धविराम समझौते के बावजूद उनकी मौतें जारी रहीं.

महिलाओं और बच्चों की सबसे अधिक मौतें उन समयों में हुईं, जब हवाई हमले, ड्रोन हमले और मिसाइल हमले तेज़ थे. इसी दौरान नागरिक बुनियादी ढाँचे को भी भारी नुक़सान पहुँचा. दर्ज किए गए कुल बुनियादी ढाँचे के नुक़सान में 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रिहायशी इमारतों का था.

सूडान में भी संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष ड्रोन हमलों में तेज़ वृद्धि की जानकारी दी है. जनवरी से मार्च के बीच इन हमलों में 500 से अधिक आम नागरिक मारे गए.

अन्तरराष्ट्रीय क़ानून इस बारे में स्पष्ट है - आम नागरिकों और मानवीय सहायता कर्मियों पर हमले, मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन हैं. इसके बावजूद, आधुनिक युद्धों में आम नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया जा रहा है, और अक्सर इसके लिए कोई जवाबदेही तय नहीं होती.

तेरह वर्षीय मोना बताती हैं कि किस तरह ग़ाज़ा में हुए दोहरे हवाई हमले में उनकी जान बची. इस हमले में उनकी माँ, बहन और भाई मारे गए, उनका घर तबाह हो गया और उन्हें ऐसी चोटें आईं, जिन्होंने उनकी ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल दी.

वह कहती हैं, “हम छठी मंज़िल पर बैठे थे, जब सातवीं मंज़िल पर हमला हुआ - मेरे चाचा के घर पर. मेरी चाची चिल्ला रही थीं, ‘मेरे बच्चे! मेरे बच्चे चले गए!’ जब मैं उनकी मदद के लिए दौड़ी, तभी उन्होंने दूसरा गोला दागा. उसी हमले में मेरी माँ और मेरे भाई-बहन मारे गए.”

युद्ध में किस तरह यौन हिंसा का ख़तरा बढ़ जाता है?

युद्ध के दौरान महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा का ख़तरा तेज़ी से बढ़ जाता है. कई जगहों पर बलात्कार और लैंगिक हिंसा के अन्य रूपों का इस्तेमाल डर फैलाने, समुदायों को तोड़ने, लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर करने और नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया जाता है.

सूडान में युद्ध अब चौथे वर्ष में पहुँच चुका है, और इसके साथ महिलाओं व लड़कियों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा में भारी वृद्धि हुई है. यूएन वीमेन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, लैंगिक हिंसा का सामना करने के बाद सहायता की ज़रूरत वाली महिलाओं एवं लड़कियों की संख्या पिछले दो वर्षों में लगभग दोगुनी हो गई है, और युद्ध शुरू होने के बाद से चार गुना बढ़ गई है.

पूर्वी और दक्षिणी अफ़्रीका के लिए यूएन वीमेन की क्षेत्रीय निदेशक एना मुतावाती कहती हैं, “महिलाओं और लड़कियों के साथ उनके घरों में बलात्कार किया जा रहा है और उनकी हत्याएँ की जा रही हैं. यह हिंसा तब भी होती है, जब वे अपनी जान बचाकर भाग रही होती हैं, या भोजन, पानी और इलाज की तलाश में होती हैं.”

सूडान कोई अकेला मामला नहीं है. दुनिया के कई हिंसक टकरावों में यौन हिंसा का इस्तेमाल अब भी युद्ध के हथियार के रूप में किया जाता है. इसका उद्देश्य समुदायों में डर फैलाना, उन्हें अपमानित करना, उनका हौसला तोड़ना और लोगों पर नियंत्रण स्थापित करना होता है.

युद्ध प्रभावित इलाक़ों में इन अपराधों के लिए जवाबदेही की कमी, हिंसा व दंडमुक्ति को और बढ़ाती है. डर एवं सामाजिक कलंक के कारण भी कई महिलाएँ व लड़कियाँ हिंसा की शिकायत दर्ज नहीं करा पातीं और सहायता तक नहीं पहुँच पातीं.

संयुक्त राष्ट्र ने 2025 में युद्ध-सम्बन्धी यौन हिंसा के 9,300 से अधिक दर्ज मामलों की पुष्टि की, जबकि 2024 में ऐसे 4 हज़ार 600 मामले दर्ज किए गए थे. लेकिन ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग में कई बाधाएँ होती हैं, इसलिए पुष्टि किए गए मामले वास्तविक संख्या का केवल एक छोटा हिस्सा माने जाते हैं. वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होने की आशंका है.

