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तेल की बढ़ती क़ीमतें बदल सकती हैं प्लास्टिक अर्थव्यवस्था की दिशा

प्लास्टिक बैग पर चुपचाप नजरें दौड़ाने वाले और 'बेहतर विकल्प चुनें' लिखे सफेद अक्षरों वाले एक काले टोथ बैग का क्लोज-अप।
© Unsplash/Brett Wharton एक काला थैला, जिस पर सफ़ेद अक्षरों में लिखा है: ‘बेहतर विकल्प चुनें’.

तेल की बढ़ती क़ीमतें बदल सकती हैं प्लास्टिक अर्थव्यवस्था की दिशा

जलवायु और पर्यावरण

भूराजनैतिक उथल-पुथल के बीच तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं. ऐसे में जलवायु परिवर्तन से जुड़े उस मुद्दे पर ध्यान बढ़ रहा हैजिसे अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है. यह मुद्दा है प्लास्टिक का उत्पादन, जो जीवाश्म ईंधनों के साथ गहराई से जुड़ा है.

प्लास्टिक के अधिकांश पारम्परिक उत्पाद, तेल और गैस से बनाए जाते हैं, और हाल के दिनों में मध्य पूर्व में होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बन्द होने के कारण इनके उत्पादन की लागत बढ़ी है. 

मतलब यह कि जब इन कच्चे माल की क़ीमतें बढ़ती हैं, तो प्लास्टिक बनाना भी अक्सर महँगा हो जाता है. इससे प्लास्टिक का अनावश्यक इस्तेमाल घटाने, पुन: उपयोग की प्रणालियाँ बढ़ाने, और ऐसे विकल्पों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है, जिनमें कार्बन उत्सर्जन कम हो और पर्यावरण को कम नुक़सान पहुँचे.

जनवरी 2023 से अप्रैल 2026 तक होर्मज़ जलडमरूमध्य में व्यवधानों के ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतों और प्लास्टिक रेजिन सूचकांकों पर प्रभाव को दर्शाने वाला रेखा चार्ट, जिसमें 2026 की शुरुआत में कीमतों में वृद्धि देखी गई।
© UNCTAD होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बन्द होने से तेल और प्लास्टिक की क़ीमतें बढ़ी हैं.

यह क्यों अहम है?

दुनिया की प्लास्टिक अर्थव्यवस्था केवल कचरे से जुड़ा मुद्दा नहीं है. यह जलवायु से जुड़ा मुद्दा भी है.

प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल का मतलब है अधिक प्लास्टिक प्रदूषण. 

इससे न केवल पृथ्वी की जैव विविधता को गम्भीर नुक़सान पहुँचता है, बल्कि जलवायु परिवर्तन की समस्या भी और गहरी होती है.

तेल की क़ीमतें, प्लास्टिक और जलवायु परिवर्तन

प्लास्टिक मुख्य रूप से तेल और प्राकृतिक गैस से प्राप्त पैट्रोकैमिकल्स से बनाए जाते हैं.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, प्लास्टिक अपने पूरे जीवनचक्र के दौरान, हानिकारक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पैदा करते हैं - कच्चे माल के निष्कर्षण और शोधन से लेकर उत्पादन, परिवहन और निपटान तक.

UNEP का कहना है कि अगर प्लास्टिक उत्पादन अनियंत्रित रूप से बढ़ता रहा, तो जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने वाली हानिकारक गैसों में भी वृद्धि हो सकती है.

सुमगाइट, अजरबैजान में सोकार पॉलिमर पॉलीप्रोपाइलीन संयंत्र का बाहरी दृश्य, जिसमें एक नीले आकाश के सामने औद्योगिक टावर और पाइपलाइनें दिखाई दे रही हैं।
© Wikipedia/Vugar Amrullayev अज़रबैजान में स्थित इस तरह के प्लास्टिक संयंत्र जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर हैं.

प्लास्टिक का इस्तेमाल कहाँ होता है और कहाँ बदलाव सम्भव है?

