मध्य पूर्व: युद्ध के शोर में, 'दब गए हैं फ़लस्तीनियों के मानवाधिकार उल्लंघन के मामले'
संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अन्तरराष्ट्रीय जाँच आयोग ने चिन्ता जताई है कि क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में फ़लस्तीनी आबादी के विरुद्ध मानवाधिकार उल्लंघन मामलों में तेज़ी आई है, मगर ईरान में भड़के युद्ध की वजह से मौजूदा स्थिति छिप गई है.
स्वतंत्र आयोग ने मध्य पूर्व क्षेत्र में बड़ी संख्या में हुई मौतों पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए सभी पक्षों से हिंसा पर विराम लगाने और अन्तरराष्ट्रीय मानवतावादी व मानवाधिकार क़ानूनों का पालन करने का आग्रह किया है.
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, अस्थाई युद्धविराम की घोषणा क्षेत्रीय स्तर पर टकराव का अन्त करने की दिशा में पहला क़दम है, लेकिन अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करने और क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े व इसराइल में आम नागरिकों को निशाना बनाने वाले सभी पक्षों की जवाबदेही तय की जानी होगी.
क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े और इसराइल में अनेक इलाक़े हवाई हमलों की चपेट में आए हैं.
स्वतंत्र आयोग ने समय पूर्व चेतावनी या सुरक्षा व्यवस्था के बिना ही रह रहे फ़लस्तीनी समुदायों, सैन्य प्रतिष्ठानों के नज़दीक स्थित इलाक़ों में बसी इसराइली आबादी और इसराइल में हमलों से बचाव के लिए आश्रय से वंचित फ़लस्तीनी नागरिकों की स्थिति पर विशेष रूप से चिन्ता जताई है.
आयोग के अनुसार, 28 फ़रवरी को मध्य पूर्व क्षेत्र में हिंसक टकराव भड़कने के बाद क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में फ़लस्तीनियों के मानवाधिकारों के लिए हालात बद से बदतर हुए हैं. व्यापक टकराव की वजह से फ़लस्तीनी लोगों की व्यथा और वर्तमान स्थिति छिपी हुई है.
चिन्ताजनक स्थिति
28 फ़रवरी के बाद से अब तक, ग़ाज़ा में इसराइली हवाई हमलों, बमबारी और ड्रोन हमलों में कम से कम 200 लोगों की जान जा चुकी है. ग़ाज़ा के कुछ इलाक़ों में मानवीय सहायता अभियान स्थगित कर दिए गए हैं, सीमा चौकियों पर आवाजाही में कमी आई है और बेहतर इलाज के लिए फ़लस्तीनियों को ग़ाज़ा से बाहर भेजे जाने की प्रक्रिया भी रुक गई है.
अक्टूबर 2025 में युद्धविराम लागू होने के बाद से ग़ाज़ा में स्थिति ख़राब हुई है और फ़लस्तीनियों को सीमित मेडिकल देखभाल, खाद्य सहायता और शरण व्यवस्था हासिल हो पा रही है.
वहीं, पश्चिमी तट में 28 फ़रवरी के बाद से अब तक, इसराइली बस्तियों के निवासियों व सुरक्षा बलों के हाथों 22 फ़लस्तीनियों की जान जा चुकी है, जिनमें बच्चे भी हैं.
इसराइली बस्तियों के बाशिन्दों द्वारा निरन्तर हमले किए जा रहे हैं और पश्चिमी तट के कुछ इलाक़ों में चौकियाँ स्थापित की गई हैं, जिससे और हिंसा हुई है और फ़लस्तीनियों के विरुद्ध यौन व लिंग-आधारित हिंसा को अंजाम दिए जाने की भी ख़बरें हैं.
जाँच आयोग ने बताया कि इसराइली प्रशासन ने पश्चिमी तट में भूमि को ज़ब्त करने या उसे अपने नियंत्रण में लेने की कार्रवाई जारी रखी है, बड़े शरणार्थी शिविरों पर सैन्य नियंत्रण बढ़ाया है और फ़लस्तीनी परिवारों को उनके घरों से बेदख़ल किया जा रहा है.
रक्षा का दायित्व
जाँच आयोग ने इसराइली संसद क्नैसेट द्वारा मृत्युदंड सम्बन्धी क़ानून को पास किए जाने की भी निन्दा की है, जिसमें आतंकवाद से जुड़े अपराधों में हत्याओं के लिए दोषी क़रार दिए गए फ़लस्तीनी व्यक्तियों को फाँसी की सज़ा का प्रावधान है.
आयोग ने मृत्युदंड का विरोध करते हुए सचेत किया कि इस क़ानून में फ़लस्तीनियों के साथ भेदभाव किया गया है, चूँकि यह केवल उन सैन्य अदालतों में लागू होगा, जिनमें क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में फ़लस्तीनियों के विरुद्ध अदालती कार्रवाई होगी, जबकि उसी इलाक़े में रह रहे यहूदी इसराइलियों के लिए अलग से एक क़ानूनी व्यवस्था होगी.
जाँच आयोग ने ध्यान दिलाया है कि एक क़ाबिज़ शक्ति के तौर पर इसराइल का यह दायित्व है कि पूर्वी येरूशलम समेत पश्चिमी तट में फ़लस्तीनियों की रक्षा सुनिश्चित की जाए.
आयोग ने ध्यान दिलाया कि अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने पहले से ही अपनी सलाहकार राय में यह स्पष्ट किया था कि क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में इसराइली उपस्थिति का जारी रहना अवैध है और बस्तियों के विस्तार, भूमि हरण के क़दम और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन है, जिस पर विराम लगाया जाना होगा.