युद्ध-सम्बन्धी यौन हिंसा क्या होती है?

युद्ध-सम्बन्धी यौन हिंसा ऐसी हिंसा नहीं है, जो युद्ध के दौरान अचानक या अपने-आप हो जाती है. कई बार इसका इस्तेमाल जानबूझकर एक रणनीति के रूप में किया जाता है -समुदायों और सामाजिक रिश्तों को तोड़ने, लोगों में डर फैलाने, उन्हें अपना घर छोड़ने पर मजबूर करने और नियंत्रण स्थापित करने के लिए.

इसमें बलात्कार, यौन दासता, जबरन विवाह, जबरन गर्भधारण, जबरन नसबन्दी और यौन शोषण के लिए मानव तस्करी शामिल हो सकती है.

युद्ध-सम्बन्धी यौन हिंसा का निशाना किसी को भी बनाया जा सकता है, लेकिन दर्ज मामलों में 95 प्रतिशत से अधिक पीड़ित महिलाएँ और लड़कियाँ  होती हैं.

युद्ध और विस्थापन महिलाओं व लड़कियों को कैसे प्रभावित करते हैं?

2024 के अन्त तक, युद्ध, हिंसा, उत्पीड़न और मानवाधिकार उल्लंघनों के कारण 12 करोड़ 32 लाख लोग जबरन विस्थापित हो चुके थे.

युद्ध के कारण विस्थापित महिलाओं और लड़कियों को कई अतिरिक्त जोखिमों का सामना करना पड़ता है, जैसेकि -

• लैंगिक हिंसा, शोषण और दुर्व्यवहार का बढ़ा हुआ ख़तरा.
• भीड़भाड़ वाले आश्रय स्थल, जहाँ निजता और सुरक्षा बहुत कम होती है.
• स्वास्थ्य सेवाओं, आय, शिक्षा और संरक्षण तक पहुँच में बाधा.
• बार-बार विस्थापन और परिवार व सहायता नेटवर्क से अलग-थलग.

लेबनान में लड़ाई तेज़ होने के एक महीने के भीतर, हर चार में से एक महिला या लड़की विस्थापित हो चुकी थी.

लेबनान के सरीफ़ा शहर की 56 वर्षीय ज़ैनब फ़क़ीह चार बच्चों की माँ हैं. वह हताशा में पूछती हैं, “यह कैसी ज़िन्दगी है?”

“मेरा परिवार बिखर गया है. मेरे पति दक्षिण में रह गए हैं, जबकि मैं अपने बच्चों, नाती-पोतों और अपने पति के बुज़ुर्ग व बीमार माता-पिता के साथ आश्रय स्थल में रह रही हूँ. उनके भोजन, दवाओं और देखभाल की ज़िम्मेदारी मुझ पर है.”

वह कहती हैं, “मैं थक चुकी हूँ. दो वर्षों में यह दूसरी बार है जब हमें विस्थापित होना पड़ा है.”

17 अप्रैल से युद्धविराम समझौता लागू होने के बावजूद, लेबनान में कई परिवार अब भी आश्रय स्थलों और अपने घरों के बीच आ-जा रहे हैं. वे मौत के डर और फिर से घर छोड़ने की आशंका के बीच जी रहे हैं.

सूडान में 43 लाख महिलाएँ और लड़कियाँ अब भी देश के भीतर विस्थापित हैं, जबकि लाखों अन्य पड़ोसी देशों में शरण ले चुकी हैं. वहाँ विस्थापन महिलाओं और लड़कियों के लिए एक असम्भव चुनाव बन गया है. 

रुकने पर भूख या मौत का ख़तरा है, और भागने पर बलात्कार, अपहरण व हिंसा का जोखिम, जब वे भोजन, पानी और चिकित्सा सहायता की तलाश करती हैं.

ग़ाज़ा में लगभग 10 लाख महिलाएँ और लड़कियाँ विस्थापित हो चुकी हैं, और अनेक को औसतन चार बार अपना घर छोड़कर भागना पड़ा है. अक्टूबर 2025 में घोषित युद्धविराम समझौते के बाद भी, परिवार शान्ति, गरिमा, भोजन एवं पानी तक सुरक्षित पहुँच के बिना जीते रहे.

