भारत: चित्रकथा श्रृँखला से किशोरियों में जागा नया आत्मविश्वास
झारखंड के एक ग्रामीण आवासीय विद्यालय की 18 वर्षीया कृति, जो कभी फ़ोन, धारावाहिकों और विज्ञापनों की दुनिया में खोई रहती थी, आज अन्य लड़कियों को आत्मसम्मान और लैंगिक समानता का महत्व समझा रही है. यह बदलाव "आधा फुल" नामक उस चित्रकथा श्रृँखला से शुरू हुआ, जिसे संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के सहयोग से, किशोरों और किशोरियों में आत्मविश्वास जगाने व नुक़सानदेह लैंगिक रूढ़ियों को पहचानने के लिए तैयार किया गया है.
झारखंड के राँची ज़िले के खूंटी प्रखंड में स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की कक्षा 12 की छात्रा कृति बताती हैं कि दो वर्ष पहले तक उनका जीवन बिल्कुल अलग था.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता था कि मेरा एकमात्र दोस्त मेरा फ़ोन है. मैं घंटों धारावाहिक और विज्ञापन देखती रहती थी. जो भी नई क्रीम या मुँह धोने की चीज़ नज़र आती, तो मुझे उसे ख़रीद लेने की ललक उठती."
कृति की माँ गृहिणी हैं, जबकि उनके पिता एक व्यावसायिक वाहन चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं. कृति के तीन छोटे भाई-बहन भी हैं. इलाक़े के बहुत से किशोरों की तरह उनके पास भी फ़ोन तो था, लेकिन यह समझ नहीं थी कि वह उनकी सोच को कितना प्रभावित कर रहा है.
आईने में एक झलक
यह बदलाव तब शुरू हुआ, जब उनकी एक शिक्षिका ने उन्हें "आधा फुल" से जुड़ी गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया. इस चित्रकथा श्रृँखला की तीन नायिकाएँ, अधरक, किट्टी और तारा, साथियों के दबाव, अवास्तविक सौन्दर्य मानकों, ऑनलाइन सुरक्षा और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दों से जूझती दिखाई देती हैं.
कृति कहती हैं, "आधा फुल पढ़ना मेरे लिए जैसे आईना देखने जैसा था. मैं तुरन्त उसकी मुख्य पात्र से जुड़ गई. मैंने तय कर लिया कि अब मैं फ़िल्मी सितारों और विज्ञापनों के प्रभाव में नहीं आऊँगी. इसने मेरी आँखें खोल दीं."
इस श्रृँखला की एक कहानी, "एक फ़िल्म स्टार का अपहरण", ने उन पर ख़ास असर डाला. उसमें एक ऐसी लड़की की कहानी थी, जो एक चमक-दमक वाली अभिनेत्री की दीवानी हो जाती है.
कृति को उसमें अपनी झलक दिखाई दी.
उन्होंने कहा, "मैं भी फ़िल्मी सितारों और उनके बताए सामान से बहुत प्रभावित रहती थी. जो भी कोई नामी व्यक्ति पहनता या इस्तेमाल करता, वही मुझे भी चाहिए होता था. मैं अपने पिता से बार-बार ऐसी चीज़ें माँगती थी, जिन्हें हम ख़रीदने में असमर्थ थे."
लेकिन कृति ने कहानी और कक्षा में हुई चर्चा के बाद समझा कि विज्ञापन किस तरह लोगों की पसन्द, सोच और इच्छाओं को प्रभावित करते हैं.
अब कृति कहती हैं कि वह कोई भी चीज़ ख़रीदने से पहले उसके बारे में अच्छी तरह सोचती-समझती हैं. वह ख़ुद से छोटी कक्षाओं की छात्राओं से भी कहती हैं कि अनावश्यक सौन्दर्य प्रसाधनों पर पैसा ख़र्च करने के बजाय वही धन, पढ़ाई की वस्तुओं पर लगाया जा सकता है.
उनका कहना है, "असली बात यह है कि इनसान भीतर से कैसा है."
नया आत्मविश्वास
कृति का आत्मविश्वास अब केवल ख़रीदारी की आदतों तक सीमित नहीं है. जो लड़की पहले सबके सामने बोलने से झिझकती थी, वही अब "आधा फुल" की कहानियों पर आधारित प्रस्तुतियाँ करती है. युवाओं की गतिविधियों में उनकी भागेदारी को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है.
वह विद्यालय की छोटी लड़कियों का मार्गदर्शन भी करती हैं. वह उन्हें समझाती हैं कि किसी का मज़ाक उड़ाना या उसे तंग करना, उसके मन पर गहरी चोट पहुँचा सकता है.
कृति कहती हैं, "जब भी मैं किसी और को कुछ सिखाती हूँ, तो जो मैंने सीखा है वह मुझे और साफ़ समझ में आता है. इससे मुझे याद रहता है कि मुझे अपनी व्यक्तिगत असुरक्षा के कारण कभी ग़लत व्यवहार नहीं करना चाहिए."
इस चित्रकथा श्रृँखला ने उन्हें समाज में जमी गहरी सोच को चुनौती देने का साहस भी दिया. कृति ने शिक्षा पर आयोजित एक ग्राम सभा में लड़कियों और लड़कों के लिए समान अवसरों की ज़रूरत पर खुलकर बात की. कुछ बुज़ुर्गों ने उन्हें डाँटा, और कुछ लोग वहाँ से उठकर चले गए.
व्यापक असर
लेकिन कृति पीछे नहीं हटीं. अगली बैठक में उन्होंने अपने माता-पिता को भी साथ आने के लिए कहा. उनके साथ होने से कृति की बात को और बल मिला, और जल्द ही गाँव की कई लड़कियों को अपनी पढ़ाई जारी रखने की अनुमति मिल गई.
उन्होंने कहा, "यह देखकर मेरा हौसला बहुत बढ़ा कि साहस के साथ बोले गए कुछ शब्द भी कितना बदलाव ला सकते हैं."
कृति अपने जीवन में इंजीनियर बनना चाहती हैं. वह अपने देश की सेवा करना चाहती हैं और अपने माता-पिता का सहारा बनना चाहती हैं.
कृति कहती हैं, "हमारी पहचान हमारे काम और हमारे शब्दों से होनी चाहिए."
मोबाइल और विज्ञापनों की दुनिया में उलझी एक किशोरी से लेकर लैंगिक समानता की आत्मविश्वासी पक्षधर बनने तक, कृति की यात्रा यह दिखाती है कि कहानियों में बदलाव लाने की कितनी ताक़त होती है.
"आधा फुल" जैसी चित्रकथा श्रृँखलाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं. वे किशोरियों को अपने भीतर झाँकने, नुक़सानदेह रूढ़ियों पर सवाल उठाने और अपने लिए एक नया भविष्य देखने का साहस भी देती हैं.
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