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भारत: महाराष्ट्र के एक गाँव में मैन्ग्रोव वनों की बहाली

महाराष्ट्र में खारडी गाँव में मैन्ग्रोव वनों की पुनर्बहाली.
© UNDP India/Abhishek Gijare महाराष्ट्र में खारडी गाँव में मैन्ग्रोव वनों की पुनर्बहाली.

भारत: महाराष्ट्र के एक गाँव में मैन्ग्रोव वनों की बहाली

जलवायु और पर्यावरण

महाराष्ट्र के तटीय गाँव खारडी में मैन्ग्रोव को बहाल करने का एक प्रयास, बंजर हो चुकी भूमि को फिर से जीवित करनेस्थानीय आजीविकाओं को मज़बूत करने और लोगों तथा प्रकृति के बीच पुराने रिश्ते को फिर से सशक्त बनाने में मदद कर रहा है.

भारत के एक पश्चिमी प्रदेश महाराष्ट्र के उत्तरी तट पर स्थित पालघर ज़िले का छोटा-सा गाँव खारडी, लम्बे समय से ज्वार-भाटे की लय के साथ जीता आया है. 

यहाँ के परिवार पीढ़ियों से खाड़ियों में मछली पकड़ते रहे हैं, ज़मीन पर खेती करते रहे हैं और आसपास के जलमार्गों से शंख-सीपियाँ इकट्ठा करते रहे हैं. इस जीवन शैली को चुपचाप सहारा देने का काम किया है - मैन्ग्रोव वनों ने.

गाँव के बहुत से लोगों के लिए यह सम्बन्ध बेहद गहरा है. खारडी गाँव, अलग ग्राम पंचायत घोषित होने से पहले, पीढ़ियों तक दातीवारे के नाम से जाना जाता था.

खारडी के सरपंच राजेन्द्र घरत ने बताया, “यह नाम इस रिश्ते को दर्शाता है. ‘दात’ का मतलब है घना और ‘तिवारे’ का मतलब है मैन्ग्रोव. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यहाँ का आगरी समुदाय अपनी पहचान को मैन्ग्रोव वनों से जोड़ता है.”

लेकिन जब ये पेड़ ग़ायब होने लगे, तो यह सन्तुलन टूट गया. खारा पानी भीतर तक आने लगा, और इन हालात ने पास के झो द्वीप पर खेती की ज़मीन को बंजर बना दिया. 

यह स्थिति, समुदाय के लिए केवल पर्यावरणीय गिरावट नहीं थी, बल्कि एक साझा क्षति थी.

खारडी गाँव के सरपंच, राजेन्द्र घरत.
© UNDP India/Abhishek Gijare

नई पहल

वर्ष 2021 में खारडी गाँव, भारत के तटीय समुदायों की जलवायु सहनसक्षमता बढ़ाने की एक बड़ी परियोजना (ECRICC) के तहत पुनर्बहाली के महत्त्वपूर्ण प्रयास का हिस्सा बना. 

यह काम महाराष्ट्र वन विभाग की मैन्ग्रोव इकाई के नेतृत्व में, हरित जलवायु कोष और भारत में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के सहयोग से किया गया. इसके लिए 20 हैक्टेयर से अधिक क्षतिग्रस्त भूमि को चुना गया.

वनकर्मी नवनाथ सांगले इस प्रयास में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे.

उन्होंने बताया, “मैन्ग्रोव की पुनर्बहाली आसान काम नहीं है. नमी, शरीर की सारी ऊर्जा खींच लेती है. कीचड़ बहुत गहरी होती है और ख़तरनाक भी हो सकती है. और ज्वार ही तय करता है कि दिन में आप कितनी देर काम कर पाएंगे.”

पुनर्स्थापित मैन्ग्रोवों का निरीक्षण करते नवनाथ सांगले.
© UNDP India/Abhishek Gijare

उनकी टीम, अक्सर गीली और खारी ज़मीन पर आठ से दस घंटे तक काम करती थी, जिसमें मज़दूर, वन विभाग के कर्मचारी और वानिकी विशेषज्ञ शामिल थे.

वानिकी विशेषज्ञों ने, रोपण शुरू होने से पहले, क्षतिग्रस्त मैन्ग्रोव क्षेत्रों की पहचान की और यह परखा कि क्या यह भूमि पुनर्बहाली के लिए उपयुक्त है. 

इसके लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली और प्रत्यक्ष निरीक्षण के माध्यम से पूरे क्षेत्र का मानचित्रण किया गया. परिणाम अनुकूल आने के बाद, ज्वार का पानी फिर से इन क्षतिग्रस्त इलाक़ों तक पहुँचाने के लिए सहायक जल-मार्ग बनाए गए.