ग़ाज़ा में युद्ध ने परिवारों को तोड़ दिया है. अनेक महिलाओं पर, अपने पतियों और रिश्तेदारों को खोने के बाद, परिवार के बचे हुए जीवन को सम्भालने की ज़िम्मेदारी आ गई है.

म्यांमार के मंडले में भूकंप के बाद ढह गई इमारत के पास से एक महिला नीली बाल्टी में पानी ले जा रही है।
© UNICEF/Nyan Zay Htet म्यांमार के मंडाले क्षेत्र में एक महिला, यूनीसेफ़ द्वारा प्रदान किए गए पीने के पानी से भरी एक बाल्टी ले जाते हुए. अक्सर महिलाओं को युद्धों में यौन हिंसा का सामना करने के अलावा, अपने परिवारों की देखभाल का अतिरिक्त बोझ भी उठाना पड़ता है.

युद्ध महिलाओं के स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करता है?

दिसम्बर 2025 तक, ग़ाज़ा की स्वास्थ्य प्रणाली, युद्ध के दबाव में बुरी तरह टूट चुकी थी. इसराइली हमलों में 94 प्रतिशत अस्पताल नष्ट हो चुके थे और चिकित्सा सामग्री की आपूर्ति रुक गई थी. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इससे माताओं और नवजात शिशुओं के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ “तबाह” हो गई थीं.

ग़ाज़ा में 11 हज़ार महिलाएँ और लड़कियाँ घायल हुईं और जीवनभर की विकलांगता के साथ जीने को मजबूर हुईं. उनके लिए पर्याप्त डॉक्टर, दवाएँ या काम कर रहे स्वास्थ्य केन्द्र उपलब्ध नहीं थे. महिलाएँ पर्याप्त चिकित्सा देखभाल के बिना बच्चों को जन्म दे रही थीं, जबकि घायल आम नागरिकों को बुनियादी इलाज तक मिलना मुश्किल हो रहा था.

सबसे बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना भी कठिन हो गया था. ग़ाज़ा में लगभग 7 लाख महिलाओं और लड़कियों को भीड़भाड़ वाले या असुरक्षित स्थानों में माहवारी का प्रबन्ध करने में परेशानी हुई, क्योंकि सैनिटरी पैड या तो उपलब्ध नहीं थे या बहुत महंगे थे.

भूख भी तेज़ी से फैल रही थी. दिसम्बर 2025 तक, ग़ाज़ा में 7 लाख 90 हज़ार महिलाएँ और लड़कियाँ भूख और भयावह खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही थीं. भोजन की कमी के समय महिलाएँ अक्सर सबसे आख़िर में खाती हैं और कम भोजन खाती हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर लम्बे समय तक असर पड़ सकता है.

यूएन वीमेन ने ग़ाज़ा में एक डॉक्टर से पूछा कि इस समय वहाँ काम करना कैसा है.

कई बार बमबारी का सामना कर चुके अल-शिफ़ा अस्पताल में काम कर रहीं डॉक्टर ईमान अयाद का कहना है, “यहाँ आपको सिर्फ़ जीवित रहने के लिए लड़ना पड़ता है.”

वह मेडिकल छात्रा होने के बावजूद, ग़ाज़ा की स्वास्थ्य प्रणाली के ढह जाने और लोगों की भारी चिकित्सा ज़रूरतों के कारण वह सर्जरी कर चुकी हैं.

लेबनान में 2 मार्च से 29 अप्रैल 2026 के बीच स्वास्थ्य सेवाओं पर 150 से अधिक हमले दर्ज किए गए. इनमें स्वास्थ्यकर्मियों की हत्या और अस्पतालों का विनाश शामिल है - ऐसे कृत्य, जो अन्तरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के तहत प्रतिबन्धित हैं.

युद्ध में महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य संकट

युद्ध के बीच एक और संकट है, जो अक्सर सुर्ख़ियों में नहीं आता. अफ़ग़ानिस्तान, ग़ाज़ा, लेबनान और यूक्रेन में महिलाएँ पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD), चिन्ता व अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रही हैं. लेकिन मानसिक स्वास्थ्य सहायता तक उनकी पहुँच बहुत कम है, या कई जगह बिल्कुल नहीं है.

