भारत: फ़सल बीमा से महिला किसानों की आजीविका को सहारा
भारत के जलवायु-संवेदनशील कृषि क्षेत्रों में महिला किसान, बढ़ते मौसम सम्बन्धी झटकों से अपनी फ़सल, आय और परिवार की सुरक्षा के लिए तेज़ी से फ़सल बीमा का सहारा ले रही हैं. छत्तीसगढ़ की लक्ष्मी राठिया की कहानी एक मिसाल है कि किस तरह वित्तीय सुरक्षा तक पहुँच, महिला किसानों को नुक़सान से उबरने, क़र्ज़ से बचने तथा अपनी ज़मीन में निवेश जारी रखने में मदद कर सकती है.
छत्तीसगढ़ के कोरबा ज़िले के मौहर गाँव में लक्ष्मी राठिया अपने परिवार के खेत में काम करती हैं. यहाँ हर फ़सल केवल खेती नहीं, बल्कि परिवार की खाद्य सुरक्षा, आय और भविष्य से जुड़ी होती है.
प्रदेश के कई अन्य ग्रामीण इलाक़ों की तरह उनका गाँव भी वर्षा पर आधारित खेती पर निर्भर है. इसलिए सूखा, अनियमित बारिश और जलवायु से जुड़े दूसरे ख़तरे खेती को बहुत असुरक्षित बना देते हैं.
छत्तीसगढ़ में 37 लाख से अधिक किसान परिवार हैं, जिनमें ज़्यादातर छोटे और सीमान्त किसान हैं. महिला किसानों के लिए खेती केवल रोज़ी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि बड़ी ज़िम्मेदारी भी है.
लक्ष्मी राठिया बुवाई, रोपाई, निराई और कटाई का काम सम्भालती हैं, और साथ ही परिवार की देखभाल भी करती हैं, विशेषकर तब जब उनके पति मौसमी रोज़गार के लिए शहर में होते हैं.
वह जानती हैं कि मौसम कितनी जल्दी आर्थिक संकट बन सकता है. वर्ष 2017 के सूखे को याद करते हुए वह कहती हैं, “जब सूखे या ज़्यादा बारिश से फ़सल ख़राब हो जाती थी, तब हमें कोई आर्थिक सहारा नहीं मिलता था. सब कुछ हमें अपने दम पर ही सम्भालना पड़ता था.”
फ़सल बीमा तक पहुँच
वर्ष 2023 में लक्ष्मी ने प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना से जुड़कर अपनी ख़रीफ़ फ़सल का बीमा कराया. भारत की यह राष्ट्रीय योजना प्राकृतिक आपदा, चरम मौसम या कीट हमले से फ़सल को नुक़सान होने पर मुआवज़ा देती है. उन्होंने 6,000 रुपये का प्रीमियम देकर उन्होंने अपने खेत के लिए सुरक्षा कवच हासिल किया.
उसी साल ज़्यादा बारिश से उनकी फ़सल ख़राब हो गई, लेकिन इस योजना के तहत उन्हें 97 हज़ार 956 रुपए का दावा भुगतान मिला. इससे वह नुक़सान से उबर सकीं और अगली बुवाई की तैयारी कर सकीं.
लक्ष्मी कहती हैं, “मैं इस मदद की बदौलत, बिना क़र्ज़ लिए खेती जारी रख सकी.” अब वह गाँव की अन्य महिलाओं को भी इस योजना से जुड़ने के लिए प्रेरित करती हैं.
देशभर में इस योजना में महिलाओं की भागेदारी 22 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है, जबकि छत्तीसगढ़ में यह लगभग 15 से 16 प्रतिशत है. बढ़ते जलवायु जोखिमों के बीच ऐसे वित्तीय साधन महिला किसानों के लिए और भी अहम बनते जा रहे हैं.
महिला किसानों तक पहुँच का विस्तार
वर्ष 2018 से संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और भारत के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय साथ मिलकर, फ़सल बीमा योजना के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उसके बेहतर क्रियान्वयन पर काम कर रहे हैं.
इन प्रयासों का मक़सद, छोटे और सीमान्त किसानों, ख़ासतौर पर महिला किसानों को यह समझाना है कि उन्हें किस तरह की बीमा सुरक्षा मिली है और वे दावों तक आसानी से कैसे पहुँच सकती हैं. इसके लिए ज़मीनी स्तर पर सम्पर्क, आसान जानकारी और डिजिटल साधनों का सहारा लिया गया है.
आज यह योजना 20 प्रदेशों और केन्द्र शासित प्रदेशों के 411 ज़िलों में 78 करोड़ से अधिक किसानों तक पहुँच चुकी है.
लक्ष्मी राठिया का अनुभव दिखाता है कि अनिश्चित मानसून, सूखे और चरम मौसम का सामना कर रहीं महिला किसानों के लिए बीमा तक पहुँच कितना महत्त्वपूर्ण सहारा बन सकती है.
इससे वे खेती जारी रख सकती हैं, अपने परिवार का सहारा बन सकती हैं और देश की खाद्य सुरक्षा में अपना योगदान जारी रख सकती हैं.
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