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भारत: मध्य प्रदेश में घर-घर स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए अथक प्रयास

सहायक मिडवाइफ़ सुमन तोमर के साथ अंशु और विकास शर्मा, जो अपने पहले बच्चे अद्विक को नियमित टीकाकरण के लिए लाए हैं.
© WHO India/Sanchita Sharma सहायक मिडवाइफ़ सुमन तोमर के साथ अंशु और विकास शर्मा, जो अपने पहले बच्चे अद्विक को नियमित टीकाकरण के लिए लाए हैं.

भारत: मध्य प्रदेश में घर-घर स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए अथक प्रयास

स्वास्थ्य

भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में दूर-दराज़ गाँवों से लेकर व्यस्त अस्पतालों तकस्वास्थ्यकर्मी यह सुनिश्चित करने के प्रयास कर रहे हैं कि टीकेमातृ स्वास्थ्य सेवाएँ और ज़रूरी देखभाल उन परिवारों तक पहुँचेजो अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं से छूट जाते हैं. स्वास्थ्यकर्मी कठिन रास्तों पर चलकर अतिरिक्त दूरियाँ तय करके, स्वास्थ्य सेवाएँ, घर-घर पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश की दूर-दराज़ बस्तियों और व्यस्त स्वास्थ्य केन्द्रों में, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ उन स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत से लोगों तक पहुँच रही हैं, जो सचमुच अतिरिक्त दूरियाँ तय करते हैं.

ग्वालियर के घाटीगाँव में, सहायक नर्स दाई दीपा गौर और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी सोनिया शाक्य वैक्सीन कैरियर लेकर पुरनपुरा गाँव तक लगभग दो किलोमीटर पैदल जाती हैं. रास्ता पथरीला है, सड़क कच्ची है और गर्मी तेज़, लेकिन उनके लिए यह रोज़मर्रा के काम का हिस्सा है.

इस रास्ते के अन्त में केवल 25 परिवारों की एक छोटी-सी बस्ती है - नक़्शे पर जिसे आसानी से नज़रअन्दाज़ किया जा सकता है, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए नहीं.

उस दिन, आठ महीने के बच्चे रौनक आदिवासी को उसकी बुआ टीकाकरण के लिए लेकर आई थीं, क्योंकि उसके माता-पिता खेतों में दिहाड़ी मज़दूरी करने गए थे. रौनक को भारत सरकार के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत निर्धारित टीके लगाए गए.

दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर परिवारों के लिए स्वास्थ्य केन्द्र जाना, एक दिन की आमदनी खोने जैसा हो सकता है. ऐसे में ये सत्र, ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाओं को उनके घरों के नज़दीक लाते हैं और यह भरोसा दिलाते हैं कि स्वास्थ्य देखभाल हर परिवार तक पहुँचेगी.

भीड़ भरे अस्पतालों में मातृ स्वास्थ्य सेवा

कई किलोमीटर दूर, मुरैना के बनमोर सिविल अस्पताल में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने का काम जारी है.

महीने में एक बार यहाँ प्रसव-पूर्व देखभाल क्लीनिक आयोजित किया जाता है, जहाँ लगभग 60 गर्भवती महिलाएँ मुफ़्त जाँच, रक्त परीक्षण और अल्ट्रासाउंड कराने के लिए आती हैं. इनमें से कई महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान पहली बार ऐसी सेवाएँ मिलती हैं.

समर्पित स्वास्थ्यकर्मी, टीकाकरण, मातृ स्वास्थ्य सेवाएँ और भरोसेमन्द देखभाल हर घर तक पहुँचा रहे हैं.
© WHO India/Sanchita Sharma समर्पित स्वास्थ्यकर्मी, टीकाकरण, मातृ स्वास्थ्य सेवाएँ और भरोसेमन्द देखभाल हर घर तक पहुँचा रहे हैं.

वरिष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉक्टर आभा सिंह राठौड़ की देखरेख में, यह क्लीनिक उच्च-जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान और निगरानी करता है. हर महीने आमतौर पर ऐसे 10 से 12 मामले सामने आते हैं. समय पर जोखिमों की पहचान और देखभाल, जटिलताओं को कम करने और सुरक्षित गर्भावस्था में मदद कर सकती है.

महिला वार्ड में, डॉक्टर सुरेन्द्र सिंह गुर्जर और डॉक्टर राठौड़ नई माताओं और नवजात शिशुओं की जाँच करते हैं. उन्हीं में प्रीति सोलंकी भी हैं, जो अपनी चार दिन की बेटी को गोद में लिए हुए हैं.