यूक्रेन में 2022 के बाद से महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा में 36 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. वहाँ 42 प्रतिशत महिलाओं में अवसाद का जोखिम है, जबकि लगभग हर चार में से एक महिला ने बताया कि उन्हें या उनके परिवार में किसी व्यक्ति को मनोसामाजिक परामर्श (counselling) की ज़रूरत थी.

35 वर्षीय ग़ोफ़रान अबू ख़लील कहती हैं, “मेरे इलाक़े पर बमबारी होने का ख़तरा था. मुझे रात में अपनी बेटियों के साथ घर छोड़ना पड़ा. मैं अपनी दवाएँ भूल गई, लेकिन अपनी बेटी का पसन्दीदा खिलौना, एक पांडा, साथ ले आई.”

ग़ोफ़रान अब तक चार बार विस्थापित हो चुकी हैं - पहले सीरिया के भीतर, फिर त्रिपोली, उसके बाद लेबनान के बोर्ज अल-शेमाली शिविर, और अब एक बार फिर लेबनान के भीतर.

वह सिब्लाइन प्रशिक्षण केन्द्र की सामुदायिक रसोई में काम करती हैं.

युद्ध महिलाओं के रोज़गार, आय और बिना वेतन वाले देखभाल कार्य को कैसे प्रभावित करता है?

युद्ध अर्थव्यवस्थाओं, आजीविकाओं और उन व्यवस्थाओं को तोड़ देता है, जिन पर परिवारों का जीवन निर्भर करता है. महिलाएँ अक्सर सबसे पहले अपनी आय वाला काम खोती हैं और सबसे आख़िर में फिर से सम्भल पाती हैं. इसकी एक वजह यह है कि वे अधिकतर असुरक्षित या कम वेतन वाले कामकाज करती हैं, और युद्ध के दौरान उन पर अवैतनिक देखभाल की ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ जाती हैं.

जब स्कूल बन्द हो जाते हैं, आवाजाही असुरक्षित हो जाती है, बाज़ार ठप पड़ जाते हैं और सार्वजनिक सेवाएँ कमज़ोर या बन्द हो जाती हैं, तो कई महिलाएँ अपनी आय खो देती हैं. इसके साथ ही वे उन सहायक व्यवस्थाओं से भी दूर हो जाती हैं, जो उन्हें काम करने, पढ़ाई जारी रखने और अपने परिवारों की देखभाल करने में मदद करती थीं.

भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर स्टेफ़ान प्रीज़नर, ओडिशा के तटीय पुरी ज़िले की चन्दनपुर पंचायत में स्वयं सहायता समूहों की सदस्यों, माताओं, गर्भवती महिलाओं, आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और अन्य सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों के साथ.
© UN India/Blassy Boben भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर स्टेफ़ान प्रीज़नर, ओडिशा के तटीय पुरी ज़िले की चन्दनपुर पंचायत में स्वयं सहायता समूहों की सदस्यों, माताओं, गर्भवती महिलाओं, आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और अन्य सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों के साथ.

महिलाएँ सबसे पहले आय खोती हैं और सबसे आख़िर में उबरती हैं

2022 से यूक्रेन में जारी पूर्ण पैमाने के युद्ध ने यूक्रेनी महिलाओं की एक पूरी पीढ़ी को पीछे धकेल दिया है. 2023 में बेरोज़गार लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी 72.5 प्रतिशत थी, और महिलाओं की आय पुरुषों की तुलना में 41.4 प्रतिशत कम थी. 2024 तक, विस्थापित महिलाओं में से केवल 48 प्रतिशत रोज़गार में थीं, जबकि पुरुषों में यह आँकड़ा 71 प्रतिशत था.

युद्ध महिलाओं के लिए आवाजाही, काम करने और बाज़ारों तक पहुँच को और कठिन व ख़तरनाक बना देता है. ग़ाज़ा में अब हर सात में से एक परिवार जीवित रहने के लिए महिलाओं पर निर्भर है, लेकिन महिलाओं को आजीविका अर्जित करने में गम्भीर बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में नक़दी सहायता, खाद्य सहायता और आर्थिक समर्थन बेहद ज़रूरी हो जाते हैं.

