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भारत: चित्रकथा से प्रेरणा, लैंगिक भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का साहस

आज तन्नू कुमारी अपने स्कूल परिसर में मंच पर प्रभावशाली ढंग से बोलने और घर व गाँव में भेदभाव को शान्त लेकिन दृढ़ता से चुनौती देने के लिए पहचानी जाती हैं.
© UNICEF/Anindito Mukherjee आज तन्नू कुमारी अपने स्कूल परिसर में मंच पर प्रभावशाली ढंग से बोलने और घर व गाँव में भेदभाव को शान्त लेकिन दृढ़ता से चुनौती देने के लिए पहचानी जाती हैं.

भारत: चित्रकथा से प्रेरणा, लैंगिक भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का साहस

महिलाएँ

भारत के झारखंड प्रदेश की तन्नू कुमारी कभी मानती थीं कि लड़कियों पर लगाई गई पाबन्दियाँ सामान्य हैं. लेकिन एक चित्रकथा श्रृँखला ने उनकी सोच बदल दी. अब वह घर में असमान व्यवहार पर सवाल उठाती हैंअपने गाँव में लड़कियों के अधिकारों पर बोलती हैं और अन्य लड़कियों को शिक्षा जारी रखने के लिए प्रेरित करती हैं.

सत्रह वर्षीय तन्नू कुमारी आज बड़े आत्मविश्वास से बात करती हैं. लेकिन क़रीब दो साल पहले, जब वह काँके स्थित कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय में दाख़िल हुई थीं, तो वह शर्मीली और चुप रहने वाली लड़की थीं.

आज झारखंड के राँची शहर के इस स्कूल में तन्नू मंच पर अपने आत्मविश्वास और घर व समुदाय में भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए जानी जाती हैं.

उनकी यह यात्रा एक चित्रकथा श्रृँखला के कुछ पन्नों से शुरू हुई.

पन्नों के बीच मिले सबक़

जब तन्नू ने पहली बार 'आधा फुल' पुस्तिका पढ़ी, तो उन्हें अन्दाज़ा नहीं था कि यह चित्रकथा श्रृँखला उनकी अपनी ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया बदल देगी. यह श्रृँखला सरकार के समर्थन और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनीसेफ़) व ‘डव आत्मसम्मान कार्यक्रम’ की साझेदारी में विकसित की गई है.

आधा फुल में ऐसे युवाओं की कहानियाँ हैं, जो रोज़मर्रा के भेदभाव और अन्याय का सामना करते हैं. इनमें ऐसी लड़कियाँ भी हैं, जो परम्पराओं को चुनौती देती हैं, भेदभाव के ख़िलाफ़ बोलती हैं और तब भी आवाज़ उठाती हैं, जब बड़े लोग उनकी बात को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं.

तन्नू कहती हैं, “मुझे समझ में आया कि समाज मुझे जो बहाने दे रहा था - सुरक्षा, परम्परा, ज़िम्मेदारी - वे असल में मेरी सुरक्षा के लिए नहीं थे. वे मुझे चुप रखने के लिए थे.” 

इससे पहले तक, तन्नू ने यह मान लिया था कि उनके छोटे भाई का गाँव के निजी स्कूल में पढ़ना और उनका व उनकी बहन का सरकारी आवासीय स्कूल भेजा जाना सामान्य बात है. उनके माता-पिता कहते थे कि लड़कियों के लिए पड़ोसी मोहल्लों से गुज़रकर साइकिल चलाकर स्कूल जाना सुरक्षित नहीं है.

यह सोच नई नहीं थी. उनकी माँ रत्ना देवी को भी कक्षा 9 के बाद स्कूल से हटा दिया गया था, जबकि उनके भाइयों ने अपनी शिक्षा जारी रखी. वजह वही थी - स्कूल जाने का रास्ता “असुरक्षित” माना गया था.

तन्नू कहती हैं, “मैंने कभी यह पूछने के बारे में सोचा ही नहीं. मुझे लगता था कि दुनिया बस ऐसी ही होती है.”

रूढ़िवादी सोच को चुनौती

चित्रकथा की कहानियों और स्कूल में हुए नाट्य सत्रों में निभाई भूमिकाओं ने तन्नू को अपनी बात कहने का साहस दिया. उन्होंने परिवार के पुराने फ़ैसलों पर सवाल उठाने शुरू किए - सबसे पहले शिक्षा को लेकर.