इस अस्पताल में हर महीने 70 से 80 प्रसव होते हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में लोगों के बढ़ते भरोसे का प्रतीक हैं.

जाँच, भरोसा और निरन्तर देखभाल

अस्पताल की प्रयोगशाला भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं में अहम भूमिका निभा रही है. तकनीशियन आशुतोष शर्मा एक पूरी तरह स्वचालित बायोकैमिस्ट्री एनालाइज़र चलाते हैं, जो दो घंटे से कम समय में दर्जनों नमूनों की जाँच कर सकता है.

लिवर और किडनी से लेकर मधुमेह के लिए एचबीए1सी जाँच तक, यह प्रयोगशाला समय पर निदान में मदद करती है. इससे डॉक्टरों को भरोसेमन्द जाँच परिणामों के आधार पर इलाज से जुड़े निर्णय लेने में सहायता मिलती है.

लेकिन बदलाव का सबसे बड़ा संकेत समुदाय का बढ़ता भरोसा है.

सहायक नर्स मिडवाइफ़ दीपा गौर, नियमित टीकाकरण सत्र के दौरान आठ महीने के रौनक आदिवासी को टीका लगाती हुई.
© WHO India/Sanchita Sharma सहायक नर्स मिडवाइफ़ दीपा गौर, नियमित टीकाकरण सत्र के दौरान आठ महीने के रौनक आदिवासी को टीका लगाती हुई.

अंशु और विकास शर्मा अपने शिशु पुत्र अद्विक को नियमित टीकाकरण के लिए लाते हैं. उनके लिए यह प्रक्रिया सहज, परिचित और भरोसेमन्द है. 

सहायक नर्स मिडवाइफ़ सुमन तोमर, लगभग 10 हज़ार लोगों को सेवाएँ देती हैं, वह बच्चों के टीकाकरण का रिकॉर्ड सावधानी से रखती हैं. वह टीकाकरण की तारीख़ से पहले अभिभावकों को एसएमएस भेजती हैं और ज़रूरत पड़ने पर फ़ोन पर भी उपलब्ध रहती हैं.

शर्मा परिवार जैसे कई परिवारों के लिए यह निरन्तर देखभाल बहुत मायने रखती है.

ग्वालियर में बैंक में काम करने वाले विकास शर्मा कहते हैं, “घर के नज़दीक सेवाएँ उपलब्ध हैं, हमें सहायक नर्स मिडवाइफ़ पर भरोसा है, और सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई दवाओं की गुणवत्ता अच्छी है. इससे निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं पर हमारी निर्भरता कम हुई है.”

नियमित टीकाकरण को तकनीकी सहयोग

भारत सरकार के इन प्रयासों को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य समर्थन नैटवर्क का सहयोग मिल रहा है. इसकी तकनीकी और फ़ील्ड टीमें, नियमित टीकाकरण को मज़बूत करने के लिए सरकार के विभिन्न स्तरों के साथ मिलकर काम करती हैं.

इस सहयोग में रोग निगरानी, बीमारियों के प्रकोप की शुरुआती पहचान, प्रयोगशाला नैटवर्क का समन्वय और ज़मीनी स्तर पर त्वरित कार्रवाई शामिल है. इन प्रयासों ने भारत को पोलियो-मुक्त स्थिति बनाए रखने, ख़सरा-रूबेला उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ने और टीके से रोकी जा सकने वाली बीमारियों की निगरानी मज़बूत करने में मदद की है.

ये प्रयास, वैक्सीन की ख़ुराकों से वंचित बच्चों तक पहुँचने की योजना, वैक्सीन सुरक्षा निगरानी और जवाबदेही व्यवस्था को मज़बूत करने में भी मदद करते हैं, ताकि टीकाकरण सेवाएँ वंचित समुदायों तक पहुँच सकें और नए स्वास्थ्य जोखिमों का समय पर जवाब दिया जा सके.

मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएँ अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं - कहीं गाँव की पथरीली पगडंडी पर, कहीं प्रसव-पूर्व देखभाल क्लीनिक में, कहीं अस्पताल के वार्ड में, तो कहीं प्रयोगशाला में. लेकिन इन सबके केन्द्र में एक ही बात है - सार्वजनिक स्वास्थ्य रोज़मर्रा की प्रतिबद्धता से बनता है.

यह प्रतिबद्धता वैक्सीन के बक्सों में ढोई जाती है, मरीज़ों के रजिस्टरों में दर्ज होती है, और उन परिवारों के बढ़ते भरोसे में दिखाई देती है, जिन्हें अब विश्वास है कि स्वास्थ्य सेवाएँ उन तक पहुँच सकती हैं - चाहे वे कहीं भी रहते हों.