प्लास्टिक का इस्तेमाल दुनिया भर में इसलिए व्यापक है, क्योंकि वे सस्ते, टिकाऊ, हल्के और कई कामों में उपयोगी होते हैं.

  • प्लास्टिक का सबसे बड़ा हिस्सा पैकेजिंग में इस्तेमाल होता है, जैसेकि खाद्य पदार्थों के लिफ़ाफे (wrappers), बोतलें, ख़रीदारी के थैले और एक बार इस्तेमाल होने वाले डिब्बे. इन्हें बदलना सबसे आसान है.
  • निर्माण क्षेत्र में भी प्लास्टिक का बड़ा इस्तेमाल होता है, जैसेकि पाइप, इंसुलेशन, फ़र्श और खिड़की के फ़्रेम. इनमें कुछ हद तक विकल्प अपनाए जा सकते हैं.
  • उपभोक्ता वस्तुओं और कपड़ों में भी बड़ी मात्रा में प्लास्टिक इस्तेमाल होता है, जैसे पॉलिएस्टर कपड़े, खिलौने, फ़र्नीचर और घरेलू सामान. इनमें बदलाव की सम्भावना मिली-जुली है.
  • परिवहन और इलैक्ट्रॉनिक्स में भी प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है, जैसेकि वाहनों के पुर्ज़े और इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों के हिस्से. इन्हें जल्दी बदलना कठिन है.
  • चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों, जैसे सिरिंज, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और कीटाणुरहित पैकेजिंग को ग़ैर-प्लास्टिक विकल्पों से बदलना कठिन है. इनमें बदलाव की सम्भावना कम है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, “हमें यह दोबारा सोचने की ज़रूरत है कि हम प्लास्टिक का उत्पादन, इस्तेमाल और निपटान किस तरह करते हैं.”

पीली टोपियों वाली प्लास्टिक सोडा बोतलों की पंक्तियाँ, कुछ खुली और कुछ बंद, गहरे कार्बोनेटेड तरल से भरी हुई हैं।
© Unsplash/Arshad Pooloo पेय पदार्थों की बोतलों जैसे कई प्लास्टिक उत्पाद, केवल एक बार इस्तेमाल के लिए बनाए जाते हैं.

तो कौन-से प्लास्टिक वास्तव में बदले जा सकते हैं?

यह समझने की मुख्य कसौटी है - प्लास्टिक का इस्तेमाल, ज़रूरत के लिए हो रहा है, या केवल सुविधा के लिए.

  • दुनिया के लगभग एक-तिहाई प्लास्टिक को आसानी से बदला जा सकता है. कई देशों ने पहले ही ख़रीदारी के प्लास्टिक थैले और बर्तनों पर प्रतिबन्ध लगाने वाले क़ानून बनाए हैं, ताकि लोग पुन: उपयोग में आने वाले थैले लेकर ख़रीदारी करें और धातु या लकड़ी से बने चम्मच, काँटे, छुरी का इस्तेमाल करें.
  • तेल की क़ीमतें बढ़ने पर ये बदलाव अक्सर आर्थिक रूप से भी अधिक आकर्षक हो जाते हैं. 
  • दुनिया के लगभग एक-तिहाई प्लास्टिक को आंशिक रूप से बदला जा सकता है. इनमें कपड़े, निर्माण सामग्री और फ़र्नीचर शामिल हैं. लेकिन हर विकल्प बेहतर हो, यह ज़रूरी नहीं. कुछ मामलों में विकल्पों से कुल पर्यावरणीय नुक़सान बढ़ सकता है, ख़ासतौर पर उत्सर्जन या वनों की कटाई के कारण.
  • कुछ प्लास्टिक को बदलना बहुत कठिन है, क्योंकि उनका इस्तेमाल महत्वपूर्ण तकनीकी ज़रूरतों के लिए होता है. इनमें चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और बिजली के उपकरणों के पुर्ज़े शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, “इसका जवाब सभी तरह के प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध लगाना नहीं है, बल्कि अनावश्यक, टाले जा सकने वाले और समस्या पैदा करने वाले प्लास्टिक को समाप्त करना है.”