तन्नू ने अपने ही परिवार से पूछा कि केवल उनके भाई से कॉलेज जाने की उम्मीद क्यों की जा रही है, और उन्हें व उनकी बहन को कम पर समझौता क्यों करना चाहिए. उनकी माँ ने उनकी बात सुनी. बाद में उनके पिता, जो शुरू में तैयार नहीं थे, वे भी मान गए.

तन्नू अपने स्कूल और विभिन्न प्रतियोगिताओं में आधा फ़ुल चित्रकथाओं पर आधारित रोल-प्ले प्रस्तुतियों में शानदार प्रदर्शन करती हैं.
© UNICEF/Anindito Mukherjee तन्नू अपने स्कूल और विभिन्न प्रतियोगिताओं में आधा फ़ुल चित्रकथाओं पर आधारित रोल-प्ले प्रस्तुतियों में शानदार प्रदर्शन करती हैं.

तन्नू ने छोटे-छोटे दिखने वाले भेदभाव पर भी सवाल उठाए. जब उनकी दादी ने उनके साँवले रंग पर टिप्पणी की, तो तन्नू ने शान्त भाव से कहा, “हमारे परिवार में कोई न कोई तो ऐसा होगा जो मेरी तरह दिखता होगा.” यह सीधा-सा जवाब उनकी दादी को सोचने पर मजबूर कर गया.

घर में तन्नू और उनकी बहन ने अपने पिता से शराब पीने के बारे में भी बात की, जिसकी वजह से परिवार में तनाव होता था. उनके पिता ने अब शराब छोड़ दी है.

मंच से समाज तक

शिक्षकों ने जल्द ही तन्नू के अभिनय और बोलने की क्षमता को पहचान लिया. शुरुआत में वह झिझकती थीं, लेकिन बाद में उन्हें आधा फुल चित्रकथा पर आधारित राष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिताओं में स्कूल का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रोत्साहित किया गया.

प्रधानाचार्य अंजली गुप्ता कहती हैं, “तन्नू में आया बदलाव असाधारण है. जब वह पहली बार आई थी, तो बहुत कमज़ोर और डरी हुई थी. अब वह सैकड़ों लोगों के सामने खड़ी होकर मंच को अपना बना लेती है.”

यह बदलाव केवल मंच तक सीमित नहीं रहा. तन्नू ने अपनी एक मित्र की माँ को समझाया कि वे अपनी बेटी को कक्षा 10 के बाद भी शिक्षा जारी रखने दें. 

वह गाँव की लड़कियों को बाल विवाह पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करती हैं और अपनी सहेलियों को समझाती हैं कि उनका महत्व दूसरों की राय से तय नहीं होता.

न्याय का सपना

तन्नू के सपने अब उनके गाँव से कहीं आगे तक जाते हैं. अपने आसपास ज़मीन-जायदाद से जुड़े विवादों और महिलाओं की चुपचाप सहन की गई पीड़ा को देखकर, वह वकील बनना चाहती हैं.

तन्नू कहती हैं, “लोगों को अपने अधिकारों के बारे में जानना चाहिए. मैं उन लोगों के साथ खड़ी होना चाहती हूँ, जो अपने लिए खड़े नहीं हो पाते.”

आधा फुल चित्रकथा को आत्मसम्मान बढ़ाने और रूप-रंग से जुड़ी रूढ़ियों को चुनौती देने के लिए तैयार किया गया था. लेकिन तन्नू के लिए यह बदलाव की शुरुआत बन गई - ऐसी शुरुआत, जिसने उन्हें अपने घर, स्कूल और गाँव में आवाज़ उठाने का साहस दिया.

प्रधानाचार्य अंजली गुप्ता कहती हैं, “ये लड़कियाँ प्रदेश के बेहद दूर-दराज़ इलाक़ों से आती हैं, जहाँ उनका बाहरी दुनिया से बहुत कम परिचय होता है. लेकिन आज तन्नू अपने माता-पिता, अपनी दोस्तों, यहाँ तक कि हमें भी सिखा रही है.” 

काँके में शाम ढल रही है और तन्नू अपने अगले नाटक का अभ्यास कर रही हैं. उनकी आवाज़ स्कूल के आँगन में गूंजती है. जो कहानी कभी चित्रकथा के पन्नों तक सीमित थी, वह अब बदलाव की आवाज़ बन गई है - और साबित कर रही है कि चित्रों एवं संवादों से भी समानता की राह खोली जा सकती है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.