DRC: इबोला का प्रकोप, सैकड़ों संदिग्ध संक्रमण मामले, वैक्सीन अभी दूर
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में तेज़ी से फैल रहे इबोला वायरस को रोकने के लिए स्वास्थ्यकर्मी निरन्तर प्रयासों में जुटे हैं, लेकिन इसकी रोकथाम के लिए सम्भावित वैक्सीन आने में अभी कई महीने का समय लग सकता है.
डीआरसी में यूएन स्वास्थ्य एजेंसी की प्रतिनिधि डॉक्टर ऐन ऐन्सिया ने जिनीवा में मंगलवार को पत्रकारों को बताया कि अब तक 500 संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं, और इस संक्रमण की वजह से 130 लोगों की मौत होने की आशंका है. हालांकि, देश में अभी तक केवल 30 मामलों में ही पुष्टि हो पाई है.
इबोला के प्रकोप से निपटने के लिए WHO की टीम, स्थानीय एजेंसियों के साथ मिलकर कार्य कर रही है और डीआरसी के पूर्वी हिस्से में इस वायरस की बुंडिबुग्यो नामक प्रजाति की पहचान के लिए परीक्षण किट रवाना की गई हैं. इबोला के इस प्रकार के लिए फ़िलहाल कोई वैक्सीन या थेरेपी उपलब्ध नहीं है.
डॉक्टर ऐन्सिया ने कहा कि अभी संक्रमण मामलों की संख्या के बारे में अनिश्चितता है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि वायरस कितनी दूर तक फैल चुका है.
उन्होंने इतूरी प्रान्त के बुनिया से यह जानकारी दी है जहाँ संक्रमण के शुरुआती मामलों का पता चला था. उत्तर किवू प्रान्त में भी इसके मामलों की पुष्टि हो चुकी है और पड़ोसी देश, युगांडा में दो संक्रमण मामले सामने आए हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने रविवार को, इबोला वायरस के फैलाव को अन्तरराष्ट्रीय चिन्ता वाली सार्वजनिक आपात स्थिति घोषित कर दिया था. साथ ही, उन्होंने इस महामारी के स्तर और गति पर चिन्ता जताई है. अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इबोला का फैलाव किस तरह और कहाँ से शुरू हुआ.
डॉक्टर ऐन्सिया ने कहा कि ऐसा नहीं लगता है कि हम अभी पहले संक्रमण मामले का पता लगा पाए हैं. अभी तक इतनी जानकारी है कि 5 मई को एक व्यक्ति की बुनिया में मौत हो गई. उनके शव को फिर मोंगब्वालु लाया गया और उसे एक ताबूत में रखा गया.
इसके बाद, उनके परिवार ने यह निर्णय लिया कि वह ताबूत, मृतक के लायक नहीं था और इसलिए फिर उसे बदला गया, और अंतिम संस्कार हुआ. तभी से यह शुरुआत हो गई.
आरम्भिक मामलों का पता लगाने की प्रक्रिया इसलिए भी सुस्त है, चूँकि बुनिया में स्थानीय परीक्षणों में, इबोला की ज़ायर नामक प्रजाति के लिए परीक्षण नेगेटिव आए थे.
शुरुआती लक्षणों, जैसेकि बुखार, थकान, दस्त और उल्टी से संक्रमण का जल्द पता लगाने में कठिनाई सामने आई और नाक से रक्त बहने के लक्षण अक्सर पाँचवे दिन तक सामने नहीं आते हैं, जिससे और देरी हुई.
किंशासा में हुई पुष्टि
राजधानी किंशासा में परीक्षण के ज़रिए अन्तत: बुंडिबुग्यो नामक वायरस की पुष्टि हो गई. डॉक्टर ऐन्सिया ने कहा है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इस वायरस की रोकथाम के लिए वैक्सीन और उपचार पर ध्यान केन्द्रित है.
मंगलवार को यूएन एजेंसी की तकनीकी परामर्श समूह की बैठक हो रही है, जिसमें WHO और सदस्य देशों के लिए सिफ़ारिशें प्रस्तुत की जाएंगी कि किन सम्भावित वैक्सीन को प्राथमिकता दी जाए.
फ़िलहाल, ज़ायर इबोला वायरस के विरुद्ध ‘ऐर्वेबो’ नामक एक टीके पर विचार किया जा रहा है, लेकिन अगर यह उपलब्ध होता भी है तो भी इसमें दो महीने तक का समय लग सकता है.
एक वैक्सीन की ज़रिए, संक्रमण प्रभावित आबादी में अतिरिक्त रोकथाम उपाय व सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर वायरस के फैलाव को रोकने के लिए समुदायों में जागरुकता प्रसार ज़रूरी है. साथ ही, भ्रामक सूचना के विरुद्ध लड़ाई और आवश्यक साफ़-सफ़ाई उपायों को अपनाना भी आवश्यक है.
डॉक्टर ऐन्सिया ने कहा कि यदि हम सख़्त उपायों को अपनाएं लेकिन आबादी उनसे सहमत न हों तो हम शवों को ग़ायब होते देखेंगे. संदिग्ध मामले, अस्पतालों व स्वास्थ्य केन्द्रों में आने से मना कर देंगे. इसके मद्देनज़र, उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों और स्कूलों, चर्च व सामुदायिक नेताओं के बीच निरन्तर सम्पर्क व बातचीत पर बल दिया है.
विस्थापितों के लिए कठिनाई
इस बीच, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने मंगलवार को बताया कि इबोला प्रभावित इतूरी और उत्तर किवू प्रान्त में 20 लाख से अधिक आन्तरिक रूप से विस्थापित लोग रह रहे हैं, जबकि हिंसक टकराव के कारण वहाँ स्वास्थ्य देखभाल क्षमता सीमित है.
संक्रमण प्रभावित इलाक़ों में शरणार्थियों के रहने पर भी चिन्ता है. इतूरी में दक्षिण सूडान के 11 हज़ार शरणार्थियों को रोकथाम सम्बन्धी सहायता की आवश्यकता है, जबकि उत्तर किवू की राजधानी, गोमा में रवांडा और बुरुंडी के 2 हज़ार शरणार्थियों को साफ़-सफ़ाई सम्बन्धी सामग्री की ज़रूरत है.
काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में इबोला के ज़ायर वायरस का प्रकोप दिसम्बर 2025 में समाप्त हुआ था. इतूरी और उत्तर किवू की स्थानीय आबादी में अब भी 2018-19 के दौरान इबोला की बड़ी महामारी का सदमा है.