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जीवन लम्बा तो, मगर बेहतर नहीं... महिलाओं का स्वास्थ्य अब भी हाशिए पर

बैंगनी वर्दी में एक अफ्रीकी नर्स एक क्लिनिक में गुलाबी हेडस्क्रैप पहने हुए एक महिला रोगी से परामर्श करती है।
© UN Women/Abbie Trayler-Smith
महिलाओं को अपनी पीड़ा को नज़रअन्दाज करने, उनके लक्षणों को ग़लत समझने, व उनकी स्थितियों का बहुत देर से उपचार किए जाने की अधिक सम्भावना होती है. यह एक ऐसी चिकित्सा प्रणाली का परिणाम है जिसे महिलाओं को ध्यान में रखते हुए बनाया ही नहीं गया है.

जीवन लम्बा तो, मगर बेहतर नहीं... महिलाओं का स्वास्थ्य अब भी हाशिए पर

महिलाएँ

महिलाएँ अतीत की तुलना में कहीं अधिक लम्बा जीवन तो जी रही हैं, मगर यह जीवन स्वास्थ्य कसौटी के नज़रिए से अब भी बेहतर नहीं है. दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति होने के बावजूद, महिलाओं के लिए समान और संवेदनशील इलाज अब भी एक चुनौती बना हुआ है. ग़लत निदान, चिकित्सा पूर्वाग्रहों और महिलाओं की पीड़ा को नज़रअन्दाज करने जैसी समस्याएँ यह दर्शाती हैं कि स्वास्थ्य प्रणाली अब भी पूरी तरह लैंगिक रूप से समान नहीं है. 

महिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था - UN Women के अनुसार, ये सिर्फ़ ख़ामियाँ नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था के संकेत हैं जो अब भी महिलाओं को केन्द्र में रखकर नहीं बनी है. 

ये ख़ामियाँ स्वास्थ्य प्रणाली में जाँच के उपकरणों से लेकर निदान और उपचार को प्रभावित करने वाले डेटा तक गहराई से जुड़ी हुई हैं. इनके गम्भीर असर महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा जीवन की गुणवत्ता पर स्पष्ट दिखाई देते हैं.

यह ज़रूरी है कि शोध महिलाओं के शरीर को केन्द्र में रखकर किया जाए, स्वास्थ्य सेवाएँ उनकी पीड़ा के प्रति गम्भीरता नज़रिया अपनाएँ.

साथ ही, ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित हों जो महिलाओं और लड़कियों के प्रति सम्मान, सटीक निदान और प्रभावी उपचार सुनिश्चित कर सकें.

मैक्सिको सिटी के राष्ट्रीय कैन्सर संस्थान में महिलाओं का छाती के कैन्सर का इलाज मुफ़्त किया जाता है.
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1. स्त्रीरोग जाँच में 150 साल में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं

स्त्रीरोग जाँच में प्रयोग होने वाला उपकरण स्पेकुलम (speculum) आज भी लगभग वैसा ही है, जैसा 19वीं सदी में बनाया किया गया था. यह एक ऐसा दौर था, जब एंटीबायोटिक्स और एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) आम नहीं थे.

पीढ़ियों से महिलाओं को यह समझाया गया कि इस जाँच के दौरान होने वाली असहजता “सामान्य” है और एक महिला होने का हिस्सा है. 

हालाँकि, अब बदलाव की शुरुआत हो रही है, जहाँ महिला-नेतृत्व वाले नए उद्यम या कम्पनियाँ, और महिलाओं पर केन्द्रित प्रौद्योगिकी व नवाचार कम्पनियाँ - Femtech innovators, इस प्रक्रिया को अधिक आरामदेह, सम्मानजनक और सुरक्षित बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं.

इसके बावजूद, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में इन नए उपकरणों को अपनाने की गति अब भी धीमी बनी हुई है.

2. जीवन रेखा हुई लम्बी, मगर…

महिलाओं की औसत आयु (लगभग 73.8 वर्ष), पुरुषों की औसत आयु (क़रीब 68.4 वर्ष) से अधिक होती है. इसके बावजूद महिलाएँ अपने जीवन का लगभग 25 प्रतिशत अधिक समय ख़राब स्वास्थ्य में बिताती हैं.

इसका मतलब है कि महिलाएँ, लम्बे समय तक पुरानी बीमारियों, लगातार पीड़ा, थकान, बिना इलाज की स्थितियों और ग़लत निदान से जूझती रहती हैं. 

अनेक बार उनके लक्षणों को मनोवैज्ञानिक कहकर नज़रअन्दाज भी कर दिया जाता है.

पश्चिम भारत के साबरकांठा ज़िले में, जहाँ कई महिलाएँ और लड़कियाँ आयरन की कमी से जूझ रही हैं, एक नर्स उन्हें पोषणयुक्त आहार के बारे में जानकारी दे रही है.
© UNICEF

3. महिलाओं के स्वास्थ्य की उपेक्षा 

माहवारी से पहले की स्थिति यानि Premenstrual syndrome (PMS), अधिकांश महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करती है. 

हर महीने यह चक्र, अनेक महिलाओं के लिए बार होने वाला दर्द, थकान और मानसिक तनाव लेकर आता है, जो उनके दैनिक जीवन को प्रभावित करता है.

जबकि, स्तम्भन दोष यानि Erectile dysfunction अपेक्षाकृत कम पुरुषों को प्रभावित करता है, फिर भी इस शोध के लिए कहीं अधिक समय और धन ख़र्च किया जाता है.

