2025 में, 326 मानवतावादियों की मृत्यु, 'संरक्षण व्यवस्था हो रही है ध्वस्त'
वर्ष 2025 में, 21 देशों में अपने दायित्व को निभा रहे कम से कम 326 मानवीय सहायताकर्मियों को मौत के मुँह में धकेल दिया गया और पिछले 3 वर्षों के दौरान अपना सर्वोच्च बलिदान करने वाले मानवतावादियों की संख्या 1 हज़ार से भी अधिक हो गई है. आपात राहत समन्वयक टॉम फ़्लैचर के अनुसार, वर्तमान स्थिति दर्शाती है कि हम युद्ध की वजह से अपनी मानवता को खोते जा रहे हैं.
यूएन मानवतावादी कार्यालय (OCHA) के अवर महासचिव ने बुधवार को सुरक्षा परिषद में, सशस्त्र टकरावों में आम नागरिकों की रक्षा के विषय पर आयोजित एक बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा कि मानवीय सहायता कार्यों में संरक्षण व्यवस्था दरकती जा रही है.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि 110 से अधिक सदस्य देशों ने मानवीय सहायताकर्मियों के संरक्षण के लिए राजनैतिक घोषणापत्र के ज़रिए क़दम उठाने पर सहमति जताई है. इसके बावजूद, अनेक संकटों में मानवतावादी न केवल मारे जा रहे हैं, बल्कि उनके प्रयासों को रोका, दंडित और अवैध क़रार दिया जा रहा है.
पिछले तीन वर्षों के दौरान 560 से अधिक मानवीय सहायताकर्मी ग़ाज़ा पट्टी और पश्चिमी तट में, 130 सूडान में, 60 दक्षिण सूडान में, 25 यूक्रेन में, और 25 मानवतावादी काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में मारे गए.
अवर महासचिव टॉम फ़्लैचर ने कहा कि यह किसी दुर्घटनावश नहीं हुआ है, यह संरक्षण व्यवस्था के ध्वस्त हो जाने की वजह से हुआ है.
उन्होंने कहा कि ये सभी मानवीय सहायताकर्मी, ज़रूरतमन्दों को भोजन, जल, आश्रय, दवाएँ समेत अन्य सेवाएँ प्रदान करते हुए मारे गए. कुछ की मौत ऐसे वाहनों में जाते समय हुई, जिन्हें स्पष्ट रूप से मानवतावादी उद्देश्यों के लिए चिन्हित किया गया था.
“हमें बताया गया कि कहाँ नहीं जाना है, किसकी सहायता नहीं करनी है. अपना काम करने के लिए हमारा उत्पीड़न होता है या गिरफ़्तार किया जाता है. हमसे झूठ बोला जाता है और उन झूठों के नतीजे होते हैं.”
अराजकता से बिगड़ती स्थिति
आपात राहत मामलों के लिए यूएन प्रमुख ने सदस्य देशो से सवाल किया कि कुछ समय पहले सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव के पारित होने के बाद भी मानवतावादियों के मारे जाने का सिलसिला जारी क्यों है. इस प्रस्ताव में मानवीय सहायताकर्मियों के विरुद्ध हिंसा का अन्त करने के लिए नैतिक आधार पर तत्काल क़दम उठाने की पैरवी की गई थी.
वर्ष 2024 में, स्विट्ज़रलैंड द्वारा तैयार प्रस्ताव (2730) के पक्ष में सुरक्षा परिषद में 14 वोट डाले गए थे, जबकि रूस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था. इस प्रस्ताव में सभी सदस्यों से अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अनुरूप मानवीय सहायताकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की पुकार लगाई गई है.
उन्होंने कहा कि क्या यह इसलिए है चूँकि कहीं अधिक समझदार राजनैतिक नेताओं की पीढ़ी द्वारा स्थापित अन्तरराष्ट्रीय मानवतावादी क़ानून अब उतने सुविधाजनक नहीं रहे, या फिर मानवतावादियों की मौतों के लिए ज़िम्मेदार पक्षों को अपने कृत्यों की कोई क़ीमत महसूस नहीं होती है.
या फिर, “हमें जायज़ निशानों के तौर पर देखा जाता है.”
अवर महासचिव टॉम फ़्लैचर के अनुसार, जीवनरक्षक कार्यों के लिए वित्तीय संसाधनों को क़िल्लत और ये रुझान, एक अराजक, उग्र, स्वार्थी और हिंसक दुनिया के लक्षण हैं.
कोई जवाबदेही नहीं
पिछले एक वर्ष के दौरान, संयुक्त राष्ट्र ने अगवा किए जाने के 14, गिरफ़्तारियों व हिरासत में लिए जाने के 145 मामलों को दर्ज किया. वहीं, यूएन कर्मचारियों को डराए-धमकाए जाने या उनके उत्पीड़न के 441 कृत्य सामने आए.
सुरक्षा एवं सलामती के लिए यूएन विभाग के प्रमुख जिल्स मिशॉड ने बताया कि इसी अवधि में, संयुक्त राष्ट्र परिसरों पर हमले की 62 घटनाएँ हुईं और यूएन वाहनों पर 84 हमले हुए.
“दोषियों की कभी-कभार ही जवाबदेही तय हो पाती है. उन्हें शायद ही कभी नाम लेकर शर्मिन्दा किया जाता है, मुक़दमा चलना तो दूर की बात है.”
उन्होंने ध्यान दिलाया कि युद्ध में फँसे हुए बच्चों को बचाते हुए, टीकाकरण अभियान के लिए प्रयासरत, हिंसक इलाक़ों में रह रहे और लाखों ज़रूरतमन्दों तक मदद पहुँचाने के दौरान मानवीय सहायताकर्मी मारे गए.
जिल्स मिशॉड ने कहा कि हम उनका साथ निभाने में विफल हो रहे हैं. “मानवतावादियों के लिए सुरक्षा प्रणाली अपने कगार पर है, निरन्तर अल्पपोषित, उपेक्षित और कमज़ोर हो रही है.”