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भारत: चित्रकथा से रंगमंच तक, लड़कियों को मिली नई आवाज़

भारत के रांची में केजीबीवी स्कूल में सबिता कुमारी और निकिता कुमारी आधा फ़ुल कॉमिक्स पढ़ती हुईं.
© UNICEF/Anindito Mukherjee भारत के रांची में केजीबीवी स्कूल में सबिता कुमारी और निकिता कुमारी आधा फ़ुल कॉमिक्स पढ़ती हुईं.

भारत: चित्रकथा से रंगमंच तक, लड़कियों को मिली नई आवाज़

महिलाएँ

भारत के झारखंड प्रदेश में सरकारसंयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) और साझीदारों की एक रचनात्मक पहलकिशोरियों को आत्मविश्वास से आगे बढ़ने में मदद कर रही है. यह पहल किशोरियों को हानिकारक लैंगिक धारणाओं को चुनौती देने और अपनी आवाज़ पहचानने का अवसर देती है.

सोलह वर्षीय निकिता कुमारी अपने सहपाठियों के बीच बने घेरे के केन्द्र में पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ी होती हैं. संवाद पूरा होते ही वह पीछे हटती हैं, और माहौल, सहपाठियों व अभिभावकों की तालियों से गूंज उठता है.

लम्बे क़द वाली और खेल-कूद में सक्रिय निकिता, एक साल पहले तक मंच पर आने से झिझकती थीं. जब उन्होंने पहली बार अभिनय शुरू किया, तो उन्हें “राक्षस” की भूमिका मिली थी.

वह याद करती हैं, “शुरू में मुझे इससे कोई परेशानी नहीं थी. लेकिन जब कुछ लड़कियों ने मेरी लम्बाई को लेकर चिढ़ाया और कहा कि यह भूमिका मेरे लिए बिल्कुल सही है, तो मुझे बहुत बुरा लगा. उनकी बातों से मुझे लगा कि काश मैं थोड़ी छोटी या पतली होती.”

लेकिन यह अनुभव उन्हें चुप कराने के बजाय, उनके भीतर बदलाव की शुरुआत बन गया.

कुछ समय बाद निकिता को ‘आधा फुल’ चित्रकथा पुस्तक के मंच रूपान्तरण में ‘अदरक’ नामक एक जीवन्त किरदार निभाने का अवसर मिला. 

यह चित्रकथा पुस्तक, सरकार के सहयोग और यूनीसेफ़ के ‘डव सेल्फ़-एस्टीम’ कार्यक्रम के साथ साझेदारी के तहत विकसित की गई है. इसका उद्देश्य बच्चों में आत्मसम्मान बढ़ाना, उन्हें अपनी पहचान पर गर्व करना सिखाना, और यह समझाना है कि असली ताक़त ख़ुद को स्वीकार करने में है.

निकिता कहती हैं, “इस नाटक ने सब कुछ बदल दिया. इसकी कहानी ने मुझे गहराई से छुआ. रिहर्सल के दौरान मुझे ऐहसास हुआ कि हर व्यक्ति की शारीरिक बनावट और व्यक्तित्व अलग कहानी कहती है. फिर मैं अपनी कहानी के लिए शर्मिन्दा क्यों महसूस करूँ ?”

झारखंड के रांची स्थित केजीबीवी कानके की सोलह वर्षीय निकिता कुमारी एक स्कूल कार्यक्रम के दौरान जिम के अंदर एक ट्रेडमिल पर बैठी हैं।
© UNICEF/Anindito Mukherjee भारत के झारखंड राज्य के रांची ज़िले के कांके में अपने स्कूल के भीतर 16 वर्षीय निकिता कुमारी.

पन्नों से मंच तक

‘आधा फुल’ कॉमिक श्रृँखला में, रंगीन एवं प्रभावशाली कहानियों के ज़रिए, किशोरों के जीवन, सामाजिक दबावों और आत्मविश्वास से जुड़े मुद्दों को पेश किया गया है. इसे मूल रूप से साक्षरता और जीवन-कौशल संसाधन के रूप में तैयार किया गया था.

