भारत: शहरी बस्तियों में छूट गए बच्चों को वैक्सीन के दायरे में लाने की कोशिश
भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में स्थित गौतम बुद्ध नगर ज़िले में, स्वास्थ्य अधिकारी, नर्सिंग कॉलेज और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) मिलकर उन बच्चों और गर्भवती महिलाओं की पहचान कर रहे हैं, जो अब तक टीकाकरण रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे.
भारत के तेज़ी से बढ़ते शहरों में टीकाकरण टीमों के सामने एक बड़ी चुनौती है: उन अनौपचारिक शहरी बस्तियों में हर बच्चे तक पहुँचना, जहाँ परिवार अक्सर जगह बदलते हैं, कई घर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होते, और कई समुदाय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित पहुँच से बाहर रह जाते हैं.
गौतम बुद्ध नगर में, ज़िला अधिकारियों ने इस चुनौती से निपटने के लिए पारम्परिक स्वास्थ्य तंत्र से आगे बढ़कर नए साझीदारों को साथ जोड़ा.
नर्सिंग छात्र बने अहम साझीदार
ज़िले की टीकाकरण रणनीति में पाँच स्थानीय नर्सिंग कॉलेजों को अहम साझीदार बनाया गया. क़रीब 300 नर्सिंग छात्रों को चिन्हित शहरी इलाक़ों में भेजा गया, जहाँ उन्होंने घर-घर जाकर परिवारों की जानकारी जुटाई और टीकाकरण के लिए पात्र बच्चों व गर्भवती महिलाओं की पहचान की.
यह कोई सामान्य सर्वेक्षण नहीं था. ज़िला प्रशासन ने स्थानीय समुदायों के साथ जागरूकता बैठकें कीं, अलग-अलग साझीदारों को साथ लाया और सभी की भूमिकाएँ स्पष्ट कीं. इससे एक समन्वित सार्वजनिक-निजी साझेदारी बनी, जिसने कम समय में ज़िले की कार्यबल क्षमता को बढ़ाया.
समुदायों से सीधे जुड़ने के लिए प्रशिक्षित इन छात्रों ने उन इलाक़ों में अहम भूमिका निभाई, जहाँ पलायन, घनी आबादी और अनौपचारिक बस्तियों के कारण स्वास्थ्य रिकॉर्ड को सही रखना मुश्किल होता है.
WHO का तकनीकी सहयोग
विश्व स्वास्थ्य संगठन - राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य समर्थन नैटवर्क की टीम ने इस पहल को मज़बूत बनाने में महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग दिया.
टीम ने डेटा जुटाने के लिए मानक उपकरण तैयार करने में मदद की और नर्सिंग छात्रों को टीकाकरण, सर्वेक्षण के तरीक़ों और समुदायों के साथ संवाद करने के बारे में प्रशिक्षण दिया.
उन्हें यह भी बताया गया कि घरों तक कैसे पहुँचना है, लोगों का भरोसा कैसे जीतना है, और जानकारी को सही व नैतिक तरीक़े से किस तरह दर्ज करना है.
इससे यह सुनिश्चित हुआ कि जुटाया गया डेटा केवल काग़ज़ी रिकॉर्ड बनकर नहीं रह जाए, बल्कि उसका सीधा इस्तेमाल टीकाकरण योजना में हो.
इस जानकारी से स्वास्थ्यकर्मियों को टीकाकरण सत्रों की जगह तय करने, लक्षित बच्चों और गर्भवती महिलाओं का बेहतर अनुमान लगाने, और संसाधनों को ज़रूरतमन्द इलाक़ों तक पहुँचाने में मदद मिली.
व्यवस्था से छूटे बच्चों की पहचान
इस पहल के नतीजे महत्वपूर्ण रहे. 1 लाख 15 हज़ार से अधिक घरों का सर्वेक्षण किया गया, जिनमें साढ़े 14 हज़ार से अधिक बच्चों और 1,100 गर्भवती महिलाओं की पहचान हुई. यह संख्या पिछले अनुमानों से लगभग तीन गुना अधिक थी.
बेहतर डेटा मिलने के बाद, ज़िले ने अपनी टीकाकरण रणनीति में बदलाव किया. अधिक पलायन वाले इलाक़ों में, कम समय में टीकाकरण कवरेज में 10 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई.
इस प्रगति की वजह एक सरल लेकिन प्रभावी बदलाव था: स्वास्थ्य टीमों को अब इस बात की बेहतर जानकारी थी कि टीकाकरण से छूट गए बच्चे कहाँ हैं, और उन तक किस तरह पहुँचना है.
एक उत्कृष्ट उदाहरण
गौतम बुद्ध नगर की पहल, तेज़ी से बढ़ते शहरी इलाक़ों के लिए एक उपयोगी उदाहरण पेश करती है.
यह अनुभव बताता है कि शहरों में टीकाकरण के लिए केवल पारम्परिक तरीक़े काफ़ी नहीं हैं. पलायन, अनौपचारिक बस्तियों, अधूरे आँकड़ों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी जैसी चुनौतियों के लिए स्थानीय हालात के अनुरूप, अधिक लचीली रणनीतियों की ज़रूरत होती है.
इस पहल ने यह भी दिखाया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने में शैक्षणिक संस्थान अहम भूमिका निभा सकते हैं. नर्सिंग कॉलेजों की भागीदारी से न केवल टीकाकरण प्रयासों को अतिरिक्त सहयोग मिला, बल्कि छात्रों को भी ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य चुनौतियों को समझने का अवसर मिला.
भारत के शहरों का विस्तार जारी रहेगा, और ऐसे में हर बच्चे तक जीवनरक्षक टीके पहुँचाना एक बड़ी ज़िम्मेदारी बनी रहेगी.
गौतम बुद्ध नगर का अनुभव दिखाता है कि मज़बूत स्थानीय नेतृत्व, तकनीकी मार्गदर्शन और समुदाय-आधारित साझेदारियों के ज़रिये जटिल शहरी बस्तियों तक भी प्रभावी ढंग से पहुँचा जा सकता है.
इस तरह, जो बच्चे पहले व्यवस्था की नज़र से ओझल रह जाते थे, अब उनकी पहचान की जा सकती है और उन्हें सुरक्षा के दायरे में लाया जा सकता है.