युद्ध के दौरान आर्थिक नुक़सान केवल आय खोने तक सीमित नहीं होता. महिलाएँ अक्सर अपनी सम्पत्ति, ज़मीन, दस्तावेज़, बचत, सामाजिक नैटवर्क और ऋण तक पहुँच भी खो देती हैं. विस्थापन उन्हें असुरक्षित काम, क़र्ज़ और शोषण के जोखिम में भी डाल सकता है.

बिना वेतन वाले देखभाल कार्य का ज़्यादातर बोझ महिलाओं पर

युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में अक्सर महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे ढहती व्यवस्थाओं की कमी को पूरा करें. वे बच्चों, बीमारों और बुज़ुर्गों की देखभाल करती हैं, और बेहद कठिन हालात में परिवारों को सम्भाले रखने की कोशिश करती हैं.

2024 में यूक्रेनी महिलाओं ने बताया कि वे बच्चों की देखभाल पर प्रति सप्ताह 56 घंटे ख़र्च कर रही थीं, जबकि युद्ध से पहले यह समय 49 घंटे था. बच्चों की देखभाल करने वाली सुविधाओं के बन्द होने से महिलाओं के लिए वेतन वाला काम ढूँढना और भी कठिन हो गया.

महिलाएँ समुदायों को फिर सहारा दे रही हैं - अक्सर बिना पर्याप्त सहायता के

युद्धों का महिलाओं पर गहरा और असमान असर पड़ता है. फिर भी युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में वही जीवन बचाने और पुनर्बहाली की अहम ताक़त बनी हुई हैं.

यूक्रेन से लेकर ग़ाज़ा और सूडान तक, महिलाएँ और महिलाओं के नेतृत्व वाले संगठन परिवारों तक भोजन पहुँचा रहे हैं, चिकित्सा और मनोसामाजिक सहायता दे रहे हैं, तथा अपने समुदायों में आर्थिक पुनर्बहाली में मदद कर रहे हैं.

2025 तक, यूक्रेन में हर दो में से एक व्यवसाय महिला ने शुरू किया था. इसके बावजूद, महिलाओं के संगठनों को मिलने वाली सहायता घट रही है, जबकि ज़रूरतें लगातार बढ़ रही हैं. 

यूएन वीमेन की 2025 की एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, मानवीय संकट वाले क्षेत्रों में महिलाओं के नेतृत्व वाले और महिला अधिकारों से जुड़े आधे संगठन, धन की कटौती के कारण छह महीनों के भीतर बन्द होने की कगार पर हैं.

युद्ध लड़कियों की शिक्षा को किस तरह बाधित करता है?

दुनिया भर में 11 करोड़ 90 लाख लड़कियाँ स्कूल से बाहर हैं. युद्ध प्रभावित देशों में रहने वाली लड़कियों के स्कूल से बाहर होने की आशंका, उन देशों की लड़कियों की तुलना में दोगुनी से भी अधिक होती है, जो युद्ध-प्रभावित नहीं है.

युद्ध लड़कियों से उनका भविष्य छीन लेता है

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के कुछ ही सप्ताह बाद, पूर्व राजनयिक और कीव स्थित नागरिक समाज संगठन स्पेस ऑफ़ नॉलेज की संस्थापक ओलेसिया बोझको को समझ में आने लगा कि यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने का आक्रमण, शिक्षा पर भी हमला है. उनका संगठन सीखने में नवाचार पर काम करता है.

रूसी हमलों में हज़ारों शिक्षण संस्थान नष्ट हुए हैं, जिनमें स्कूल और किंडरगार्टन भी शामिल हैं. जून 2024 तक, यूक्रेन में लगभग 40 लाख बच्चों की शिक्षा बाधित हुई थी, और क़रीब 6 लाख बच्चे स्कूल जाकर बिल्कुल भी शिक्षा हासिल नहीं कर पा रहे थे.

जब युद्ध के कारण बुनियादी ढाँचा टूटता है, सुरक्षा बिगड़ती है और परिवारों की आय घटती है, तो लड़कियों के लिए स्कूल जाना या शिक्षा जारी रखना, लड़कों की तुलना में और कठिन हो जाता है.

अफ़ग़ानिस्तान में लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा पर प्रतिबन्ध

अगस्त 2021 में तालेबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण किया. इसके एक महीने बाद लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया.

