भारत: अपशिष्ट जल से निकली हरियाली और पौष्टिक भोजन की राह
भारत में दार्जिलिंग की धुन्ध भरी पहाड़ियों में अनियमित बारिश और सूखते जलस्रोतों ने खेतीबाड़ी को मुश्किल बना दिया है. ऐसे में एक सरल और कम-लागत वाला समाधान, कृषक समुदाय के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है, जो अपशिष्ट जल को दोबारा उपयोग में लाकर, खेतों को हरियाली, परिवारों को बेहतर आय और बच्चों को अधिक पौष्टिक भोजन दे रहा है.
42 वर्षीय दावा शेरपा को वह समय आज भी याद है, जब दार्जिलिंग ज़िले के छोटा मंगवा गाँव में उनके खेत सूखे पड़े रहते थे. उनका सपना था कि खेतों में टमाटर, फलियाँ और मिर्च उगें, ताकि परिवार की गुज़र-बसर भी हो और पास के आंगनवाड़ी केन्द्र तक भी ताज़ी सब्जियाँ पहुँच सकें.
लेकिन जलवायु परिवर्तन ने खेती को मुश्किल और अनिश्चित बना दिया. 2013 से 2024 के बीच दार्जिलिंग में भूजल दोहन 6 प्रतिशत से बढ़कर 16.4 प्रतिशत हो गया. जनवरी से जून के बीच कभी तेज़ बारिश, तो कभी पानी की भारी कमी ने खेती की मुश्किलें बढ़ा दीं.
एक स्थानीय समाधान की शुरुआत
इस चुनौती के बीच ही, भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के तहत एक स्थानीय समाधान सामने आया. ग्राम पंचायत प्रधान चाँदनी तमांग ने यूनीसेफ़ और ज़िला प्रशासन द्वारा आयोजित ‘ग्रे वॉटर प्रबन्धन प्रशिक्षण’ में हिस्सा लिया. इसके बाद उन्होंने सरकारी सहयोग से गाँव में इस व्यवस्था को लागू करने की पहल की.
इस प्रणाली के तहत रसोई, बाथरूम और कपड़े धोने के बाद बचने वाले पानी को रेत, बजरी और चारकोल की प्राकृतिक फ़िल्टर व्यवस्था के ज़रिए साफ़ किया जाता है, और फिर उसे खेतों की सिंचाई में इस्तेमाल किया जाता है.
दावा शेरपा ने 2023 में अपनी ज़मीन पर पंचायत की पहली ग्रे वॉटर प्रबन्धन इकाई लगवाकर इस पहल की शुरुआत की. इस इकाई को बनाने में 51 हज़ार रुपए, यानि लगभग 553 अमेरिकी डॉलर की धनराशि ख़र्च हुई. यह राशि स्वच्छ भारत मिशन और 15वें वित्त आयोग के संयुक्त कोष से जुटाई गई.
शुरुआत में कुछ लोगों ने तंज़ कसा. उनका कहना था, “बाथरूम के पानी से फ़सल अच्छी नहीं होगी.” लेकिन दावा शेरपा हतोत्साहित नहीं हुए.
उन्होंने उपचारित पानी को अपने खेतों तक पहुँचाया, और धीरे-धीरे वही ज़मीन फिर से हरी होने लगी. आज यह इकाई 20 घरों से हर हफ़्ते 800 लीटर पानी को फ़िल्टर करके दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाती है.
सन्देह से भरोसे तक
अब इस पहल का असर आसपास के दूसरे किसानों पर भी साफ़ दिखाई देने लगा है. पड़ोसी किसान आरती शेरपा कहती हैं, “मैं बारिश पर निर्भर खेती करती हूँ, इसलिए मानसून के अलावा बाक़ी समय खेती करना बहुत मुश्किल हो जाता है.
"2018 के भूकम्प के बाद से प्राकृतिक झरने सूखने लगे. अगर मुझे भी यह ग्रे वॉटर मिल जाए, तो मैं सर्दियों में भी फ़सल उगा सकती हूँ. इससे मेरी आमदनी बढ़ेगी और खेती पर भरोसा लौटेगा.”
पड़ोसी किसान सुजोय तमांग भी इस तकनीक को भविष्य के लिए उपयोगी मानते हैं. “मैंने इस तकनीक से दावा शेरपा को अच्छी सब्ज़ियाँ उगाते और बाज़ार से अच्छा धन कमाते देखा है. अब मैं भी अपनी ज़मीन पर यह इकाई लगवाकर इसका इस्तेमाल करूँगा. यह तकनीक आने वाले सालों में इस इलाक़े के लिए बहुत काम की साबित होगी.”
समुदाय की बढ़ती भागेदारी का असर यह है कि 2023 के बाद से आसपास के गाँवों में 11 और ग्रे वॉटर प्रबन्धन इकाइयाँ स्थापित की जा चुकी हैं.
