मध्य पूर्व युद्ध पर सुरक्षा परिषद की बैठक, होर्मुज़ पर प्रस्ताव विफल
मध्य पूर्व में युद्धक गतिविधियाँ जारी हैं जिनमें लगातार हमले हो रहे हैं जिनका व्यापक प्रभाव आम लोगों और सिविल ढाँचों और मानवीय सेवाओं पर पड़ रहा है और दुनिया भर में इसका असर देखा जा रहा है. मध्य पूर्व संकट पर विचार करने के लिए मंगलवार को सुरक्षा परिषद की एक बैठक हुई है. Strait of Hormuz – होर्मुज़ जलडमरूमध्य को नौवहन के लिए खोले जाने की मांग करने वाला एक प्रस्ताव मसौदा, मतदान के बाद विफल हो गया.
सुरक्षा परिषद की बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग यहाँ देखी जा सकती है...
अप्रैल के लिए सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष देश बहरीन द्वारा प्रस्तुत किए गए इस प्रस्ताव के समर्थन में 11 वोट पड़े, रूस और चीन ने वीटो का प्रयोग किया, और दो देशों - कोलम्बिया और पाकिस्तान ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.
इस प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करने वाले देशों के नाम हैं - बहरीन, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC), डेनमार्क, फ़्रांस, ग्रीस, लातविया, लाइबेरिया, पनामा, सोमालिया, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका.
बहरीन के नेतृत्व में पेश किए गए इस प्रस्ताव मसौदे को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों का समर्थन प्राप्त था और इसमें मुख्य रूप से समुद्री सुरक्षा, सिविल बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा और समुद्री परिवहन की आज़ादी सुनिश्चित किए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया.
ग़ौरतलब है कि सुरक्षा परिषद में यह प्रस्ताव ऐसे समय में लाया गया जब 28 फ़रवरी को अमेरिका व इसराइल द्वारा ईरान पर शुरू किए गए हमलों और उसके बाद ईरान के जवाबी हमलों से, मध्य पूर्व में युद्ध, दूसरे महीने में प्रवेश कर गया है.
होर्मुज़ संकरे समुद्री मार्ग में वैश्विक नौवहन बाधित है जिससे दुनिया के अनेक स्थानों पर तेल व गैस की भारी कमी हो गई है और अन्य वैश्विक सामान की आपूर्ति भी बाधित हुई है.
दुनिया भर के लिए ऊर्जा साधनों का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा, होर्मुज़ समुद्री मार्ग से होकर गुज़रता है, जिससे अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के लिए इसकी बहुत अहमियत है.
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किन देशों ने क्या कहा...
प्रस्ताव की अस्वीकृति सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता को कमज़ोर करती है: बहरीन
बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल लतीफ़ बिन राशिद अल ज़यानी ने परिषद द्वारा, मसौदा प्रस्ताव (draft resolution) को अपनाने में विफल रहने पर खेद व्यक्त किया.
उन्होंने अपनी राष्ट्रीय क्षमता में बोलते हुए कहा, "इस प्रस्ताव को अपनाने में विफलता, दुनिया और उसके लोगों को गलत सन्देश देती है - यह एक ऐसा संकेत है कि अन्तरराष्ट्रीय जलमार्गों के लिए ख़तरों को अन्तरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा बिना किसी निर्णायक कार्रवाई के, नज़रअन्दाज़ किया जा सकता है."
उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद को अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए. इस मसौदे का उद्देश्य जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता (freedom of navigation) सुनिश्चित करने की दिशा में एक क़दम बढ़ाना था, साथ ही ईरान से अपने दायित्वों का पूरी तरह पालन करने और अपने पड़ोसी देशों पर हमले रोकने का आहवान करना था.
मसौदे का लक्ष्य इसराइल और अमेरिका के युद्ध अपराधों पर पर्दा डालना था: ईरान
ईरान के राजदूत आमिर सईद इरावनी ने कहा, "इस मसौदे का उद्देश्य स्पष्ट है.” यह "पीड़ित (ईरान) को फ़ारस की खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में अपनी सम्प्रभुता और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए दंडित करना चाहता है, जबकि हमलावरों के, अगले अवैध कृत्यों के लिए राजनैतिक और क़ानूनी सुरक्षा प्रदान करता है."
उन्होंने कहा, "मूल रूप से, यह संयुक्त राज्य अमेरिका का मसौदा था."
उन्होंने वीटो का उपयोग करने में चीन और रूस की "ज़िम्मेदार" कार्रवाई के साथ-साथ, मतदान में हिस्सा नहीं लेने के लिए पाकिस्तान और कोलम्बिया की सराहना की.
ईरानी राजदूत ने कहा कि इन देशों ने मसौदे के गम्भीर निहितार्थों को पहचाना, जो अस्पष्ट व निराधार आरोपों के आधार पर, बल प्रयोग को सामान्य बना देता.
उन्होंने कहा कि ईरान ने अपने ख़िलाफ़ छेड़े गए क्रूर युद्ध का जवाब, हमलावरों से जुड़े जहाज़ों के मार्ग को रोकने के लिए 'आनुपातिक उपायों' के माध्यम से दिया है.
ईरानी राजदूत ने साथ ही आश्वासन दिया कि ग़ैर-शत्रु जहाज़, अपने गुज़रने के अधिकार का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र होंगे.
उन्होंने किसी भी अस्थाई संघर्ष विराम के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया, "विशेष रूप से पिछले जून के हमारे अनुभव को देखते हुए."
उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि किसी भी उचित समाधान को, आक्रामकता के निश्चित अन्त की गारंटी देनी होगी.