झारखंड के KGBV Kanke विद्यालय में वार्डन और शिक्षकों ने इन कहानियों को केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें मंच पर उतारने का फ़ैसला किया. एक छोटे से प्रयोग के रूप में शुरू हुई यह पहल, अब ऐसे नाट्य प्रदर्शनों में बदल गई है, जो राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुँच रहे हैं.

हिन्दी शिक्षिका बिन्दु सिंह कहती हैं, “ये नाटक कमरे में मौजूद हर व्यक्ति से बात करते हैं. हम इन्हें अभिभावक-शिक्षक बैठकों में भी प्रस्तुत करते हैं, ताकि माता-पिता बच्चों के साथ सीख सकें और यह देख सकें कि उनकी बेटियाँ कितनी मज़बूत व आत्मविश्वासी बन रही हैं.

आत्मविश्वास की संस्कृति

स्कूल में ये नाटक अब एक परम्परा बन चुके हैं. वरिष्ठ छात्राएँ छोटी कक्षाओं की छात्राओं को प्रशिक्षण देती हैं, स्कूल छोड़ने से पहले उन्हें अपनी पोशाकें सौंपती हैं, और नए नाटकों में पात्रों को लेकर आपस में चर्चा करती हैं.

बिन्दु सिंह मुस्कुराते हुए कहती हैं, “हर पात्र का अपना प्रशंसक समूह है. लड़कियाँ अपने पसन्दीदा नायकों की भूमिका निभाने के लिए उत्साहित रहती हैं.”

निकिता के लिए यह सहयोग और मार्गदर्शन, तालियों जितना ही महत्वपूर्ण रहा है. वह अपने गाँव गागी लौटकर ये कहानियाँ दोस्तों और पड़ोसियों को सुनाती हैं, और उनसे मिले सबक़ अपने शब्दों में समझाती हैं.

वह कहती हैं, “अब जब कोई मुझे चिढ़ाता है, तो मैं उन्हें ‘आधा फुल’ में सीखी बात याद दिलाती हूँ. तब वे ठिठककर सोचने लगते हैं.”

झारखंड के रांची ज़िले के कांके में केजीबीवी कांके की छात्राएँ, स्कूल वार्डन और प्रधानाचार्य अंजलि गांगुली द्वारा संचालित विशेष डिजिटल कक्षा में भाग लेती हुईं.
© UNICEF/Anindito Mukherjee झारखंड के रांची ज़िले के कांके में केजीबीवी कांके की छात्राएँ, स्कूल वार्डन और प्रधानाचार्य अंजलि गांगुली द्वारा संचालित विशेष डिजिटल कक्षा में भाग लेती हुईं.

मंच से आगे की उड़ान

यह बदलाव केवल रंगमंच तक सीमित नहीं है. जो छात्राएँ पहले कक्षा में हाथ उठाने से झिझकती थीं, वे अब खुलकर बोलती हैं और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती हैं. अभिभावक भी बताते हैं कि उनकी बेटियाँ अब अपनी शिक्षा और भविष्य को लेकर अधिक आत्मविश्वासके साथ बात करती हैं.

बिन्दु सिंह कहती हैं, “नाटक ने उन्हें सार्वजनिक रूप से बोलने की आवाज़ दी है.”

निकिता अब पुलिस सेवा में जाकर अन्याय के ख़िलाफ़ काम करना चाहती हैं.

वह कहती हैं, “मुझे मालूम है कि जब लोग आपके साथ अन्याय करते हैं, तो कैसा महसूस होता है. अब मैं झुकती नहीं हूँ. मैं डटकर खड़ी होती हूँ.”

चित्रकथा पुस्तकों की कहानियाँ अब, डव और यूनीसेफ़ की साझेदारी के ज़रिए पन्नों से निकलकर मंच तक पहुँच रही हैं. इनके माध्यम से झारखंड की लड़कियाँ रूढ़ीवादी धारणाओं को चुनौती दे रही हैं और अपने भविष्य की कहानी ख़ुद लिख रही हैं.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.