मध्य-पूर्व में सांस्कृतिक धरोहर स्थलों को मिला यूनेस्को का ‘उन्नत संरक्षण’
मध्य पूर्व में 28 फ़रवरी को भड़के युद्ध के बाद, ईरान, लेबनान और इसराइल में सांस्कृतिक महत्व के अनेक प्रमुख स्थलों पर हमलों की ख़बरें सामने आई हैं. इन स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करना संयुक्त राष्ट्र की शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति से जुड़ी संस्था (UNESCO) की ज़िम्मेदारी है, जो युद्ध के बीच विश्व धरोहर स्थलों की रक्षा के लिए लगातार प्रयास कर रही है.
यूनेस्को ने लेबनान सरकार के अनुरोध पर, देश के 39 विश्व धरोहर स्थलों को “उन्नत संरक्षण” (Enhanced protection) के अन्तर्गत रखा गया है.
लेकिन यह “उन्नत संरक्षण” क्या है और युद्ध के समय संयुक्त राष्ट्र की यह एजेंसी किस तरह मदद कर सकती है?
इन सवालों के जवाब के लिए यूएन न्यूज़ ने यूनेस्को की संस्कृति और आपातक इकाई की निदेशक क्रिस्टा पिक्काट के साथ बातचीत की.
ख़तरे में सांस्कृतिक विरासत
यूनेस्को ने क्षेत्र की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक विरासत पर जारी युद्ध के प्रभाव को लेकर बार-बार चेतावनी दी है.
युद्ध शुरू होने के बाद से, यूनेस्को को 20 से अधिक सांस्कृतिक स्थलों को नुक़सान पहुँचने की जानकारी मिली हैं, जिनमें विश्व धरोहर स्थल और राष्ट्रीय महत्व के अन्य स्थल शामिल हैं.
यूनेस्को की अधिकारी ने बताया, “हमें विभिन्न स्रोतों से जो ख़बरें मिलती हैं, हम उनके बारे में, उपग्रह चित्रों के माध्यम से पहले और बाद की तस्वीरों का विश्लेषण करके, या फिर स्थल पर जाकर निरीक्षण के ज़रिए पुष्टि करते हैं.”
यूनेस्को ने मध्य पूर्व क्षेत्र में अब तक 5 सांस्कृतिक स्थलों को नुक़सान होने की पुष्टि की है, जिनमें एक सिनेगॉग, गुलिस्तान पैलेस, सादाबाद पैलेस और पुराना सेनात पैलेस शामिल हैं. ये सभी ईरान में स्थित हैं.
इसके अलावा लेबनान के Tyre शहर में भी नुक़सान की पुष्टि की गई है.
क्रिस्टा पिक्काट ने कहा, “समुदायों की जीवित सांस्कृतिक विरासत ही ख़तरे में है.”
‘उन्नत संरक्षण’ क्या है?
यूनेस्को की “उन्नत संरक्षण” सूची में, लेबनान के 39 स्थल शामिल हैं, जो किसी भी देश के मुक़ाबले सबसे अधिक हैं.
क्रिस्टा पिक्काट ने बताया, “1954 के हेग कन्वेंशन के दूसरे प्रोटोकॉल के तहत ‘उन्नत संरक्षण’ अन्तरराष्ट्रीय क़ानूनी सुरक्षा का सबसे उच्च स्तर है. यह दर्जा उन स्थलों को दिया जाता है जो मानवता के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं और उन्हें सैन्य हमलों से सर्वोच्च स्तर की सुरक्षा मिलती है.”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस कन्वेंशन का पालन नहींं करने वाला कोई भी देश या पक्ष, युद्ध अपराध का दोषी माना जा सकता है.
यूनेस्को, लेबनान में स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुरातत्व महानिदेशालय के साथ मिलकर काम करता है, और आपात परिस्थितियों में सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए तकनीकी सलाह और सहयोग प्रदान करता है.
इसमें प्रशिक्षण, आपात सूची तैयार करना, संरक्षण उपाय, भंडारण स्थलों का पुनर्वास, स्थानान्तरित की जा सकने वाली धरोहरों के लिए निकासी दिशा-निर्देश तैयार करना, और संरक्षित स्थलों को (Blue Shield यानि नील कवच से चिह्नित करना शामिल है, ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.
पत्थरों और इमारतों से कहीं अधिक
यूनेस्को, विशेषतौर पर युद्ध के दौरान शिक्षा, संस्कृति, मीडिया और वैज्ञानिक संस्थानों के प्रति संयम बरतने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील करता है, क्योंकि यही भविष्य के समाजों की नींव होते हैं.
संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी का कहना है कि युद्ध के समय संस्कृति और विरासत लोगों की पहचान तय करती है और समुदायों को सहारा व सम्बल प्रदान करती है.
यूनेस्को के अनुसार, जब समाज के इन बुनियादी स्तम्भों को निशाना बनाया जाता है, तो उनकी तबाही से आघात और गहरा होता है, असन्तोष बढ़ता है और पुनर्वास तथा सम्वाद की प्रक्रिया बाधित होती है.
क्रिस्टा पिक्काट ने कहा, “हमें संस्कृति को केवल एक नाजुक चीज़ के रूप में नहीं देखना चाहिए जिसे सुरक्षा की आवश्यकता है. संस्कृति सहनशीलता की स्रोत भी है और पुनर्निर्माण व शान्ति स्थापना के लिए एक आर्थिक आधार भी प्रदान करती है.”