आमिर सईद इरावनी ने अन्त में कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका और इसराइल को उनके द्वारा पहुँचाई गई पीड़ा की पूरी ज़िम्मेदारी लेनी होगी.
मसौदे में एकतरफ़ा निन्दा की गई है; चीन
चीन के राजदूत फू कोंग ने कहा, "प्रस्ताव का यह मसौदा टकराव के मूल कारणों और पूरी तस्वीर को व्यापक व सन्तुलित तरीक़े से पेश करने में विफल रहा है."
"जब सदस्यों द्वारा गम्भीर चिन्ताएँ जताई गई हों, तो सुरक्षा परिषद को प्रस्ताव के मसौदे पर मतदान के लिए जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए."
उन्होंने आशा व्यक्त की कि शान्ति और स्थिरता बहाल होगी और पुष्टि भी की कि मूल कारणों से निपटकर, स्थिति पर ठीक तरह से ध्यान दिए जाने को, चीन की प्रतिबद्धता रहेगी.
उन्होंने कहा, "यह युद्ध कभी होना ही नहीं चाहिए था."
उन्होंने इसके लिए अमेरिका और इसराइल को उकसाने वाले देशों के रूप में दोषी ठहराया और उनसे अपनी उन सैन्य कार्रवाइयों को रोकने का आग्रह किया, जिन्हें उन्होंने 'अवैध' बताया.
चीन के राजदूत ने ज़ोर देकर यह भी कहा कि चीन का रुख़ निष्पक्ष और सन्तुलित है, साथ ही उन्होंने ईरान से अपने हमले बन्द करने का भी आहवान किया.
प्रस्ताव 'असन्तुलन, ग़लतियों और टकराव वाले तत्वों से भरा' था: रूस
रूस के राजदूत राजदूत वैसिली नेबेंज़िया ने इस बैठक में कहा कि उनके प्रतिनिधिमंडल ने इस मसौदे के ख़िलाफ़ मतदान किया है, क्योंकि यह "क्षेत्र की स्थिति के प्रति मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण और ख़तरनाक दृष्टिकोण" रखता है.
उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव में ईरानी कार्रवाइयों को क्षेत्रीय तनाव के एकमात्र स्रोत के रूप में पेश किया गया. अमेरिका और इसराइल द्वारा किए गए अवैध हमलों का "बिल्कुल भी उल्लेख नहीं किया गया".
रूसी राजदूत ने ज़ोर देते हुए कहा कि प्रस्ताव के निहितार्थ "हमें स्पष्ट हैं", और परिषद के सदस्यों को याद दिलाया कि प्रस्ताव 1973 (2011) की "शिथिल और व्यापक व्याख्या" ने लीबिया में क्या स्थिति पैदा की थी.
उन्होंने कहा कि रूस और चीन जल्द ही एक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश करेंगे, और "हमारा मसौदा संक्षिप्त, न्यायसंगत और सन्तुलित होगा."
इस नाज़ुक मोड़ पर संयम, राजनय और संवाद की जीत होनी चाहिए: पाकिस्तान
पाकिस्तान के राजदूत असीम इफ़्तेख़ार अहमद ने कहा, “हमारा उद्देश्य स्पष्ट है - युद्ध का स्थाई अन्त, इस टकराव के विस्तार को रोकना और नागरिक जीवन की किसी भी क्षति या महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे के विनाश को रोकना.”
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपने क्षेत्र और उसके बाहर के साझीदारों के साथ मिलकर, इस दिशा में राजनयिक प्रयासों में सक्रिय है.
पाकिस्तानी राजदूत ने बताया कि पिछले सप्ताह, चीन और पाकिस्तान ने एक पाँच-सूत्रीय पहल की घोषणा की थी.
इसमें शामिल हैं:
- एक क्रमबद्ध रोडमैप जिसमें युद्ध पर तत्काल रोक शामिल है;
- समावेशी शान्ति वार्ता की शुरुआत;
- आम लोगों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा;
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में समुद्री सुरक्षा की बहाली;
- और एक स्थाई राजनैतिक समाधान के लिए, अपरिहार्य ढाँचे के रूप में, संयुक्त राष्ट्र चार्टर व अन्तरराष्ट्रीय क़ानून की दृढ़ पुष्टि.
अमेरिका इस 'निर्णायक घड़ी' में मध्य पूर्व के भागीदारों के साथ मज़बूती से खड़ा है: वॉल्ट्ज़
अमेरिकी राजदूत माइकल वॉल्ट्ज ने कहा, "होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि इसे किसी भी देश द्वारा बन्धक बनाने, अवरुद्ध करने या हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती."
जहाँ एक ओर अमेरिका खाड़ी देशों के लोगों के साथ खड़ा है, वहीं इसके विपरीत, चीन और रूस ने "उस शासन का साथ दिया है जो खाड़ी देशों को डरा-धमकाकर अपने अधीन करना चाहता है."
अमेरिकी राजदूत ने याद दिलाते हुए कहा कि "ईरानी शासन का पहला कृत्य 47 साल पहले, दर्जनों अमेरिकियों को बन्धक बनाना था," अब यह (ईरान) होर्मुज़ जलडमरूमध्य और उसके साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था को बन्धक बना रहा है.
उन्होंने आगे कहा, "बहरहाल, साथियों, हो सकता है कि यह उनका अन्तिम कृत्य हो. देखते हैं."
उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि बहरीन का अनुरोध अनुचित नहीं था. "यह एक सीधा सा प्रस्ताव था; ईरान को खाड़ी पर हमले बन्द करने चाहिए."
"जब महत्वपूर्ण नौपरिवहन में देरी होगी – तो दुनिया को पता चल जाएगा कि वास्तव में किसने ज़िम्मेदारी के बजाय विनाश को चुना है."