महिलाएँ बनीं बदलाव की धुरी
इस पहल ने खेती और पानी से जुड़े कामों में साझेदारी का एक नया तरीक़ा भी सामने रखा है. पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाक़े में, घरों के लिए पानी लाने की ज़िम्मेदारी, लम्बे समय से महिलाओं पर रही है. लेकिन अब यह पहल पुरुषों और महिलाओं के बीच काम को अधिक सन्तुलित ढंग से बाँट रही है.
पुरुष जहाँ जुताई का भारी काम करते हैं, वहीं महिलाएँ बीज बोने, सिंचाई और कटाई तक खेती के पूरे चक्र में अहम भूमिका निभा रही हैं.
इसी सामूहिक प्रयास के दम पर तकलिंग-1 ग्राम पंचायत को पंचायती राज मंत्रालय के सतत विकास लक्ष्य स्थानीयकरण कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय स्तर पर “मॉडल महिला एवं बाल-अनुकूल ग्राम पंचायत” के रूप में मान्यता मिली है.
भोजन थाली में बढ़ी विविधता
इस पहल का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है. इसका सीधा लाभ बच्चों के पोषण तक भी पहुँच रहा है. पड़ोसी किसान दीप्ति राई कहती हैं, “पहले खाने की चीज़ें उगाना मुश्किल था, बच्चों की थाली में पौष्टिक आहार नहीं था. अब उपचारित पानी से हम गर्मी, सर्दी और मानसून, हर मौसम में सब्ज़ियाँ उगा पा रहे हैं."
"अब घर की उगी सब्ज़ियों से ही बच्चों को थाली में पौष्टिक आहार मिलता है. यह सिर्फ़ सब्ज़ियों की खेती नहीं, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य की उम्मीद है.”
दावा शेरपा की मेहनत के नतीजे भी अब साफ़ दिखाई देते हैं. केवल 9 महीनों में वे 5 क्विंटल टमाटर, 6 क्विंटल फलियाँ और 50 किलो मिर्च उगा लेते हैं. इससे उन्हें एक मौसम में लगभग 1 लाख रुपए, यानि लगभग 1085 अमेरिकी डॉलर की आय होती है.
उनकी उगाई सब्ज़ियाँ दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी और कालिम्पोंग के बाज़ारों तक पहुँचती हैं. साथ ही, वे स्थानीय आंगनवाड़ी केन्द्र तक भी जाती हैं, जहाँ 6 वर्ष तक की आयु के बच्चों को पूरक पोषण दिया जाता है.
दो वर्षीय ईशान छेत्री की माँ श्रीजना कहती हैं, “पौष्टिक खाना इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या उगाते हैं. लेकिन इस इलाक़े में पानी हमेशा से एक चुनौती रहा है. अगर उपचारित ग्रे वॉटर से किचन गार्डन में सब्ज़ियाँ उगाई जाएँ, तो आंगनवाड़ी में बच्चों के भोजन में विविधता आएगी. हम माताएँ चाहती हैं कि हमारे बच्चे सिर्फ़ भरपेट नहीं, बल्कि पौष्टिक भोजन खाकर बड़े हों.”
जल संकट के बीच एक मिसाल
दावा शेरपा अब सिर्फ़ एक किसान नहीं रहे, बल्कि इस बदलाव की एक स्थानीय मिसाल बन गए हैं. वह ग्रे वॉटर प्रबन्धन इकाई की रोज़मर्रा की देखरेख करते हैं और गाँव के युवाओं सहित अन्य लोगों को पानी के पुनः उपयोग का महत्व समझाते हैं.
पंचायत प्रधान चाँदनी तमांग इस इकाई के रखरखाव का ख़र्च पंचायत के वार्षिक बजट में शामिल करने की योजना बना रही हैं. साथ ही, ब्लॉक प्रशासन के सहयोग से यह भी समझने की कोशिश की जाएगी कि आंगनवाड़ी में मिलने वाले स्थानीय पौष्टिक भोजन का बच्चों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है.
पानी की बढ़ती क़िल्लत के इस दौर में दार्जिलिंग की यह कहानी दिखाती है कि कम लागत, स्थानीय समझ और सामुदायिक भागेदारी के सहारे बड़ा बदलाव लाया जा सकता है.
जो पानी कभी नाली में बह जाता था, वही आज खेतों को सींच रहा है, परिवारों की आय बढ़ा रहा है और बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की राह बना रहा है.
यह पहल बताती है कि समाधान हमेशा बड़े संसाधनों या जटिल तकनीक से ही नहीं आते. कई बार एक सरल विचार, सामुदायिक इच्छाशक्ति और पानी की हर बून्द की क़द्र ही, बदलाव की सबसे बड़ी ताक़त बन जाती है.
इस कहानी की विस्तृत रूप पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.