दशकों से चला आ रहा यह असन्तुलन इस बात को तय करता रहा है कि महिलाओं के दर्द को किस तरह समझा जाता है या ग़लत समझा जाता है, नज़रअन्दाज किया जाता है. साथ ही, अक्सर “सामान्य” मानकर, बिना समाधान के ही छोड़ दिया जाता है.

हालाँकि, अब बदलाव की शुरुआत हो रही है. साल 2023 में स्पेन ने, महिलाओं को वेतन सहित मासिक धर्म अवकाश देने वाला योरोप का पहला देश बनकर एक अहम क़दम उठाया. 

इसके तहत यह स्वीकार किया गया कि मासिक धर्म की पीड़ा गम्भीर हो सकती है और इसके लिए आराम व चिकित्सकीय सहयोग ज़रूरी है.

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4. दर्द के निदान में लग सकते हैं दशकों

दुनिया भर में, हर 10 में से 1 यानि लगभग 19 करोड़ महिलाओं और लड़कियों को, Endometriosis प्रभावित करता है. Endometriosis में गर्भाशय की अन्दरूनी परत जैसे ऊतक शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ जाते हैं.

इसके बावजूद, इस बीमारी के निदान और उपचार में औसतन 4 से 12 साल तक लग जाते हैं.

इसका मतलब है कि महिलाएँ वर्षों तक लगातार दर्द, थकान और सूजन के साथ जीती रहती हैं, जबकि उन्हें अक्सर बताया जाता है कि सब “सामान्य” है और कोई समस्या नहीं है.

Endometriosis कोई दुर्लभ समस्या नहीं हैं, बल्कि असली समस्या यह है कि महिलाओं के दर्द को अब भी अक्सर नज़रअन्दाज किया जाता है, देर से पहचाना जाता है या ग़लत तरीके से निदान किया जाता है.

5. 1990 तक चिकित्सा अनुसन्धान में अनदेखी

1993 तक, महिलाओं को बड़े पैमाने पर नैदानिक परीक्षण से बाहर रखा गया था. इसका मतलब यह है कि दशकों तक दवाएँ और उपचार पुरुषों के शरीर को ध्यान में रखकर विकसित किए गए और महिलाओं पर उनका पर्याप्त परीक्षण नहीं हुआ.

दवाओं की खुराक़ पुरुषों की जैविक संरचना के आधार पर तय की गई, लक्षणों की पहचान भी पुरुषों के शरीर के अनुसार की गई, और महिलाओं में होने वाले प्रभाव और नुक़सान, अक्सर नज़रअन्दाज रह गए.

इसके परिणाम आज भी सामने आ रहे हैं. महिलाओं में दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव (adverse reactions) की सम्भावना अधिक होती है, उनके लक्षणों को ग़लत समझा जाता है, और ऑटोइम्यून बीमारियों जैसी समस्याएँ, जो मुख्य रूप से महिलाओं को प्रभावित करती हैं, अब भी कम शोध के विषय हैं.

आज भी यह खाई पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई है, बल्कि नए रूपों में सामने आ रही है. नैदानिक अनुसन्धान से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं में इस्तेमाल होने वाले एआई उपकरण (AI Tools) तक, महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व करने वाला डेटा यह तय कर रहा है कि बीमारियों का अध्ययन, निदान और उपचार कैसे किया जाए.

एक और अहम मुद्दा यह है कि स्वास्थ्य क्षेत्र के नेतृत्व में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अब भी कम है. इसका महत्व इसलिए है क्योंकि महिला डॉक्टर और नेता अक्सर रोगी-केन्द्रित देखभाल, प्रमाण-आधारित चिकित्सा और ऐसी नीतियों को प्राथमिकता देती हैं, जो महिलाओं के स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाती हैं.

उदाहरण के तौर पर, अमेरिका में महिला डॉक्टरों द्वारा इलाज किए गए बुजु़र्ग मरीज़ों में मृत्यु दर और फिर से इलाज के लिए भर्ती होने की दर कम पाई गई. वहीं, भारत में जिन प्रान्तों में महिला नेतृत्व अधिक रहा, वहाँ नवजात मृत्यु दर भी कम देखी गई.

स्वास्थ्य क्षेत्र और उससे बाहर नेतृत्व में महिलाओं को बढ़ावा देना केवल समानता का सवाल नहीं है, बल्कि यह बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और अधिक जीवन बचाने से भी जुड़ा हुआ है.

मितीके डेस्टा, एक गर्भवती महिला, एक दरवाजे पर खड़ी है, जबकि स्वास्थ्य विस्तार कार्यकर्ता येशीवर्क बेलै ने उसके पेट पर एक आरामदायक हाथ रखा है, जो इथियोपिया में आवश्यक मातृ देखभाल सुनिश्चित करता है।
© UNICEF/Raphael Pouget

6. जीवन की क़ीमत

हृदय रोग, महिलाओं में मौत का प्रमुख कारण है, लेकिन सीने में दर्द का हाथ तक फैलना जैसे इसके “पारम्परिक” लक्षण मुख्य तौर पर पुरुषों के अनुभव के आधार पर तय किए गए हैं.

महिलाओं में इसके लक्षण अलग हो सकते हैं, जैसे अत्यधिक थकान, मितली, साँस फूलना या जबड़े और पीठ में दर्द.

इन संकेतों को कम पहचाने जाने के कारण महिलाओं को एंजियोप्लास्टी या स्टैंट जैसे जीवनरक्षक इलाज समय पर मिलने की सम्भावना कम होती है.

नतीजतन, दिल का दौरा पड़ने के बाद महिलाओं में मृत्यु का जोखिम पुरुषों की तुलना में अधिक होता है. अनेक मामलों में तो उन्हें इलाज मुहैया कराने के बजाय घर भेज दिया जाता है, जिससे ख़तरा और बढ़ जाता है.