लेबनान में युद्धविराम के बावजूद मौतें, डर और ख़तरे बरक़रार
लेबनान में 17 अप्रैल को लेबनान और इसराइल के दरम्यान युद्धविराम लागू होने के बावजूद, मौत और विनाश का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, और ऐसे ख़तरनाक हालात में लोग अपने घरों को वापिस में लौटने में असमर्थ हैं. युद्धविराम लागू होने के बावजूद, 17 अप्रैल के बाद से भी 380 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है.
संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता एजेंसियों ने को कहा है कि देश के बड़े हिस्सों में घरों और सार्वजनिक सेवाओं को “व्यापक विनाश” झेलना पड़ा है, जिससे लाखों लोग प्रभावित हुए हैं.
लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) की प्रतिनिधि कैरोलिना लिंडहोल्म बिलिंग ने बताया है, “लेबनान के दक्षिणी हिस्से और बेका (घाटी) के कुछ हिस्सों में लोग, पहले की तरह ही अपने जीवन के लिए डर में जी रहे हैं. साथ ही और अधिक लोग पलायन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं…दक्षिणी इलाक़े में जिन क्षेत्रों पर इसराइली सेना का नियंत्रण है, वहाँ अनेक विस्थापित लोगों को वापिस लौटने की अनुमति नहीं दी जा रही है.”
कैरोलिना लिंडहोल्म बिलिंग ने बताया कि उन्होंने उन परिवारों से मुलाक़ात की है जो अमेरिका की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम के बाद, नाबातियेह और टायर में स्थित अपने घरों को वापिस लौटने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वहाँ उन्हें व्यापक तबाही का सामना करना पड़ा.
उन्होंने कहा, “वे लोग, अपने घरों को पूरी तरह नष्ट देखकर, पहले से भी अधिक टूट गए. एक व्यक्ति ने मुझे अपने फ़ोन में, अपने ध्वस्त घर की तस्वीर दिखाई. वह अब एक कमरे के फ़र्श पर ‘स्लीपिंग बैग’ में रह रहा है."
"इस स्थान को लोगों के लिए सामूहिक आश्रय के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है और उस व्यक्ति के पास वापिस लौटने के लिए कुछ भी नहीं बचा है और उसका भविष्य बेहद अनिश्चित है.”
आम लोगों की सुरक्षा की गारंटी ज़रूरी
अन्तरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के तहत नागरिकों और आपातकालीन कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित है, लेकिन इसके बावजूद ग़ैर-लड़ाकों को निशाना बनाया जा रहा है और वे हर दिन मारे जाने के डर में जी रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र के साझीदार संगठन अन्तरराष्ट्रीय रैडक्रॉस और रैड क्रैसेंट सोसायटीज़ महासंघ (IFRC) के प्रवक्ता टोमासो डेला लोंगा का कहना है, “मैं लेबनानी रैडक्रॉस स्वयंसेवकों का एक स्पष्ट सन्देश साझा करना चाहता हूँ: वे सुरक्षा की मांग कर रहे हैं.”
उन्होंने पिछले सप्ताह स्वयंसेवी पैरामैडिक्स के साथ मुलाक़ात की थी जिसके बाद कहा कि “हर बार जब वे ऐम्बुलैंस मिशन पर निकलते हैं, तो एक-दूसरे को गले लगाकर अलविदा कहते हैं, इस भय के साथ कि वे सुरक्षित वापिस लौटेंगे भी या नहीं.”
पिछले दो महीनों में, लेबनान के दक्षिणी हिस्से में आपातकालीन कॉल पर कार्रवाई करते समय, IFRC - लेबनान के दो पैरामैडिक्स - यूसुफ़ अस्साफ़ और हसन बदावी - की मौत हो गई.
डेला लोंगा ने कहा, “रैडक्रॉस स्वयंसेवकों को एक सामान्य दुनिया में, ऐम्बुलेंस में सुरक्षा जैकेट और हैलमेट पहनने की ज़रूरत नहीं होती; ऐम्बुलैंस का प्रतीक उन्हें सुरक्षा देने के लिए पर्याप्त होना चाहिए. लेकिन यह सामान्य दुनिया नहीं है. लेबनान में, यूसुफ़ और हसन, लोगों की जान बचाते हुए मारे गए. न तो ऐम्बुलैंस का प्रतीक उन्हें बचा सका और न ही उनका सुरक्षा उपकरण.”
मुश्किलों के बावजूद सहायता जारी
इसराइल और हिज़बुल्लाह के बीच फिर से भड़के युद्ध के कारण, लेबनान भर में क़रीब 18 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं.
28 फ़रवरी को ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले शुरू होने के बाद कुछ दिन बाद, 2 मार्च को हिज़बुल्लाह और इसराइली सेना के बीच लड़ाई भड़क उठी थी.
यूएन शरणार्थी एजेंसी - UNHCR के अनुसार, दक्षिणी लेबनान के जिन इलाक़ों में, इसराइली सेना का नियंत्रण है, वहाँ हज़ारों लोग अब भी फँसे हुए हैं.
लिंडहोल्म बिलिंग ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता क़ाफ़िले लिटानी नदी के दक्षिण में दुर्लभ इलाक़ों में सहायता पहुँचाना जारी रखे हुए हैं, लेकिन “पहुँच एक बड़ी चुनौती है” और लोगों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना बेहद मुश्किल बना हुआ है.
IFRC के डेला लोंगा ने ज़ोर देकर कहा, “अपने घरों से निकाले गए परिवार, केवल नुक़सान की नहीं, बल्कि अपनी गरिमा के छिन जाने की भी बात करते हैं.”
गरिमा की बहाली “सहायता कार्रवाई का एक केन्द्रीय तत्व” है. सहायता पहुँचाना ज़रूरी है, लेकिन “लोगों की बात सुनना, उन्हें शामिल महसूस कराना और उन्हें एक-दूसरे की मदद करने में सक्षम बनाना” भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
उन्होंने कहा कि युद्धविराम “न तो जीवनयापन के साधन बहाल कर पाया है और न ही पानी, भोजन या स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी ज़रूरतों की गारंटी देता है.”