जैव विविधता और पारिस्थितिक सन्तुलन बनाए रखने के लिए मैन्ग्रोव की तीन प्रजातियाँ लगाई गईं (Ceriops tagal, Rhizophora mucronata और Bruguiera cylindrica). पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिले, इसलिए उन्हें डेढ़ मीटर की दूरी पर रोपा गया. 

इस पुनर्बहाली प्रक्रिया से 45 लोगों को रोज़गार भी मिला, जिनमें अधिकतर आसपास के आदिवासी समुदायों से थे.

मैन्ग्रोव पुनर्स्थापन स्थल के समीप रहने वाले किसान दम्पति संतोष और देवयानी घरत ने जीवन की दूसरी पारी मैन्ग्रोव वनों के संरक्षक के रूप में शुरू करने का निर्णय लिया.
© UNDP India/Abhishek Gijare

भागेदारी से संरक्षण तक

वन विभाग ने पुनर्बहाली स्थल के पास रहने वाले किसानों के साथ बैठकें कीं. उन्हें पूरी प्रक्रिया समझाई गई और भरोसा दिलाया गया कि इस काम से उनके खेतों को कोई नुक़सान नहीं होगा. 

उनसे यह भी अनुरोध किया गया कि वे छोटे पौधों को मवेशियों से बचाने में मदद करें. धीरे-धीरे यह सहयोग एक मज़बूत साझेदारी में बदल गया.

पास में रहने वाले किसान दम्पति, सन्तोष और देवयानी घरत, पुनर्स्थापित मैन्ग्रोव क्षेत्र की देखरेख में जुड़ गए. सन्तोष ने बताया कि उन्होंने जंगलों का महत्व बचपन में ही अपने पिता से सीखा था, जो स्वयं वनकर्मी थे.

उन्होंने कहा, “आजकल हर सुबह, जब मैं ताड़ के एक पेड़ पर चढ़कर इस पुनर्स्थापित भूमि पर नज़र रखता हूँ, तो मुझे हरी-भरी क़तारें दिखाई देती हैं, जो लहरों और हवा की लय के साथ सुन्दरता से झूमती हैं.”

देवयानी ने भी वर्षों तक घर और खेत का काम सम्भालने के बाद, बच्चों की शादी हो जाने पर जीवन की एक नई शुरुआत की. वह पिछले तीन वर्षों से नए लगाए गए, 80 हज़ार से अधिक मैन्ग्रोव पौधों की देखभाल में मदद कर रही हैं.

देवयानी कहती हैं, “मैन्ग्रोव के बीच काम करके मुझे बहुत ख़ुशी मिलती है. ये पेड़ हमेशा हरे रहते हैं, इसलिए तेज़ गर्मी में भी इनके आसपास काम करते हुए मुझे थकान नहीं होती. ऐसा लगता है जैसे यह ज़मीन फिर से साँस ले रही हो.”

रुचिता पाटिल मिस्वाक के उन फलों को देखती हुईं, जो पीढ़ियों से उनके परिवार की परम्परा का हिस्सा रहे हैं
© UNDP India/Abhishek Gijare

यह मैन्ग्रोव पुनर्बहाली आजीविका को भी सहारा दे रही है. गाँव की महिलाओं ने मैन्ग्रोव की एक प्रजाति से पारम्परिक रूप से निकाले जाने वाले मेसवाक तेल का उत्पादन और बिक्री फिर से शुरू कर दी है. 

वे केकड़ा पालन और मछली से जुड़े मूल्य-वर्धित उत्पादों की सम्भावनाएँ भी तलाश कर रही हैं, विशेषकर केकड़ों व समुद्री बास मछली से जुड़े उत्पाद की, जो परियोजना से जुड़ी आजीविका गतिविधियों के तहत मैन्ग्रोव क्षेत्रों के आसपास अच्छी तरह पनप रहे हैं.

रुचिता घरत ने कहा, “अगर मैं चाहती हूँ कि मेरे बच्चे मैन्ग्रोव की रक्षा करें, तो मुझे यह सुनिश्चित करना होगा कि वे समझें कि यह वन हमारे जीवन को किस तरह सहारा देता है. इस पीढ़ी को परवाह है. इन्हें बस अनुभव की ज़रूरत है.”

आज जब ज्वार खारडी में प्रवेश करता है, तो वह युवा मैन्ग्रोव पौधों की क़तारों के बीच से गुज़रता है. उनकी पत्तियाँ सुबह की रौशनी में चमकती हैं, उनकी जड़ें मिट्टी को थामे रखती हैं, और उनकी वापसी उस जीवन को फिर से लौटा रही है, जिसके खो जाने का डर कभी गाँव को सताता था.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.