लेकिन शिक्षा का संकट इससे भी पहले शुरू हो जाता है. ग़रीबी, लैंगिक पाबन्दियों और सुरक्षा सम्बन्धी चिन्ताओं के कारण लगभग 30 प्रतिशत अफ़ग़ान लड़कियाँ प्राथमिक स्कूल भी शुरू नहीं कर पातीं. कई परिवार घरेलू आय में मदद के लिए, या बाल विवाह की तैयारी के कारण, लड़कियों और लड़कों दोनों को स्कूल से निकाल लेते हैं.

लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखने का असर पूरी ज़िन्दगी रह सकता है. इससे पूरे समुदाय निर्धनता के चक्र में फँसे रह सकते हैं.

2025 तक, 78 प्रतिशत युवा अफ़ग़ान महिलाएँ शिक्षा, रोज़गार या प्रशिक्षण से बाहर थीं - यह दर युवा पुरुषों की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है. इस वर्ष कम उम्र में मातृत्व के मामलों में 45 प्रतिशत वृद्धि होने का अनुमान है, और मातृ मृत्यु दर 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ सकती है.

शान्ति वार्ताओं में महिलाएँ कहाँ हैं?

संघर्ष निवारण और विकास में महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए, उप-सचिव अमीना जे. मोहम्मद और अन्य के साथ एक बैठक में नागरिक समाज की एक महिला बोल रही हैं।
UNMISS Photo दक्षिण सूडान में सिविल सोसायटी की कुछ सदस्य, यूएन उप महासचिव आमिना मोहम्मद के सामने अपनी बात रखते हुुए. महिलाओं को शान्ति स्थापना में भी अक्सर कम स्थान मिलता है.

जब महिलाएँ बातचीत की मेज़ पर होती हैं, तो शान्ति की सम्भावना बढ़ती है. शान्ति अधिक समावेशी होती है और ज़्यादा समय तक टिकती है. अध्ययनों में यह बात बार-बार सामने आई है.

माली और नाइजर के सीमावर्ती इलाक़ों में, 2020 से 2022 के बीच स्थानीय स्तर पर हिंसा रोकने की कोशिशों में महिलाओं की भागेदारी 5 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हुई. इससे स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े 100 से अधिक विवाद सुलझाने में मदद मिली.

कोलम्बिया की शान्ति प्रक्रिया ने दुनिया को दिखाया कि जब महिलाओं को शान्ति वार्ताओं में बराबर जगह मिलती है, तो क्या सम्भव हो सकता है.

52 वर्षों के सशस्त्र टकराव के बाद, जब शान्ति लगभग असम्भव लग रही थी, कोलम्बिया के महिला समूहों ने हार नहीं मानी. 2010 के दशक में, जब शान्ति प्रक्रिया आगे बढ़ने लगी, तो यूएन वीमेन के समर्थन से देश भर की महिलाएँ संगठित हुईं. वे उस बातचीत की मेज़ पर अपनी जगह चाहती थीं, जहाँ शान्ति और पुनर्बहाली की शर्तें तय होनी थीं.

2016 में जब औपचारिक शान्ति समझौते पर हस्ताक्षर हुए, तो राष्ट्रीय सरकार की वार्ता टीम में महिलाएँ 20 प्रतिशत थीं. कोलम्बिया के सशस्त्र बलों (FARC) के प्रतिनिधियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत थी - आधुनिक इतिहास में यह अब तक की सबसे अधिक हिस्सेदारी थी.

इसका परिणाम यह हुआ कि यह दुनिया का पहला ऐसा शान्ति समझौता बना, जिसमें लैंगिक दृष्टिकोण को पूरी तरह शामिल किया गया. इसमें महिलाओं के अधिकारों से जुड़ी 100 से अधिक प्रतिबद्धताएँ शामिल थीं.

जब शान्ति समझौते पर हस्ताक्षर हुए, तो महिलाओं ने माँग की कि उसमें उनके अधिकारों की रक्षा और उन्हें आगे बढ़ाने के स्पष्ट प्रावधान हों. उनकी यह माँग मानी गई. इसका उद्देश्य यह भी था कि युद्ध के दौरान महिलाओं के साथ जो हुआ, वह फिर न दोहराया जाए.

