ग़ाज़ा: कचरा, गन्दगी, चूहे, भीड़भाड़ वाले शिविरों में बीमारियों का डर बढ़ा
ग़ाज़ा पट्टी में भीड़भाड़ वाले तम्बुओं और विस्थापन शिविरों में रह रहे हज़ारों परिवार, चूहों और कीट-पतंगों की बढ़ती समस्या से जूझ रहे हैं, जिससे अनेक बीमारियाँ फैलने का ख़तरा बढ़ रहा है.
इस तटीय क्षेत्र में बहुत से परिवारों को इसराइल और हमास के बीच जारी युद्ध से बचने के लिए, बार-बार अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगह तलाश करनी पड़ी है.
स्वास्थ्य व्यवस्था का बड़ा हिस्सा नष्ट हो चुका है. अब सड़कों पर कचरा जमा होने और सीवेज सेवाएँ ठप पड़ने से स्वास्थ्य और पर्यावरणीय हालात तेज़ी से बिगड़ रहे हैं.
विस्थापित लोगों का कहना है कि चूहे रोज़ तम्बुओं में घुस जाते हैं, भोजन सामग्री को दूषित करते हैं, रात में बच्चों पर हमला करते हैं. बुनियादी सेवाओं की कमी और भीड़भाड़ के कारण त्वचा रोगों और प्रदूषण का ख़तरा भी बढ़ रहा है.
पूर्वी ग़ाज़ा शहर से भागकर ग़ाज़ा सिटी के मध्यवर्ती इलाक़े में एक विस्थापन शिविर में पहुँचे विस्थापित निवासी फ़ादी जुन्दिया ने बताया कि शिविर में चूहे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गए हैं.
उन्होंने कहा, “इस शिविर की स्थापना के पहले दिन से ही चूहों की समस्या रही है, लेकिन अब वे तम्बुओं के बीच असामान्य रूप से फैल रहे हैं. हम जब एक चूहे से छुटकारा पाते हैं, तो दस और दिखाई देने लगते हैं. उनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और हमारे पास कोई समाधान नहीं है.”
उन्होंने बताया कि चूहे प्लास्टिक के तम्बुओं को कुतर देते हैं और भोजन सामग्री नष्ट कर देते हैं. चूहों को मारने के लिए उचित कीटनाशक उपलब्ध नहीं होने या उसके बहुत महंगे होने के कारण, स्थानीय स्तर पर बनाए गए जाल भी अब असरदार नहीं रहे हैं.
उन्होंने बताया कि बच्चे रात में लगातार डर के माहौल में रहते हैं, ख़ासतौर पर शौचालय जाते समय, क्योंकि शिविरों में चूहों द्वारा काटने और खरोंच लगने की घटनाएँ बार-बार सामने आई हैं.
एक अन्य तम्बू में रह रहे विस्थापित निवासी मोहम्मद तलाल बताते हैं कि सोते समय उनके बच्चे पर चूहों ने हमला कर दिया, जिसके बाद उन्हें सुबह होने से पहले ही इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा.
उन्होंने कहा, “मेरे बच्चे पर चूहों ने हमला किया और शुक्र है कि स्थिति इससे ज़्यादा गम्भीर नहीं हुई. मैं उसे सुबह पाँच बजे अस्पताल ले गया, जहाँ उसके चेहरे के घाव का इलाज किया गया. हम अब भी चूहों की समस्या से जूझ रहे हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि यहाँ रौशनी नहीं है.”
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय साझीदारों के अनुसार, विस्थापित परिवारों में त्वचा सम्बन्धी चोटों और अन्य बीमारियों की शिकायतें बढ़ रही हैं. अब स्वच्छता व्यवस्था में सुधार और कीट नियंत्रण के प्रयास किए जा रहे हैं.
फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र एजेंसी, (UNRWA) की टीमें विस्थापन शिविरों में लगातार सफ़ाई, संक्रमणमुक्ति और कीटनाशक छिड़काव अभियान चला रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने भी स्थानीय नगरपालिकाओं के सहयोग से ग़ाज़ा पट्टी में चूहों व कीड़ों से निपटने के लिए एक व्यापक योजना शुरू करने की घोषणा की है.
विस्थापित निवासी मोहम्मद तलाल का कहना है कि हालात में जल्द से जल्द सुधार होना बेहद ज़रूरी है.
उन्होंने कहा, “मैं चूहों के कारण पूरी रात जागता रहता हूँ और रौशनी के लिए मोबाइल फ़ोन हाथ में रखता हूँ. अगर मेरे पास धन होता है तो मैं फ़ोन की बैटरी चार्ज कर लेता हूँ, नहीं तो अंधेरे में सोने के लिए मजबूर होता हूँ."
"मेरे बच्चे भी रात में शौचालय जाने से डरते हैं और उनके साथ किसी को रौशनी लेकर चलना पड़ता है. जब मेरे पास रौशनी नहीं होती, तो मैं डंडा लेकर उनके साथ जाता हूँ. मुझे नहीं पता कि और क्या करूँ.”
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने संकट से निपटने के प्रयासों के तहत, स्थानीय नगरपालिकाओं के साथ मिलकर ग़ाज़ा पट्टी में चूहों और कीट-पतंगों से निपटने के लिए एक व्यापक योजना शुरू करने की घोषणा की है. अस्पतालों, स्कूलों और आश्रय स्थलों को भारी नुक़सान पहुँचने के बाद यह क़दम उठाया गया है.
फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) की टीमें भी विस्थापन शिविरों और आश्रय स्थलों में बदले गए स्कूलों में सफ़ाई और कीटनाशक छिड़काव अभियान चला रही हैं. चेतावनी दी गई है कि अगर कचरे और बुनियादी ढाँचे का संकट जारी रहा, तो स्वास्थ्य जोखिम और बढ़ सकते हैं.