एशिया-प्रशान्त: मध्य पूर्व टकराव और बढ़ती क़ीमतों से अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव
संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य पूर्व में जारी युद्ध, एशिया-प्रशान्त की अर्थव्यवस्था पर नया दबाव बढ़ा रहा है. इस संकट से ऐसे समय में ऊर्जा एवं वस्तु बाज़ार, व्यापार मार्ग और क्षेत्रीय सम्पर्क प्रभावित हो रहे हैं, जब दुनिया पहले से ही भारी अनिश्चितता के दौर से गुज़र रही है.
एशिया और प्रशान्त के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग, UNESCAP की नई रिपोर्ट ‘एशिया और प्रशान्त का आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण 2026’ के अनुसार, ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतें तथा वैश्विक मांग में कमज़ोरी, क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि की सम्भावनाओं को कमज़ोर कर रही हैं और लोगों के लिए जीवन-यापन महँगा बना रही हैं.
कम कौशल वाले कामगारों और कम आय वाले परिवारों पर, इस संकट का सबसे ज़्यादा असर पड़ने की आशंका है, क्योंकि बढ़ती क़ीमतों का बोझ उन पर अधिक पड़ता है और सामाजिक सुरक्षा तक उनकी पहुँच भी अक्सर सीमित होती है.
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि ऊँचा सार्वजनिक ऋण और ब्याज दरों में सम्भावित बढ़ोत्तरी, सरकारों की नई आर्थिक चुनौतियों से निपटने की क्षमता को कम कर सकती है.
संयुक्त राष्ट्र की अवर महासचिव और एशिया-प्रशान्त के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (UNESCAP) की कार्यकारी सचिव आर्मिडा साल्सियाह आलिसजहबाना ने कहा, “नीति-निर्माता ऐसे समय में काम कर रहे हैं, जब वैश्विक व्यापार में संरक्षणवाद बढ़ रहा है, आर्थिक नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और भू-आर्थिक विखंडन गहरा रहा है."
"इसका असर उन देशों पर ज़्यादा पड़ सकता है, जिनके पास नीतिगत समर्थन के लिए कम गुंजाइश है, और उन लोगों पर भी, जिनकी सामाजिक सुरक्षा तक पहुँच सीमित है.”
इस व्यापक अनिश्चितता के बीच, एशिया-प्रशान्त की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में वर्ष 2026 में औसतन 4.0 प्रतिशत की दर से वृद्धि होने का अनुमान है, जो 2025 में 4.6 प्रतिशत था.
महँगाई भी 2025 के 3.5 प्रतिशत से बढ़कर 2026 में 4.6 प्रतिशत तक पहुँच सकती है.
अधिक सहनसक्षम आर्थिक वृद्धि की ओर बदलाव
हालाँकि इसके बावजूद, यह क्षेत्र दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता विकासशील क्षेत्र भी बना रह सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, इस रफ़्तार को बनाए रखने के लिए निर्यात-आधारित विकास मॉडल से आगे बढ़कर घरेलू और क्षेत्रीय मांग को मज़बूत करना होगा. इसके लिए उत्पादकता, सामाजिक सुरक्षा, वित्त तक पहुँच, और डिजिटल व भौतिक सम्पर्क में सुधार ज़रूरी होगा.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा बदलाव की कोशिशों को आर्थिक नीतियों के साथ जोड़ना बहुत ज़रूरी है.
नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार और ऊर्जा दक्षता में सुधार, सहनसक्षमता बढ़ाने और जलवायु लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं. मगर चेतावनी दी गई है कि अगर ये नीतियाँ सोच-समझकर नहीं बनाई गईं, तो महँगाई, ग़रीबी और असमानता बढ़ सकती है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा, “आज यह मुद्दा और भी अहम है, क्योंकि हम स्पष्ट देख रहे हैं कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता के क्या नतीजे हो सकते हैं. हर टकराव या युद्ध, वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटके दे सकता है.”
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अनेक अल्पविकसित देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों को, सस्ती और भरोसेमन्द ऊर्जा तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए, अधिक मज़बूत अन्तरराष्ट्रीय समर्थन की ज़रूरत होगी.