यह याद रखना ज़रूरी है कि हर प्लास्टिक समान रूप से हानिकारक नहीं होता.

  • प्लास्टिक इंसुलेशन, इमारतों से होने वाले उत्सर्जन को कम कर सकता है.
  • वाहनों में हल्के प्लास्टिक पुर्ज़े, ईंधन की खपत घटा सकते हैं.
सूडान में एल ओबेइड मैटरनिटी हॉस्पिटल में सूडान में लाल हिजाब पहने एक मिडवाइफ सूडान में एल ओबेइड मैटरनिटी हॉस्पिटल के एक इनक्यूबेटर में एक नवजात शिशु की निगरानी करती है। अस्पताल ने 2026 में केवल चार बिस्तरों के साथ एक नई नवजात इकाई खोली, जिससे क्षमता विस्तार की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया।
© UNFPA/Sufian Abdulmouty चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक उपकरणों की जगह गैर-प्लास्टिक विकल्प अपनाना मुश्किल है.

तेल की ऊँची क़ीमतें अनुकूलन को बढ़ावा दे सकती हैं

जैसे-जैसे नया, यानि वर्जिन प्लास्टिक महँगा होता है:

  • ज़रूरत से ज़्यादा पैकेजिंग करना महँगा हो जाता है, इसलिए कम्पनियाँ सस्ते और टिकाऊ विकल्प तलाश करने लगती हैं.
  • भोजन के डिब्बों जैसी एक बार इस्तेमाल होने वाली वस्तुएँ भी सस्ते विकल्प नहीं रह जाते. ऐसे में उनकी जगह दोबारा इस्तेमाल की जा सकने वाली चीज़ें, जैसेकि काँच की बोतलें या दोबारा भरने योग्य डिब्बे अपनाना ज़्यादा व्यावहारिक हो सकता है.
  • जब प्लास्टिक महँगा होता है, तो प्लास्टिक पर प्रतिबन्धों और शुल्कों को जनता का समर्थन मिलना आसान हो सकता है. साथ ही, री-सायकलिंग व पुन: उपयोग के आर्थिक लाभ भी अधिक स्पष्ट दिखने लगते हैं.

UNEP के अनुसार, “पुन: उपयोग बाज़ार में बदलाव लाने के सबसे शक्तिशाली तरीक़ों में से एक है.”

प्लास्टिक की बोतलों, कार्टन और कंटेनरों सहित विभिन्न पुनर्चक्रणीय वस्तुओं से भरा एक पारदर्शी प्लास्टिक रीसायकलिंग बैग, जिस पर जोहान्सबर्ग रीसायकलिंग गाइड दिखाई दे रहा है।
© Unsplash/Calvin Sihongo दक्षिण अफ़्रीका के जोहानिसबर्ग शहर में री-सायक्लिंग के लिए प्लास्टिक इकट्ठा किया जा रहा है.

निष्कर्ष

प्लास्टिक की व्यापक ज़रूरत, जीवाश्म ईंधनों की मांग को बनाए रख सकती है, लेकिन तेल की ऊँची क़ीमतें बदलाव को तेज़ करने वाला एक छिपा हुआ कारण भी बन सकती हैं.

जीवाश्म ईंधन से बनने वाला प्लास्टिक, जैसे-जैसे महँगा होता है, देशों के सामने एक व्यावहारिक रास्ता खुलता है:

  • सबसे पहले अनावश्यक प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना.
  • पुन: उपयोग और रीफ़िल प्रणालियों को बढ़ाना.
  • जहाँ सही हो, वहाँ प्लास्टिक के विकल्प अपनाना.
  • जिन आवश्यक प्लास्टिक उत्पादों का इस्तेमाल जारी रहना है, उनके उत्पादन को कार्बन-मुक्त बनाना.

इस तरह, प्लास्टिक केवल कचरे की कहानी नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है.