भारत: रवांडा जनसंहार की स्मृति, नफ़रत के ख़तरों से निपटने व एकता पर ज़ोर
वर्ष 1994 में रवांडा में तुत्सी समुदाय के ख़िलाफ़ हुए जनसंहार पर अन्तरराष्ट्रीय चिन्तन दिवस (7 अप्रैल) के अवसर पर नई दिल्ली में आयोजित एक श्रद्धाँजलि कार्यक्रम में, राजनयिकों, अधिकारियों और छात्रों ने पीड़ितों को याद किया, एक भुक्तभोगी की आपबीती सुनी, और तबाही से एकजुटता तक की रवांडा की यात्रा पर चर्चा की.
“जो मैं आपको बता रही हूँ, वह मैंने किताबों में नहीं पढ़ा है. यह वो वास्तविकता है, जो मैंने अपनी आँखों से देखी है. यह वो सच्चाई है, जिसे मैंने ख़ुद जिया है.”
ये शब्द हैं - भारत में रवांडा की उच्चायुक्त जैकलीन मुकांगीरा के, जिन्होंने इस कार्यक्रम में मौजूद लोगों को, वर्ष 1994 के जनसंहार की मानवीय सच्चाई से रूबरू कराया.
जैकलीन मुकांगीरा स्वयं इस जनसंहार की भुक्तभोगी हैं. इस त्रासदी में उन्होंने अपने पिता, चार भाई-बहनों, रिश्तेदारों और उनके बच्चों को खो दिया था.
वर्ष 1994 में रवांडा में 10 लाख से अधिक लोग मारे गए थे, जब वर्षों से पनप रही लक्षित नफ़रत, भेदभाव और ग़लत जानकारी ने 100 दिनों तक चली व्यापक हिंसा का रूप ले लिया था, और पड़ोसी ही पड़ोसियों के ख़िलाफ़ हो गए थे.
जैकलीन मुकांगीरा ने इस स्मृति समारोह में अपने भाषण में कहा कि “फिर कभी नहीं” जैसे शब्द केवल एक खोखला वादा बनकर नहीं रहने चाहिए.
उन्होंने कहा, “हमने अपनी आबादी का 10 प्रतिशत हिस्सा केवल इसलिए खो दिया, क्योंकि उस समय की रवांडा सरकार का कहना था कि देश को बचाने का एक यही रास्ता है - सभी तुत्सी लोगों को मार देना, क्योंकि उनका पूरी तरह सफ़ाया करना उसका इरादा था.”
उन्होंने वहाँ मौजूद लोगों से उन पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की स्मृति को सम्मान देने का आहवान किया, जिन्हें योजनाबद्ध तरीक़े से मार दिया गया था.
साथ ही, उन्होंने उन जीवित बचे लोगों के साथ एकजुटता जताने की अपील की, जिनकी सहनसक्षमता ने रवांडा के पुनर्निर्माण को दिशा देने में मदद की है.
उन्होंने कहा कि अपार पीड़ा के बावजूद सुलह की प्रक्रिया में उनकी भागेदारी और उनका साहस, देश को “एकता की मज़बूत नींव और राष्ट्रवाद की भावना” पर फिर से खड़ा करने के संकल्प को दर्शाता है.
उन्होंने कहा, “वास्तव में, उन्होंने जातीय पहचान पर एकता को, नफ़रत पर क्षमा को, और बदले की जगह एकजुटता को चुना.”
जनसंहार के चेतावनी संकेत
भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर, स्टेफ़ान प्रीज़नर ने कहा कि रवांडा का जनसंहार इस बात की याद दिलाता है कि ऐसे अत्याचार, हथियारों से शुरू नहीं होते.
उन्होंने कहा, “जनसंहार की शुरुआत हथियारों से नहीं होती. इसकी शुरुआत शब्दों से होती है, ग़लत जानकारी से, अमानवीयकरण से, और ऐसी नफ़रत भरी भाषा का प्रयोग करने से, जो समुदायों के बीच की रेखाओं को इतना कठोर बना देती है कि हिंसा सम्भव लगने लगती है.”
हाल के इतिहास के इस सबसे अन्धकारमय अध्यायों में से एक को याद करने के बाद, कार्यक्रम में शामिल स्कूली बच्चों ने “शान्ति और सदभाव के बीज बोने” और किसी को भी उन्हें विभाजित नहीं करने देने की प्रतिज्ञा ली.
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और छत्तीसगढ़ से आए इन छात्रों ने, जनसंहार की भयावहता को दर्शाती कलाकृतियाँ भी प्रस्तुत कीं.
भारत मंडपम में प्रदर्शित ये चित्र, इतिहास के उस काले दौर पर छात्रों के अपने अध्ययन और समझ को सामने ला रहे थे.
एक छात्र ने अपनी कलाकृति के रंगों और चित्रों के बारे में रवांडा की उच्चायुक्त को बताते हुए कहा, “इसे बनाते समय मेरे दिल में शर्म का भाव था, क्योंकि दुनिया ने जनसंहार को रोकने के लिए कुछ नहीं किया.”
एकता के सहारे पुनर्निर्माण
रवांडा की उच्चायुक्त जैकलीन मुकांगीरा ने कहा कि उनका देश तीन दशकों से अधिक समय बाद, अपने दर्दनाक अतीत से उभरकर एकता, एकजुटता, स्थिरता और आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ा है.
उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को जातीय आधार पर बनी राजनैतिक संरचनाओं को समाप्त करके, साझा भागेदारी वाली शासन व्यवस्था अपनाकर, और एक साझा राष्ट्रीय पहचान को मज़बूत करके आगे बढ़ाया गया. यह पहचान है 'नदी उमुन्यारवांडा', जिसका अर्थ है, “मैं रवांडाई हूँ.”
उन्होंने कहा, “इसलिए अब हम ख़ुद को हुतू, तुत्सी या त्वा के रूप में नहीं पहचानते. हम रवांडाई हैं. हम सभी रवांडाई हैं, और हम सचमुच इस बात को मानते हैं.”
कार्यक्रम में, भारत के विदेश मंत्रालय में आर्थिक सम्बन्ध सचिव सुधाकर दलेला ने कहा, “रवांडा आज एकजुट और सहनसक्षम रूप में खड़ा है. यह इस बात का उदाहरण है कि जब कोई राष्ट्र अपने अतीत का ईमानदारी से सामना करता है और दृढ़ संकल्प के साथ अपने भविष्य के पुनर्निर्माण में जुटता है, तो क्या-कुछ हासिल किया जा सकता है.”
नई दिल्ली में आयोजित यह स्मृति कार्यक्रम एक ऐसे सन्देश के साथ समाप्त हुआ, जिसमें स्मरण भी था और आशा भी. शान्ति की रक्षा करनी होगी, नफ़रत को शुरू में ही चुनौती देनी होगी, और बदले के ऊपर एकता को चुनना होगा.