इसके बावजूद, औपचारिक शान्ति प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागेदारी अब भी बहुत कम है. वैश्विक औसत के अनुसार, महिलाएँ केवल 7 प्रतिशत वार्ताकार और 14 प्रतिशत मध्यस्थ हैं.

अक्सर युद्ध शुरू करने वालों को शान्ति वार्ता की मेज़ पर बुलाया जाता है, जबकि शान्ति के लिए सचमुच काम करने वाले समूहों, जैसेकि महिला संगठनों को लगातार किनारे कर दिया जाता है.

फिर भी महिलाएँ हार नहीं मानतीं और किनारे बैठकर इन्तज़ार नहीं करतीं. वे स्थानीय स्तर पर शान्ति निर्माण में अहम भूमिका निभाती रहती हैं. उदाहरण के लिए, इथियोपिया, लाइबेरिया और केन्या में महिला शान्तिनिर्माताओं ने स्थानीय, क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय स्तरों पर शान्ति प्रक्रियाओं व समझौतों को प्रभावित किया. यमन में महिलाओं ने आम नागरिकों को पानी तक पहुँच दिलाने के लिए बातचीत की. 2024 में दक्षिण सूडान में जिन एकमात्र शान्ति समझौतों पर सहमति बनी, उनमें महिला समूहों की प्रतिनिधि हस्ताक्षरकर्ताओं के रूप में शामिल थीं.

युद्ध क्षेत्रों में यूएन वीमेन, किस तरह महिलाओं और लड़कियों की सहायता करता है?

गाजा में फिलिस्तीनी महिलाएं शोक और भावनात्मक समर्थन के क्षण में एक-दूसरे को गले लगा रही हैं।
© UN Women/Samar Abu Elouf इसराइली बमबारी में अपने प्रियजन को खोने के बाद शोकाकुल परिवार.

यूएन वीमेन दुनिया भर के युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर पर काम करता है. उसका काम महिलाओं एवं लड़कियों के साथ, और महिलाओं व लड़कियों के लिए होता है.

यूएन वीमेन की सहायता जीवनरक्षक भी होती है और लम्बी अवधि की भी. इसके तहत महिलाओं के नेतृत्व वाले संगठनों और महिला अधिकार संगठनों के साथ मिलकर संरक्षण सेवाएँ, मनोसामाजिक देखभाल, नक़दी सहायता और महिलाओं के लिए आय अर्जित करने के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं.

इस काम का मुख्य सिद्धान्त यह है कि महिलाओं की आवाज़ उन फ़ैसलों में शामिल होनी चाहिए, जो उनके जीवन और समुदायों को प्रभावित करते हैं. यूएन वीमेन यह सुनिश्चित करने के लिए काम करता है कि महिलाओं और लड़कियों के अनुभव व ज़रूरतें मानवीय सहायता एवं पुनर्बहाली प्रयासों का हिस्सा बनें. साथ ही, आपातकालीन योजना, समन्वय और वित्त पोषण व्यवस्थाओं में लैंगिक समानता को शामिल किया जाए.

लैंगिक समानता और महिला अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र संस्था के रूप में, यूएन वीमेन महिला, शान्ति और सुरक्षा एजेंडा को आगे बढ़ाता है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शान्ति और सुरक्षा प्रयासों में महिलाओं की भागेदारी, संरक्षण और नेतृत्व को केन्द्र में रखा जाए.

मदद के लिए आप क्या कर सकते हैं?

बहुत लम्बे समय तक इतिहास, मीडिया और निर्णय लेने वालों ने युद्ध की ऐसी तस्वीर पेश की है, जैसेकि उसका असर सभी पर एक जैसा होता है. लेकिन सच यह है कि जब शान्ति के समय भी महिलाओं को इतनी असमानता का सामना करना पड़ता है, तो युद्ध से तो वो और गहरी हो जाती है.

• इस कहानी को पढ़ें, साझा करें और बातचीत शुरू करें. सवाल पूछें - महिलाएँ और लड़कियाँ कहाँ हैं? वे युद्ध को किस तरह झेल रही हैं? उन्हें निर्णय लेने वाली जगहों पर क्यों शामिल नहीं किया जा रहा है?

• युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय महिला संगठनों का समर्थन करें.

• यूएन वीमेन को दान दें, ताकि हम हर जगह महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए उनके साथ मिलकर काम जारी रख सकें.